16 अक्टूबर 2026 4:43 अपराह्न

पंडित छन्नूलाल मिश्रा: उनकी गायकी में शास्त्र की मर्यादा, लोकजीवन की सहजता, भक्ति की निर्मल धारा थी, आज भी सुरों में जीवित है बनारस का सांस्कृतिक वैभव

संपादक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ महान शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्रा की विभिन्न प्रस्तुतियों वाली श्रद्धांजलि फीचर इमेज, जिसमें बनारस की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय शास्त्रीय संगीत को दर्शाया गया है।

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✍️ लेखक-संपादक: अनिल अनूप

भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में कुछ विभूतियां ऐसी होती हैं, जिनकी पहचान केवल उनके कंठ की मधुरता, सुरों की साधना अथवा पुरस्कारों की लंबी सूची से नहीं होती, बल्कि उनके व्यक्तित्व में समाहित उस सांस्कृतिक चेतना से होती है, जो संगीत को मनोरंजन से उठाकर साधना, संवेदना और आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बना देती है। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्रा ऐसी ही विलक्षण विभूति थे। उनकी गायकी में शास्त्र की मर्यादा थी, लोकजीवन की सहजता थी, भक्ति की निर्मल धारा थी और बनारस की उस अविनाशी सांस्कृतिक आत्मा का स्पंदन था, जिसने सदियों से भारतीय संगीत को अपनी विशिष्ट पहचान प्रदान की है।

2 अक्टूबर 2025 को विजयादशमी के दिन उनके महाप्रयाण के साथ भारतीय संगीत जगत ने अपने एक ऐसे साधक को खो दिया, जिसकी आवाज में रागों का अनुशासन और रामकथा की आत्मीयता एक साथ सुनाई देती थी। आज 11 अक्टूबर 2026 को उनके निधन के एक वर्ष से अधिक समय के इस स्मरणकाल में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना केवल किसी महान गायक को याद करना नहीं है, बल्कि उस भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना है, जिसमें संगीत को ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग, मनुष्य के अंतर्मन को निर्मल करने का साधन और समाज को संवेदना के सूत्र में बांधने वाली शक्ति माना गया है।

पंडित जी का भौतिक शरीर हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके स्वरों की विरासत समय की सीमाओं से परे है। जब कोई श्रोता उनकी आवाज में रामचरितमानस के पद सुनता है, जब बनारस की ठुमरी में विरह की कसक अनुभव करता है अथवा शिव की होरी में भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम पाता है, तब लगता है कि एक महान कलाकार अपने शरीर से विदा होकर भी अपनी कला में निरंतर उपस्थित है। यही किसी सच्चे साधक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

आजमगढ़ की धरती से बनारस की सांस्कृतिक चेतना तक

पंडित छन्नूलाल मिश्रा का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गांव में हुआ था। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध लोकसंगीत परंपरा और संगीत-संस्कारों के लिए जाना जाता है। उनके पिता पंडित बद्री प्रसाद मिश्रा ने उन्हें आरंभिक संगीत शिक्षा दी। आगे चलकर उन्होंने उस्ताद अब्दुल गनी खान से किराना घराने की गायकी का प्रशिक्षण प्राप्त किया और ठाकुर जयदेव सिंह के मार्गदर्शन से अपनी संगीत-दृष्टि को और परिष्कृत किया।

उनकी संगीत यात्रा इस बात का प्रमाण है कि महान कलाकार का निर्माण केवल जन्मजात प्रतिभा से नहीं होता। उसके पीछे गुरु का सान्निध्य, वर्षों का अभ्यास, परंपरा के प्रति निष्ठा और स्वयं को निरंतर साधते रहने की अदम्य आकांक्षा होती है। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का मूल भाव भी यही है कि ज्ञान केवल सीखा नहीं जाता, उसे जीवन में उतारा जाता है। पंडित मिश्रा ने इस परंपरा को अपने कंठ में धारण किया और अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया।

हरिहरपुर की लोकधुनों से आरंभ हुई उनकी सांगीतिक चेतना जब बनारस पहुंची, तब उसे एक ऐसा सांस्कृतिक परिवेश मिला, जहां मंदिरों की घंटियां, गंगा के घाटों पर गूंजते मंत्र, लोकजीवन की बोलियां, ऋतुओं के गीत और शास्त्रीय संगीत की गंभीर साधना एक-दूसरे से सहज संवाद करती हैं। बनारस उनके लिए केवल निवास अथवा कर्मभूमि नहीं रहा; वह उनकी गायकी का भावलोक बन गया। उनके संगीत में इस नगर की सुबह, घाटों की सांध्य आरती, लोकभाषा की मिठास और अध्यात्म की गहरी अनुभूति एक साथ सुनाई देती थी।

यहां एक विशेष बात समझने योग्य है। पंडित जी की महानता किसी एक घराने की सीमाओं में बंधी हुई नहीं थी। उनकी तालीम में किराना घराने की खयाल गायकी का अनुशासन था, जबकि उनकी प्रस्तुतियों में बनारस की पुरब अंग परंपरा का माधुर्य और लोकसंगीत की सहजता भी पूरी गरिमा के साथ उपस्थित रहती थी। इसीलिए उनकी कला को किसी एक खांचे में रखकर नहीं समझा जा सकता। उन्होंने परंपरा को अपनाया, उसका सम्मान किया और फिर अपने अनुभव, अपनी संवेदना तथा अपनी अनूठी अदायगी से उसे विशिष्ट पहचान दी।

शास्त्रीय संगीत और लोकजीवन के बीच सेतु थे पंडित मिश्रा

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में खयाल गायकी को गंभीर साधना, राग-विस्तार, स्वर-विन्यास और लयकारी के लिए जाना जाता है। इसे समझने के लिए श्रोता को धैर्य, अभ्यास और संगीत की बारीकियों के प्रति संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन जैसी शैलियां भावाभिव्यक्ति के ऐसे द्वार खोलती हैं, जिनसे सामान्य श्रोता भी सहजता से जुड़ सकता है। पंडित छन्नूलाल मिश्रा की विशेषता यह थी कि उन्होंने इन दोनों संसारों के बीच कोई कृत्रिम दीवार खड़ी नहीं होने दी।

उनकी गायकी में खयाल की गंभीरता और भावप्रधान संगीत की आत्मीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक दिखाई देते थे। वे राग की गरिमा बनाए रखते हुए उसकी अनुभूति को श्रोताओं के लिए सहज बनाते थे। उनके लिए संगीत का अर्थ केवल कठिन तानों, ऊंचे स्वरों अथवा तकनीकी कौशल का प्रदर्शन नहीं था। स्वर तभी सार्थक होता है, जब वह हृदय तक पहुंचे; राग तभी जीवंत होता है, जब वह श्रोता के भीतर कोई भाव जगाए। यही उनकी कला की विशिष्ट पहचान थी।

पंडित जी की ठुमरी में प्रेम की कोमलता थी, विरह की व्याकुलता थी और मानवीय भावनाओं की ऐसी गहराई थी, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। दादरा में लोकजीवन की लय थी, चैती में ऋतु परिवर्तन की अनुभूति थी और कजरी में वर्षा के साथ जागने वाली मन की आकुलता थी। इन शैलियों को प्रस्तुत करते समय वे केवल किसी रचना का गायन नहीं करते थे, बल्कि उसके पीछे छिपे सामाजिक और सांस्कृतिक संसार को भी जीवंत कर देते थे।

यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियों का आनंद संगीत के पारखी भी लेते थे और वे श्रोता भी, जिन्हें शास्त्रीय संगीत की तकनीकी शब्दावली का ज्ञान नहीं था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शास्त्रीयता का अर्थ कठिनता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि साधना से अर्जित उस सौंदर्य को प्रकट करना है, जो अनुभूति के स्तर पर सभी मनुष्यों को जोड़ सके।

आज जब संगीत का बड़ा हिस्सा कुछ क्षणों में लोकप्रियता अर्जित करने की होड़ में दिखाई देता है, तब पंडित मिश्रा की साधना हमें याद दिलाती है कि कालजयी कला तात्कालिक आकर्षण से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रियाज, भावनात्मक प्रामाणिकता और परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व से जन्म लेती है।

जब भजन गायकी बन जाती थी आत्मा की प्रार्थना

पंडित छन्नूलाल मिश्रा के सांगीतिक व्यक्तित्व का एक अत्यंत उज्ज्वल पक्ष उनकी भक्ति गायकी थी। उनकी आवाज में रामचरितमानस के पद केवल साहित्यिक पंक्तियां बनकर नहीं आते थे, बल्कि कथा, दर्शन, लोकविश्वास और मानवीय संवेदना के जीवंत अनुभव में बदल जाते थे। उनकी प्रस्तुतियों में तुलसीदास की काव्य-प्रतिभा और भारतीय जनमानस की रामभक्ति का ऐसा समन्वय दिखाई देता था, जिसमें श्रोता संगीत सुनने के साथ-साथ कथा के भावलोक में भी प्रवेश कर जाता था।

भारतीय परंपरा में भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पद्धति का पालन करना नहीं है। भक्ति वह भाव है, जिसमें मनुष्य अपने अहंकार को पीछे रखकर किसी व्यापक सत्य के सामने विनम्र होता है। संगीत इस भाव को अभिव्यक्त करने का अत्यंत प्रभावशाली माध्यम रहा है। मंदिरों में गाए जाने वाले पदों से लेकर संतों की वाणी तक, भारतीय संस्कृति में स्वर और साधना का संबंध बहुत पुराना है। पंडित जी ने इसी परंपरा को अपनी आवाज के माध्यम से समकालीन श्रोताओं तक पहुंचाया।

उनकी रामकथा-आधारित प्रस्तुतियों में प्रसंग का भावार्थ, पात्रों की संवेदना और काव्य की लयात्मकता एक-दूसरे से जुड़ते थे। वे श्रोता को केवल कथा का घटनाक्रम नहीं सुनाते थे, बल्कि उसके भीतर निहित मानवीय मूल्यों की ओर भी ले जाते थे। राम के चरित्र में मर्यादा, करुणा और उत्तरदायित्व; भरत के प्रसंग में त्याग; हनुमान की भक्ति में समर्पण; और निषाद अथवा केवट के प्रसंगों में आत्मीयता जैसे भाव भारतीय सांस्कृतिक चेतना के स्थायी आधार हैं। ऐसी रचनाओं को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करना वस्तुतः लोकमानस में इन मूल्यों की स्मृति को पुनर्जीवित करना है।

यहां यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि पंडित मिश्रा की भक्ति गायकी का आकर्षण केवल धार्मिक आस्था रखने वाले श्रोताओं तक सीमित नहीं था। संगीत की संवेदना मनुष्य को उसकी भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत विश्वासों से आगे जाकर भी स्पर्श कर सकती है। किसी भजन की करुणा, किसी पद की शांति और किसी राग की गंभीरता का अनुभव वह व्यक्ति भी कर सकता है, जो उसे किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के संदर्भ में नहीं सुन रहा हो।

इस दृष्टि से पंडित जी का योगदान भारतीय संगीत की समावेशी परंपरा को मजबूत करने वाला था। उन्होंने भक्ति को केवल उपदेश नहीं बनने दिया, बल्कि उसे सुर, लय, शब्द और अनुभूति की जीवंत अभिव्यक्ति बनाया।

‘खेले मसाने में होली’ और शिव की अनूठी सांगीतिक छवि

पंडित छन्नूलाल मिश्रा की लोकप्रिय प्रस्तुतियों में ‘खेले मसाने में होली दिगंबर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। यह होरी भगवान शिव की उस लोकछवि को सामने लाती है, जिसमें श्मशान, वैराग्य, अलौकिकता और होली के उल्लास का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनकी प्रस्तुति में यह रचना केवल पर्व का गीत नहीं रहती, बल्कि शिव के विराट और परंपरागत सीमाओं से परे व्यक्तित्व का सांगीतिक आख्यान बन जाती है।

होली को सामान्यतः रंग, हास्य, उल्लास और सामाजिक मेल-मिलाप के पर्व के रूप में देखा जाता है। किंतु भारतीय लोकपरंपरा में शिव की होली एक अलग ही दार्शनिक अर्थ लेकर आती है। श्मशान उस सत्य का प्रतीक है, जहां जीवन की क्षणभंगुरता स्पष्ट होती है और सांसारिक अहंकार का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ऐसे स्थल पर शिव का होली खेलना जीवन और मृत्यु, उत्सव और वैराग्य, लौकिकता और अलौकिकता के बीच एक विलक्षण संवाद रचता है।

पंडित जी की विशेषता थी कि वे इस प्रकार की रचनाओं को केवल गाकर आगे नहीं बढ़ जाते थे। उनकी प्रस्तुति में शब्दों के भाव, प्रसंग की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और गीत के भीतर छिपे अर्थ को समझने का अवसर मिलता था। उनके गायन और कथात्मक शैली का यही सम्मिश्रण श्रोताओं को रचना के निकट ले आता था।

यहां भारतीय संगीत की एक महत्वपूर्ण विशेषता भी सामने आती है। हमारे यहां रचना केवल लिखे हुए शब्दों का समूह नहीं होती; उसका अर्थ गायकी, प्रस्तुति, प्रसंग और श्रोता की अनुभूति से विस्तार पाता है। एक ही पद अलग-अलग कलाकारों की आवाज में अलग रंग ग्रहण कर सकता है। महान कलाकार वह है, जो रचना की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसमें अपनी साधना से नया जीवन भर दे। पंडित छन्नूलाल मिश्रा इस कला के असाधारण प्रतिनिधि थे।

शास्त्रों की मर्यादा और संगीत की आध्यात्मिक परंपरा

भारतीय संगीत परंपरा में नाद को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उपनिषदों से लेकर भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं तक ध्वनि, शब्द और चेतना के संबंध पर विचार किया गया है। संगीत की साधना में स्वर का शुद्ध होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है साधक का अंतर्मन, उसकी एकाग्रता और उसकी संवेदनशीलता। शास्त्रीय संगीत इसी अनुशासन के माध्यम से साधारण ध्वनि को कलात्मक अनुभूति में परिवर्तित करता है।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा की गायकी को इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उनकी साधना में शास्त्र का सम्मान था, लेकिन शास्त्र की मर्यादा उनके लिए अभिव्यक्ति में बाधा नहीं बनती थी। वे राग की संरचना और गायकी के अनुशासन को आत्मसात करके उसमें भावों का विस्तार करते थे। यही वह विशेषता है, जो किसी कलाकार को केवल अच्छा गायक नहीं, बल्कि परंपरा का सृजनशील संवाहक बनाती है।

भारतीय संगीत की परंपरा में गुरु से प्राप्त ज्ञान को साधना के माध्यम से अपना बनाना आवश्यक माना गया है। केवल तकनीक सीख लेना पर्याप्त नहीं है; कलाकार को उस तकनीक के पीछे छिपे सौंदर्यबोध को भी समझना पड़ता है। पंडित जी के व्यक्तित्व में यह समन्वय स्पष्ट दिखाई देता था। उनकी गायकी सुनते समय श्रोता को अनुभूति होती थी कि संगीत उनके लिए कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से विकसित हुई आंतरिक भाषा है।

हालांकि संगीत और अध्यात्म का संबंध अत्यंत गहरा है, लेकिन प्रत्येक सांगीतिक अनुभूति को किसी एक धार्मिक अथवा दार्शनिक व्याख्या में सीमित नहीं किया जा सकता। महान संगीत की शक्ति यही है कि वह अलग-अलग लोगों को अलग-अलग अर्थों में स्पर्श करता है। पंडित मिश्रा की कला का महत्व भी इसी व्यापकता में निहित है।

पद्म भूषण और पद्म विभूषण: साधना को मिला राष्ट्रीय सम्मान

पंडित छन्नूलाल मिश्रा की सांगीतिक उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। वर्ष 2010 में उन्हें पद्म भूषण और वर्ष 2020 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों के अतिरिक्त उन्हें संगीत के क्षेत्र में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।

लेकिन किसी कलाकार के योगदान का मूल्यांकन केवल उसके सम्मान-पत्रों से नहीं किया जा सकता। पुरस्कार उसकी उपलब्धियों की सार्वजनिक स्वीकृति अवश्य होते हैं, परंतु उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा उन लोगों के हृदय में होती है, जिन्हें उसकी कला ने प्रभावित किया हो। पंडित मिश्रा के मामले में यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी गायकी ने शास्त्रीय संगीत के पारखी वर्ग और सामान्य श्रोताओं के बीच संवाद स्थापित किया।

उन्होंने यह दिखाया कि परंपरागत संगीत को लोकप्रिय बनाने के लिए उसकी मूल प्रकृति को बदलना अनिवार्य नहीं है। यदि कलाकार के पास गहरी तैयारी, अभिव्यक्ति की स्पष्टता और भावों की सच्चाई है, तो शास्त्रीयता अपनी गरिमा बनाए रखते हुए भी व्यापक समाज तक पहुंच सकती है। यह उपलब्धि आज के सांस्कृतिक परिवेश में और अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जहां लोकप्रियता और कलात्मक गुणवत्ता के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

पंडित जी को मिले राष्ट्रीय सम्मानों का महत्व इसलिए भी है कि वे भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा को प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं, जिसकी साधना के लिए वर्षों का धैर्य, अनुशासन और समर्पण आवश्यक होता है। उनके जीवन से नई पीढ़ी यह प्रेरणा ग्रहण कर सकती है कि कला के क्षेत्र में स्थायी पहचान अर्जित करने के लिए प्रतिभा के साथ-साथ निरंतर परिश्रम और अपनी विधा के प्रति निष्ठा भी अनिवार्य है।

बदलते समय में शास्त्रीय संगीत की चुनौतियां

आज संगीत सुनने और समझने के माध्यम बदल गए हैं। डिजिटल मंचों, छोटे वीडियो, त्वरित मनोरंजन और लोकप्रियता की प्रतिस्पर्धा ने संगीत के प्रसार को अभूतपूर्व गति दी है। यह परिवर्तन अपने आप में नकारात्मक नहीं है। डिजिटल माध्यमों की सहायता से किसी महान कलाकार की प्रस्तुति देश-दुनिया के श्रोताओं तक पहुंच सकती है। किंतु इस सुविधा के साथ एक चुनौती भी जुड़ी है—क्या हम संगीत को केवल कुछ क्षणों के मनोरंजन तक सीमित कर रहे हैं, या उसकी गहराई को समझने का धैर्य भी बचाए रखेंगे?

पंडित छन्नूलाल मिश्रा की विरासत इस प्रश्न पर विचार करने का अवसर देती है। उनकी गायकी का आनंद लेने के लिए केवल कोई लोकप्रिय अंश सुन लेना पर्याप्त नहीं है। राग के विस्तार, शब्दों के भाव, लय की गति और स्वर के उतार-चढ़ाव को समझने के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है। यही एकाग्रता धीरे-धीरे श्रोता की संगीत-दृष्टि को विकसित करती है।

यदि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना चाहता है, तो शास्त्रीय संगीत को केवल समारोहों और विशेष अवसरों तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में संगीत के प्रति रुचि विकसित करने, स्थानीय संगीत परंपराओं का दस्तावेजीकरण करने, युवा कलाकारों को मंच देने और वरिष्ठ संगीतज्ञों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने की दिशा में निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

पंडित जी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण, उनके संगीत पर शोध, उनकी गायकी की शैली पर गंभीर चर्चा और नई पीढ़ी के लिए सुगम अध्ययन-सामग्री तैयार करना समय की मांग है। यह कार्य केवल संगीत संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है। सांस्कृतिक संस्थाओं, मीडिया, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और समाज के जागरूक नागरिकों को भी इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

बनारस की विरासत और आने वाली पीढ़ियों का दायित्व

बनारस की सांस्कृतिक पहचान उसकी प्राचीनता भर में नहीं, बल्कि परंपराओं को जीवन के साथ जोड़े रखने की क्षमता में है। यहां संगीत, साहित्य, दर्शन, लोकभाषा और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन एक-दूसरे से संवाद करते आए हैं। पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने अपनी गायकी के माध्यम से इस बहुआयामी विरासत को अभिव्यक्ति दी।

उनकी कला हमें यह भी सिखाती है कि संस्कृति किसी एक समुदाय, वर्ग अथवा पीढ़ी की निजी संपत्ति नहीं होती। वह अनुभवों, स्मृतियों और रचनात्मक प्रयासों से निर्मित एक साझा धरोहर है। जब कोई कलाकार लोकगीत को शास्त्रीय गरिमा देता है, जब वह भक्ति-पद को संगीत की गहराई से जोड़ता है और जब वह राग की भाषा को सामान्य श्रोता तक पहुंचाता है, तब वह संस्कृति के विस्तार का कार्य कर रहा होता है।

उनकी स्मृति में सबसे सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी प्रस्तुतियों को सुनें, उनकी कला के बारे में पढ़ें और उनके संगीत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास करें। किसी कलाकार की स्मृति केवल उसकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रमों से जीवित नहीं रहती। वह तब जीवित रहती है, जब उसकी कला समाज के सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा बनी रहती है।

यह भी आवश्यक है कि नई पीढ़ी को संगीत की शिक्षा देते समय केवल प्रतियोगिता, प्रमाणपत्र और मंचीय सफलता पर जोर न दिया जाए। उन्हें रियाज का महत्व, गुरु के प्रति सम्मान, कला के प्रति ईमानदारी और अपनी परंपरा के अध्ययन की प्रेरणा दी जाए। पंडित मिश्रा का जीवन इसी व्यापक सांस्कृतिक शिक्षा की ओर संकेत करता है।

देह की विदाई, सुरों की अमरता

पंडित छन्नूलाल मिश्रा को इस संसार से विदा हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। 2 अक्टूबर 2025 को उनका महाप्रयाण हुआ था, लेकिन किसी महान कलाकार की जीवन-यात्रा को उसकी अंतिम सांस के साथ समाप्त नहीं माना जा सकता। उसका दूसरा अध्याय उन स्मृतियों, प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक प्रभावों में आरंभ होता है, जो आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित करते रहते हैं।

पंडित जी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को केवल अपनी आवाज नहीं दी; उन्होंने उसके माध्यम से भावनाओं, लोकजीवन, भक्ति और सांस्कृतिक स्मृति को एक सूत्र में पिरोया। उनकी खयाल गायकी में शास्त्र की गंभीरता, ठुमरी में मन की कोमलता, चैती और कजरी में लोकजीवन की महक तथा भजनों में समर्पण की अनुभूति थी। यही बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें भारतीय संगीत के इतिहास में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

आज जब हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं, तो यह प्रश्न भी हमारे सामने होना चाहिए कि हमने उनकी विरासत को सुरक्षित रखने के लिए क्या किया है। क्या उनकी प्रस्तुतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं? क्या हमारे शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थान शास्त्रीय संगीत की शिक्षा को पर्याप्त महत्व दे रहे हैं? क्या मीडिया महान कलाकारों की स्मृति को केवल विशेष तिथियों तक सीमित रखता है, अथवा उनकी कला पर नियमित चर्चा भी करता है?

इन प्रश्नों का उत्तर ही हमारी श्रद्धांजलि की सार्थकता तय करेगा। यदि पंडित छन्नूलाल मिश्रा की गायकी सुनकर कोई युवा शास्त्रीय संगीत सीखने की प्रेरणा प्राप्त करता है, यदि कोई विद्यार्थी तुलसीदास की वाणी के भावार्थ को समझने का प्रयास करता है, यदि कोई श्रोता ठुमरी और लोकगीतों की सांस्कृतिक गरिमा को पहचानता है, तो यह उनकी कला की निरंतर विजय है।

उनकी स्मृति में शब्दों के पुष्प अर्पित करना सहज है, किंतु उनकी साधना से प्रेरणा लेकर भारतीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। महान कलाकारों का सम्मान तभी पूर्ण होता है, जब समाज उनकी कला को केवल अतीत की उपलब्धि न मानकर वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की धरोहर के रूप में स्वीकार करता है।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी—उनके सुरों को सुनना, उनकी सांस्कृतिक चेतना को समझना और भारतीय संगीत की उस परंपरा को जीवित रखना, जिसमें कला साधना है, साधना संवेदना है और संवेदना मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का सबसे सुंदर माध्यम है।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा को विनम्र श्रद्धांजलि।

उनका कंठ मौन हुआ है, किंतु उनके सुरों की गूंज भारतीय संस्कृति के आकाश में लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

संपादकीय टिप्पणी

पंडित जी की स्मृति को नमन करने का अर्थ केवल एक महान गायक को याद करना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत के प्रति अपने दायित्व को पहचानना भी है, जिसे उन्होंने जीवनभर अपनी साधना से समृद्ध किया। भारतीय संगीत के इतिहास में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

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