21 अक्टूबर 2026 10:22 अपराह्न

एक महिला के कई पति! आखिर क्यों सदियों से कायम है यह अनोखी विवाह परंपरा?

हिमालय की बहुपति प्रथा को दर्शाती पारंपरिक पहाड़ी बस्ती, महिला और पुरुषों की तस्वीरें तथा जमीन, संयुक्त परिवार, सामाजिक परंपराओं और कानूनी पहलुओं पर आधारित फीचर इमेज।

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राकेश सूद की रिपोर्ट

बहुपति प्रथा, जोड़ीदार प्रथा, हिमाचल की पारंपरिक विवाह व्यवस्था और परिवार की साझा जिम्मेदारी जैसे विषय आज भी लोगों के बीच उत्सुकता पैदा करते हैं। आमतौर पर भारतीय समाज में विवाह एक महिला और एक पुरुष के बीच संबंध के रूप में देखा जाता है, लेकिन हिमालय के कुछ समुदायों में ऐसी परंपराएं भी रही हैं, जिनमें एक महिला का विवाह एक ही परिवार के दो या अधिक सगे भाइयों के साथ होता है। इसे बहुपति प्रथा या अंग्रेजी में फ्रेटर्नल पॉलीएंड्री (Fraternal Polyandry) कहा जाता है। इस व्यवस्था में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रह जाता, बल्कि परिवार, जमीन, आजीविका और सामाजिक जिम्मेदारियों से भी जुड़ जाता है। यही वजह है कि यह परंपरा बाहर के लोगों को भले ही असामान्य लगे, लेकिन इसे समझने के लिए पहाड़ी समाज की भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों को जानना जरूरी है।

हिमाचल प्रदेश के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचलित पारंपरिक विवाह व्यवस्थाओं को लेकर इन दिनों एक बार फिर चर्चा हो रही है। यूट्यूब चैनल ‘मैं भी भारत’ पर साझा किए गए वीडियो में हाटी समुदाय से जुड़ी कथित ‘जोड़ीदार प्रथा’ का उल्लेख किया गया है। इस प्रथा के बारे में बताया जाता है कि एक महिला परिवार के कई सगे भाइयों की पत्नी के रूप में एक ही घर में रहती है। हालांकि, इस विषय पर एक जरूरी तथ्यात्मक अंतर समझना भी आवश्यक है। हिमालयी बहुपति विवाह पर उपलब्ध ऐतिहासिक और मानवशास्त्रीय अध्ययनों में हिमाचल के किन्नौर और उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र का विशेष उल्लेख मिलता है। इसलिए इस परंपरा को पूरे हाटी समुदाय या पूरे हिमाचल प्रदेश की समान और सार्वभौमिक प्रथा मानना उचित नहीं होगा।

क्या है जोड़ीदार प्रथा और कैसे चलता है परिवार?

जोड़ीदार प्रथा को समझने के लिए उस पारिवारिक ढांचे को समझना होगा, जिसमें एक महिला का संबंध एक ही परिवार के कई भाइयों से माना जाता है। परंपरागत रूप से ऐसे परिवार में भाई एक ही घर में रहते हैं और खेती, पशुपालन, घरेलू कामकाज तथा दूसरी जिम्मेदारियों को मिल-जुलकर निभाते हैं। महिला परिवार की बहू होने के साथ-साथ पूरे संयुक्त परिवार की देखभाल और घरेलू व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके नियम, व्यवहार और सामाजिक मान्यताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक परिवार की कहानी को हर जगह लागू नहीं किया जा सकता।

इस तरह की व्यवस्था में पारिवारिक संबंधों को केवल पति-पत्नी के व्यक्तिगत रिश्ते के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि संयुक्त परिवार की निरंतरता से भी जोड़ा जाता है। यदि परिवार के एक भाई को रोजगार के सिलसिले में लंबे समय तक बाहर रहना पड़े, तो दूसरा भाई खेती, घर और बुजुर्गों की जिम्मेदारी संभाल सकता है। परिवार के सभी सदस्य एक ही छत के नीचे रहें, तो काम का बंटवारा और संसाधनों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप परिवार की सहमति, स्थानीय रीति-रिवाजों और बदलते सामाजिक परिवेश पर निर्भर करता है।

द्रौपदी प्रथा क्यों कहा जाता है?

महाभारत में द्रौपदी का विवाह पांच पांडव भाइयों से हुआ था। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण एक महिला के कई पतियों वाली व्यवस्था को आम बोलचाल में कई बार ‘द्रौपदी प्रथा’ कहा जाता है। हालांकि, यह नाम प्रचलित उपमा है; हर समुदाय में इस विवाह व्यवस्था का पारंपरिक नाम यही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। स्थानीय समाज अपने रीति-रिवाजों के लिए अलग शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है।

महाभारत की कथा और हिमालयी समुदायों में मौजूद विवाह परंपराओं के बीच समानता मुख्य रूप से इस बात में दिखाई देती है कि एक महिला के वैवाहिक संबंध एक से अधिक भाइयों से जुड़े होते हैं। लेकिन दोनों व्यवस्थाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक व्याख्या और सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए केवल समानता के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पहाड़ी समाज में यह परंपरा महाभारत से ही चली आ रही है। इसके लिए अलग ऐतिहासिक प्रमाणों की जरूरत होगी।

जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े होने से बचाने की परंपरा

बहुपति प्रथा के पीछे बताए जाने वाले प्रमुख कारणों में खेती योग्य जमीन को एकजुट रखना शामिल है। पहाड़ी इलाकों में ढलानदार भूभाग, सीमित समतल जमीन और कठिन खेती के कारण कृषि भूमि का महत्व बहुत अधिक रहा है। कई परिवारों के पास खेती के लिए थोड़ी-सी जमीन होती है, जिस पर पूरे परिवार का गुजारा निर्भर करता है। ऐसी परिस्थिति में यदि प्रत्येक भाई अलग परिवार बसाकर संपत्ति का अलग-अलग बंटवारा करे, तो आने वाली पीढ़ियों में खेत और छोटे हिस्सों में विभाजित हो सकते हैं। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

संयुक्त परिवार की व्यवस्था में कई भाइयों का एक ही गृहस्थी से जुड़ा रहना जमीन के बंटवारे को टालने या सीमित करने का एक तरीका रहा है। परिवार की आय, खेती और अन्य संसाधनों को साझा रखने से सामूहिक जीवन को सहारा मिल सकता है। इस संदर्भ में बहुपति प्रथा को केवल विवाह की असामान्य व्यवस्था मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यह उन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से भी जुड़ी रही है, जिनमें परिवार अपनी सीमित संपत्ति को अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने का प्रयास करते थे।

हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि जमीन को बचाना इस प्रथा का एक संभावित ऐतिहासिक कारण है, न कि हर परिवार में इसके अपनाए जाने का एकमात्र कारण। सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक परंपरा, रिश्तेदारी, स्थानीय मान्यताएं और व्यक्तिगत परिस्थितियां भी विवाह संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। आज शिक्षा, रोजगार, सड़क, बाजार और संपत्ति संबंधी कानूनों में बदलाव के कारण पुरानी व्यवस्थाओं के प्रति लोगों का नजरिया भी बदल रहा है।

कठिन पहाड़ी जीवन में साझा जिम्मेदारियों का महत्व

हिमालयी क्षेत्रों में परंपरागत जीवन आसान नहीं रहा है। दूर-दराज के गांव, दुर्गम रास्ते, सीमित परिवहन सुविधाएं, मौसम की कठिनाइयां और रोजगार के सीमित अवसर परिवारों के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी करते रहे हैं। कई पुरुष आजीविका के लिए गांव से बाहर जाते रहे हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों को खेती, पशुओं की देखभाल, बच्चों की परवरिश और बुजुर्गों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। संयुक्त परिवार ऐसे हालात में काम का बंटवारा करने और एक-दूसरे को सहारा देने का माध्यम बन सकता है।

बहुपति प्रथा के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि परिवार के किसी एक पुरुष की मृत्यु या लंबे समय तक अनुपस्थित रहने की स्थिति में महिला और बच्चों को परिवार के दूसरे सदस्यों का सहारा मिल सकता है। इससे घर, खेती और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियां सामूहिक रूप से निभाई जा सकती हैं। लेकिन यह कहना कि ऐसी व्यवस्था में महिला को कभी विधवा नहीं होना पड़ता या उसे हमेशा आर्थिक सुरक्षा मिलती है, सही नहीं होगा। किसी एक पति की मृत्यु के बाद दूसरे पति की मौजूदगी सामाजिक सहारा दे सकती है, लेकिन इससे महिला के सभी कानूनी, भावनात्मक और आर्थिक अधिकार अपने आप सुनिश्चित नहीं हो जाते।

क्या इस प्रथा में महिला की इच्छा और अधिकार महत्वपूर्ण हैं?

किसी भी विवाह व्यवस्था पर चर्चा करते समय महिला की सहमति, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केंद्र में रखना जरूरी है। परंपरा के नाम पर किसी महिला से ऐसा रिश्ता स्वीकार करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जिसे वह अपनी इच्छा के विरुद्ध निभाना चाहती हो। इसी तरह किसी पुरुष को भी केवल पारिवारिक दबाव के कारण किसी विवाह व्यवस्था में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। आधुनिक समाज में विवाह की वैधता के साथ-साथ सहमति, समानता, सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों का सवाल भी महत्वपूर्ण है।

परंपरागत समुदायों में रिश्तों को समझने के अपने तरीके हो सकते हैं, लेकिन हर परिवार का अनुभव एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग इसे परिवार की एकजुटता और संसाधनों की साझेदारी के रूप में देखते हैं, जबकि दूसरे लोगों के लिए इसमें भावनात्मक जटिलताएं या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न पैदा हो सकते हैं। इसलिए किसी भी सामाजिक व्यवस्था का मूल्यांकन केवल बाहरी आश्चर्य या रोमांचक कहानी के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि संबंधित महिला, पुरुष और बच्चों के अनुभव क्या हैं और उनके अधिकारों की रक्षा किस तरह होती है।

कानून की नजर में बहुपति प्रथा का क्या स्थान है?

बहुपति विवाह का कानूनी पक्ष जटिल है। भारत में विवाह से संबंधित नियम इस बात पर निर्भर करते हैं कि संबंधित व्यक्ति किस कानून के दायरे में आते हैं, उनकी वैवाहिक स्थिति क्या है और उस समुदाय पर कौन-से वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 में विवाह की शर्तों के तहत जीवित पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर रोक से संबंधित प्रावधान है। वहीं, धारा 2(2) में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के संबंध में अधिनियम के लागू होने को लेकर विशेष प्रावधान है, जब तक केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्देश न दे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी समुदाय की हर पारंपरिक बहुपति व्यवस्था अपने आप कानूनी रूप से मान्य हो जाती है। किसी विशेष विवाह की वैधता तय करने के लिए संबंधित व्यक्तियों की जनजातीय स्थिति, लागू कानून, सरकारी अधिसूचनाओं और मामले के विशिष्ट तथ्यों की जांच आवश्यक हो सकती है। विवाह पंजीकरण, बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार और अभिभावकत्व जैसे मुद्दे भी अलग-अलग कानूनी प्रश्न पैदा कर सकते हैं। इसलिए यह सामान्य दावा करना उचित नहीं होगा कि सरकारी कागजों में हमेशा केवल एक भाई को पति और बच्चों का पिता दर्ज किया जाता है। ऐसे मामलों में वास्तविक दस्तावेजों और लागू नियमों की जांच जरूरी है।

किसी महिला या बच्चे के अधिकार केवल सामाजिक परंपरा के भरोसे नहीं छोड़े जाने चाहिए। संपत्ति में हिस्सेदारी, उत्तराधिकार, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य कानूनी अधिकारों को स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि किसी परिवार में बहुपति संबंध से जुड़ी कोई कानूनी समस्या उत्पन्न होती है, तो स्थानीय कानूनों की जानकारी रखने वाले अधिवक्ता या संबंधित सरकारी प्राधिकरण से सलाह लेना उचित होगा।

हाटी समुदाय और हिमालयी परंपराओं के बीच अंतर समझना जरूरी

हाटी समुदाय हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र, विशेषकर ट्रांस-गिरी इलाके से जुड़ा है। इस समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान अपनी विशिष्ट परंपराओं, स्थानीय रीति-रिवाजों और सामुदायिक जीवन से बनी है। लेकिन किसी समुदाय के बारे में चर्चा करते समय यह मान लेना ठीक नहीं कि उसकी हर सामाजिक परंपरा सभी गांवों और परिवारों में समान रूप से प्रचलित है। एक ही समुदाय के भीतर भी रीति-रिवाजों में बदलाव और विविधता देखने को मिल सकती है।

हिमालयी बहुपति प्रथा पर उपलब्ध अकादमिक साहित्य में किन्नौर और जौनसार-बावर जैसे क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है। मानवशास्त्री गेराल्ड डी. बेरेमैन ने वर्ष 1975 में प्रकाशित अपने शोधपत्र ‘हिमालयन पॉलीएंड्री एंड द डोमेस्टिक साइकिल’ में जौनसार-बावर के भाई-आधारित बहुपति विवाह और घरेलू समूहों की संरचना का अध्ययन किया था। इस अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया कि परिवारों की संरचना समय और परिस्थितियों के साथ बदल सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि बहुपति प्रथा को किसी एक स्थिर नियम के रूप में देखना सही नहीं है।

इसलिए हाटी समुदाय के संदर्भ में जोड़ीदार प्रथा पर चर्चा करते समय स्थानीय लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव, विश्वसनीय मैदानी रिपोर्टिंग और समुदाय-विशिष्ट शोध को महत्व देना चाहिए। किसी वीडियो में दिखाई गई कहानी इस विषय की शुरुआती जानकारी दे सकती है, लेकिन उसके आधार पर पूरे समुदाय के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस तरह की सावधानी से ही सांस्कृतिक विविधता को सही रूप में समझा जा सकता है और किसी समुदाय की गलत छवि बनने से बचाया जा सकता है।

आधुनिक शिक्षा और बदलते समय के साथ बदल रही हैं परंपराएं

समाज स्थिर नहीं रहता। शिक्षा, संचार, सड़क संपर्क, रोजगार के नए अवसर, शहरों की ओर पलायन और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं को प्रभावित किया है। पहले जहां संयुक्त परिवार आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार हुआ करते थे, वहीं आज कई युवा अपनी पसंद, रोजगार और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के अनुसार अलग परिवार बसाना चाहते हैं। इससे पुराने रीति-रिवाजों का स्वरूप भी बदल सकता है।

हिमालयी क्षेत्रों में विवाह संबंधी परंपराओं पर किए गए अध्ययनों में भी सामाजिक और आर्थिक बदलावों के साथ इनके बदलते स्वरूप की चर्चा हुई है। आधुनिक जीवन में परिवार की सुरक्षा के लिए जमीन को संयुक्त रखना ही एकमात्र विकल्प नहीं रह गया है। शिक्षा, वैकल्पिक रोजगार, सरकारी योजनाएं, बैंकिंग सुविधाएं और बेहतर संपर्क व्यवस्था भी लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। इसके बावजूद स्थानीय परंपराएं सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनी रह सकती हैं।

सिर्फ अनोखी शादी नहीं, पहाड़ी समाज की परिस्थितियों की कहानी

एक महिला के कई भाइयों से विवाह की खबर पहली नजर में आश्चर्य पैदा कर सकती है। लेकिन इसके पीछे की सामाजिक परिस्थितियों को समझने पर पता चलता है कि विवाह की परंपराएं केवल निजी संबंधों तक सीमित नहीं रहतीं। वे संपत्ति, खेती, आजीविका, रिश्तेदारी, बच्चों की परवरिश और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ी हो सकती हैं। बहुपति प्रथा को लेकर जमीन के बंटवारे को रोकने और संयुक्त परिवार बनाए रखने जैसे तर्क इसी व्यापक संदर्भ में सामने आते हैं।

फिर भी किसी परंपरा की ऐतिहासिक उपयोगिता को उसके वर्तमान सामाजिक और कानूनी प्रभावों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आज के समय में महिला की सहमति, बच्चों के अधिकार, संपत्ति में हिस्सेदारी और विवाह की कानूनी स्थिति जैसे प्रश्न उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने परिवार की एकजुटता और आर्थिक सुरक्षा। किसी समुदाय को समझने का सही तरीका उसकी परंपराओं का मजाक उड़ाना या उन्हें बिना सवाल किए आदर्श मान लेना नहीं, बल्कि उनके इतिहास, वर्तमान और उनसे जुड़े लोगों के अनुभवों को निष्पक्षता से देखना है।

हिमालय की जोड़ीदार प्रथा इसी कारण सामाजिक अध्ययन और पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण विषय है। यह बताती है कि भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित संसाधन और पारिवारिक जरूरतें विवाह संबंधी मान्यताओं को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। साथ ही, यह सवाल भी सामने रखती है कि बदलते समाज में परंपरा और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस विषय पर आगे की चर्चा में स्थानीय समुदायों की वास्तविक आवाज, प्रमाणित शोध और कानून की स्पष्ट जानकारी को जगह देना जरूरी है।

संदर्भ और तथ्य-जांच

हिमालयी बहुपति प्रथा की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए मानवशास्त्री गेराल्ड डी. बेरेमैन का शोधपत्र Himalayan Polyandry and the Domestic Cycle (1975) उपयोगी संदर्भ है। इसे यहां पढ़ा जा सकता है। विवाह की कानूनी स्थिति पर विचार करते समय हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रासंगिक प्रावधानों और मामले पर लागू अन्य कानूनों की पुष्टि करना आवश्यक है। हाटी समुदाय में इस प्रथा के वर्तमान प्रसार और स्वरूप के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले समुदाय-विशिष्ट प्रमाणों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

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