मंदाकिनी को बचाने की जंग: आखिर प्रशासन क्यों सोया रहा और अब क्यों उतरी बुंदेली सेना मैदान में?
चित्रकूट के पुलघाट कर्वी में चोई घास, प्लास्टिक और कपड़ों के ढेर के बीच शुरू हुआ सफाई अभियान, जमीनी पड़ताल में सामने आए कई अहम सवाल।
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट की पहचान केवल भगवान राम की तपोभूमि के रूप में नहीं है, बल्कि यहां बहने वाली पावन मंदाकिनी नदी भी इस धार्मिक नगरी की आत्मा मानी जाती है। सदियों से श्रद्धा, संस्कृति और आस्था की साक्षी रही मंदाकिनी आज अपने अस्तित्व को बचाने की जंग लड़ती दिखाई दे रही है। कर्वी के पुलघाट क्षेत्र में फैली भीषण गंदगी, नदी की सतह पर पसरी चोई घास, तैरता प्लास्टिक कचरा और पानी में सड़ रहे कपड़ों के ढेर ने न केवल पर्यावरण प्रेमियों बल्कि स्थानीय नागरिकों को भी चिंता में डाल दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह स्थिति पैदा कैसे हुई? क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जाती रही? यदि समस्या लंबे समय से मौजूद थी तो समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए? और जब हालात गंभीर हो गए, तब बुंदेली सेना को स्वयं नदी में उतरकर सफाई अभियान चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
पुलघाट में इन दिनों जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह किसी सामान्य सफाई अभियान का नहीं बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का प्रतीक बनता जा रहा है। बुंदेली सेना के कार्यकर्ता स्वयं नदी में उतरकर चोई घास निकाल रहे हैं। स्थानीय युवाओं और नागरिकों की भागीदारी भी इस अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप दे रही है। कई दिनों तक चलने वाले इस अभियान का उद्देश्य केवल गंदगी हटाना नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराना भी है।
नदी की सांसें रोक रही थी चोई घास
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पुलघाट में यह स्पष्ट दिखाई दिया कि मंदाकिनी नदी का एक बड़ा हिस्सा चोई घास की मोटी परतों से ढका हुआ है। नदी की सतह पर फैली यह हरियाली देखने में भले प्राकृतिक प्रतीत होती हो, लेकिन वास्तव में यह नदी के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जब किसी नदी में जल प्रवाह कम हो जाता है और नियमित सफाई नहीं होती, तब इस प्रकार की जलीय वनस्पतियां तेजी से फैलने लगती हैं। इससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित होता है और जलीय जीवों के अस्तित्व पर खतरा बढ़ जाता है। पुलघाट की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है।
नदी किनारे बड़ी मात्रा में प्लास्टिक की थैलियां, कपड़े, धार्मिक सामग्री और घरेलू कचरा भी जमा मिला। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गंदगी एक-दो दिन की नहीं बल्कि कई महीनों की लापरवाही का परिणाम है।
आखिर प्रशासन क्यों सोया रहा?
स्थानीय नागरिकों से बातचीत में सबसे अधिक नाराजगी इसी मुद्दे को लेकर दिखाई दी। लोगों का कहना है कि पुलघाट की बदहाल स्थिति कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। गंदगी और चोई घास धीरे-धीरे बढ़ती रही, लेकिन जिम्मेदार विभागों ने समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।
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कई नागरिकों का आरोप है कि घाटों की नियमित सफाई केवल कागजों तक सीमित रही। यदि समय-समय पर निरीक्षण और सफाई होती तो आज नदी की यह स्थिति नहीं होती। प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती ने समस्या को इतना बढ़ा दिया कि अब बड़े स्तर पर अभियान चलाने की जरूरत पड़ रही है।
यही वजह है कि अब यह सवाल पूरे चित्रकूट में चर्चा का विषय बन चुका है कि जब मंदाकिनी की हालत लगातार बिगड़ रही थी, तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्या कर रहे थे?
क्यों उतरी बुंदेली सेना मैदान में?
जब हालात चिंताजनक होने लगे तो सामाजिक संगठन बुंदेली सेना ने पहल करते हुए सफाई अभियान शुरू किया। संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि समाज स्वयं आगे नहीं आएगा तो केवल सरकारी प्रयासों के भरोसे नदियों को बचाना संभव नहीं होगा।
पुलघाट में कार्यकर्ता खुद पानी में उतरकर चोई घास निकाल रहे हैं। कई ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के बराबर खरपतवार और कचरा अब तक हटाया जा चुका है। अभियान में स्थानीय नागरिकों का सहयोग भी लगातार बढ़ रहा है।
बुंदेली सेना का कहना है कि यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक पुलघाट क्षेत्र को पूरी तरह स्वच्छ नहीं कर दिया जाता।
प्रशासन अब कैसे दे रहा सहयोग?
सफाई अभियान के बाद प्रशासन भी सक्रिय हुआ है। स्थानीय स्तर पर श्रमिकों, सफाई उपकरणों और कचरा निस्तारण की व्यवस्था में सहयोग किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सामाजिक संगठनों के साथ समन्वय स्थापित कर सफाई अभियान को सफल बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि स्थानीय लोग यह भी कहते हैं कि यदि यही सक्रियता पहले दिखाई जाती तो आज नदी को बचाने के लिए इतना बड़ा अभियान चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
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मंदाकिनी को बचाने की यह जंग केवल एक नदी की सफाई का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, सामाजिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण की परीक्षा भी है। पुलघाट में चल रहा अभियान यह संदेश दे रहा है कि जब व्यवस्था सुस्त पड़ जाती है तो समाज को स्वयं आगे आना पड़ता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह अभियान केवल कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाता है या फिर चित्रकूट में नदी संरक्षण की स्थायी व्यवस्था का आधार बनता है। क्योंकि मंदाकिनी केवल एक नदी नहीं, बल्कि चित्रकूट की पहचान, आस्था और भविष्य का प्रतीक है।







