कांग्रेस में सफल और बीजेपी में कमजोर क्यों पड़ जाती है बगावत? राजनीति के विद्रोह का दिलचस्प इतिहास

कांग्रेस में सफल और बीजेपी में फेल क्यों हो जाती है बगावत? राजनीति के विद्रोह का इतिहास

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कमलेश कुमार चौधरी की विशेष रिपोर्ट

भारतीय राजनीति में दलों के भीतर असंतोष, नेतृत्व संघर्ष और वैचारिक मतभेद कोई नई बात नहीं हैं। समय-समय पर लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी ने बगावत और टूट का सामना किया है। लेकिन यदि देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की तुलना की जाए, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। कांग्रेस से अलग होकर निकले कई नेता और गुट आगे चलकर मजबूत राजनीतिक ताकत बने, जबकि बीजेपी से अलग होने वाले अधिकांश नेता या तो वापस पार्टी में लौट आए या फिर राजनीति के हाशिए पर चले गए।

हाल के दिनों में यह चर्चा फिर तेज हो गई है, जब शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने सुझाव दिया कि बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों का कांग्रेस में विलय हो जाना चाहिए। हालांकि कांग्रेस और एनसीपी दोनों ने इस सुझाव को खारिज कर दिया, लेकिन इस बहस ने भारतीय राजनीति में दलों के विभाजन और उनके परिणामों पर नई चर्चा छेड़ दी है।

संजय राउत के बयान से शुरू हुई नई बहस

संजय राउत के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा कि क्या वास्तव में क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस में विलय संभव है। इस चर्चा को और बल तब मिला जब एनसीपी नेता एवं सांसद सुप्रिया सुले ने इस विचार को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह एक अच्छा सुझाव है और भविष्य में क्या होगा, यह समय तय करेगा।

यद्यपि राजनीतिक दलों का विलय अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है, लेकिन इस मुद्दे ने देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी के इतिहास की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कर दिया है।

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कांग्रेस: बगावतों से बनी और बगावतों से मजबूत हुई पार्टी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास कई बड़े विभाजनों और विद्रोहों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्थापित इस पार्टी ने नेतृत्व संघर्ष, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मतभेदों के कारण अनेक बार टूट का सामना किया है।

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस से अलग हुए कई गुटों ने आगे चलकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई और अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावशाली ताकत के रूप में उभरे। कुछ दल भले ही समय के साथ समाप्त हो गए, लेकिन कई दलों ने राज्यों की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल दिया।

केरल कांग्रेस: शुरुआती और सफल बगावत का उदाहरण

कांग्रेस से अलग होकर लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने वाले दलों में केरल कांग्रेस का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1964 में केएम जॉर्ज ने की थी।

इस बगावत की पृष्ठभूमि में तत्कालीन केरल सरकार का एक राजनीतिक विवाद था। मुख्यमंत्री आर. शंकर और गृह मंत्री पी.टी. चाको के बीच उत्पन्न मतभेदों ने पार्टी के भीतर असंतोष को जन्म दिया। चाको के निधन के बाद उनके समर्थकों ने केएम जॉर्ज के नेतृत्व में अलग रास्ता चुना और केरल कांग्रेस का गठन हुआ।

आज छह दशक बाद भी केरल कांग्रेस राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रही है और कई बार सत्ता संतुलन तय करने वाली पार्टी साबित हुई है।

इंदिरा गांधी का विद्रोह: जिसने कांग्रेस की पहचान बदल दी

कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा और निर्णायक विभाजन वर्ष 1969 में हुआ था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पार्टी के शक्तिशाली संगठनात्मक समूह, जिसे “सिंडिकेट” कहा जाता था, के बीच गंभीर टकराव पैदा हो गया।

यह विवाद इतना बढ़ा कि पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। लोकसभा में अधिकांश सांसद इंदिरा गांधी के साथ चले गए, जबकि विरोधी गुट कांग्रेस (ओ) के रूप में अलग हो गया। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला गुट कांग्रेस (आर) कहलाया।

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बाद में 1978 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) का गठन किया और हाथ का पंजा चुनाव चिन्ह अपनाया। यही चुनाव चिन्ह आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहचान है। वर्ष 1981 में चुनाव आयोग ने कांग्रेस (आई) को ही वास्तविक कांग्रेस के रूप में मान्यता प्रदान की।

यह भारतीय राजनीति का शायद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विद्रोह था, जिसने न केवल कांग्रेस बल्कि पूरे देश की राजनीति को नई दिशा दी।

ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का उदय

कांग्रेस से निकली सबसे सफल क्षेत्रीय पार्टियों में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का नाम सबसे ऊपर आता है। वर्ष 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व से असहमति के बाद अपनी अलग पार्टी बनाई।

ममता बनर्जी का मानना था कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के खिलाफ पर्याप्त आक्रामक राजनीति नहीं कर रही है। इसी असंतोष के चलते उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया।

कुछ ही वर्षों में तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई और उसने तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही वाम मोर्चा सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। आज तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण विपक्षी दल के रूप में स्थापित है।

कांग्रेस से निकले कई नेताओं ने बनाई अलग पहचान

भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां कांग्रेस से अलग हुए नेताओं ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। इनमें शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति (अब भारत राष्ट्र समिति) जैसे दलों का प्रभाव देखा जा सकता है। इन दलों ने अपने-अपने राज्यों में मजबूत जनाधार बनाया और कई बार राष्ट्रीय राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभाई।

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बीजेपी में बगावत क्यों नहीं बन पाती बड़ी ताकत?

इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी में बगावत की कहानियां अपेक्षाकृत अलग दिखाई देती हैं। बीजेपी से अलग हुए अधिकांश नेताओं को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा अत्यंत मजबूत और अनुशासित है। पार्टी का कैडर आधारित मॉडल व्यक्तिगत नेतृत्व से अधिक संगठन को महत्व देता है। यही कारण है कि पार्टी छोड़ने वाले नेताओं को नया जनाधार तैयार करने में काफी संघर्ष करना पड़ता है।

कई मामलों में बागी नेता कुछ वर्षों बाद वापस बीजेपी में लौट आए, जबकि कुछ राजनीति में अप्रासंगिक हो गए। इसके कारण बीजेपी में बड़े पैमाने पर सफल राजनीतिक विद्रोह की मिसालें अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती हैं।

राजनीतिक इतिहास क्या संकेत देता है?

भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कांग्रेस में बगावत अक्सर नई राजनीतिक संभावनाओं का मार्ग खोलती रही है। इसके विपरीत बीजेपी में संगठन की मजबूती और वैचारिक एकरूपता के कारण विद्रोहियों को व्यापक सफलता कम मिली है।

हालांकि राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। बदलते राजनीतिक समीकरण, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और नेतृत्व संघर्ष भविष्य में नए राजनीतिक प्रयोगों को जन्म दे सकते हैं। लेकिन अब तक का इतिहास यही बताता है कि कांग्रेस से निकले बागी अक्सर नई ताकत बनकर उभरे हैं, जबकि बीजेपी के अधिकांश विद्रोही अपनी अलग राजनीतिक पहचान कायम करने में सफल नहीं हो सके हैं।

मेटा डिस्क्रिप्शन: कांग्रेस से निकले कई नेता और दल बड़ी राजनीतिक ताकत बने, जबकि बीजेपी के अधिकांश बागी नेता सफल नहीं हो सके। जानिए भारतीय राजनीति में विद्रोह और दलों के विभाजन का दिलचस्प इतिहास।

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