संपादकीय

माँ कोई शब्द नहीं… वह, वह एहसास है, जो इंसान के टूट जाने पर भी उसे जीने की वजह देता है

अंजनी कुमार की पत्नी

न्यूज़ रूम की स्क्रीन अब भी चमक रही थी, लेकिन शब्द थके हुए थे।

दिन भर अपराध, राजनीति, गरीबों और गरीबों के बीच उचला मन अचानक एक ऐसी मोड़ पर चला गया, जहां हर आदमी के अंदर से बच्चा बन जाता है – “माँ”। मोबाइल की घण्टी बजी। दूसरी तरफ संस्थान के सबसे पुराने और सबसे सहयोगी सहयोगी संजय सिंह राणा थे।

आवाज़ में वो अपनापन था, लेकिन इस बार इसमें एक गहरा टूटन भी शामिल था। कुछ दिन पहले उन्होंने अपनी मां को खोया था।

दूसरे फोन पर बैठे संपादक की आंखों में भी एक पुराना खालीपन तैर रहा था – एक ऐसा खालीपन, जिसके जन्म से ही उनके हिस्सों में आया था। उन्होंने अपनी माँ को कभी देखा तक नहीं। एक तरफ उसका बेटा था, दूसरी तरफ उसकी माँ की यादें अभी ताज़ा थीं… दूसरी तरफ उसका बेटा था, जिसके पास माँ की कोई याद ही नहीं थी।

और फिर शुरू हुई दो पत्रकारों की वह बातचीत, जो खबर नहीं थी… लेकिन शायद जिंदगी का सबसे बड़ा सच थी। कोई स्टूडियो नहीं था। कोई कैमरा नहीं था। कोई स्क्रिप्ट नहीं थी। बस दो भारी आवाजें थीं…  दो अधूरे बेटे थे… और बीच में थी — “माँ”। जिस माँ के लिए दुनिया का हर शब्द छोटा पड़ जाता है। जिसके आँचल में भूख भी हार जाती है और दर्द भी। जो खुद टूट जाती है, लेकिन अपने बच्चों को टूटने नहीं देती।

मदर्स डे पर दुनिया फूल खरीद रही थी, लेकिन उस शाम दो लोग अपनी-अपनी माँ को शब्दों में ढूंढ रहे थे… और शायद यही इस लेख की सबसे बड़ी वजह भी है।

माँ : एक ऐसा शब्द, जो जन्म से पहले भी साथ होता है

— संपादक और संजय सिंह राणा की भावुक टेलीफोनिक वार्ता पर आधारित विशेष आलेख

दोनों के दुख अलग थे… लेकिन दोनों की आँखों में “माँ” एक जैसी थी।

मदर्स डे की शुरुआत आखिर कब और कैसे हुई?

मदर्स डे का आधुनिक स्वरूप अमेरिका से शुरू हुआ माना जाता है। 1908 में अमेरिका की सामाजिक कार्यकर्ता एना जार्विस ने अपनी दिवंगत माँ की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया। उनकी माँ महिलाओं के स्वास्थ्य और शांति के लिए काम करती थीं। एना चाहती थीं कि दुनिया माँ के त्याग और प्रेम को सिर्फ निजी नहीं, सामाजिक सम्मान भी दे।

उनके लगातार प्रयासों के बाद 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को आधिकारिक रूप से “मदर्स डे” घोषित कर दिया। धीरे-धीरे यह दिन पूरी दुनिया में फैल गया।

लेकिन सच पूछा जाए तो माँ का सम्मान किसी एक दिन का मोहताज कभी नहीं रहा। भारत जैसे देश में तो माँ को धरती, गंगा, गाय और जन्मभूमि तक का रूप माना गया है।

आज भी मदर्स डे क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि आधुनिक जीवन ने इंसान को तेज़ तो बना दिया, लेकिन भावनात्मक रूप से कहीं न कहीं अकेला भी कर दिया। आज बच्चे दूर शहरों में हैं, माता-पिता गाँवों या पुराने घरों में।

व्यस्तता इतनी बढ़ गई कि “माँ ने खाना खाया या नहीं…” यह पूछने तक का समय लोगों के पास कम होता जा रहा है।

ऐसे समय में मदर्स डे केवल एक औपचारिक दिन नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला अवसर है — कि जिस स्त्री ने हमें बोलना सिखाया, हम अक्सर उसी से सबसे कम बात करते हैं।

“राणा जी… माँ सचमुच कभी जाती है क्या?” फोन की घंटी बजी।

दूसरी तरफ संजय सिंह राणा थे। आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भीतर की टूटन साफ महसूस हो रही थी।

संपादक ने धीरे से पूछा — “कैसे हैं राणा जी…?”कुछ सेकंड की चुप्पी रही। फिर उधर से धीमी आवाज आई — “ठीक होने की कोशिश कर रहा हूँ सर… लेकिन घर अब घर नहीं लग रहा… संपादक कुछ पल चुप रहे। फिर बोले — “माँ के जाने के बाद घर सचमुच बदल जाता है… चाहे उम्र कितनी भी हो जाए…” राणा की आवाज भर्रा गई — “सर… सुबह उठता हूँ तो लगता है अभी माँ आवाज देंगी… खाना खाया कि नहीं… लेकिन अब पूरा घर खामोश रहता है…”

“मैंने अपनी माँ को देखा तक नहीं…” कुछ देर बाद संपादक ने खुद अपनी जिंदगी का सबसे निजी पन्ना खोला।  “राणा जी… आपने माँ को खोया है… लेकिन मैंने तो माँ को देखा तक नहीं…”  फोन पर अचानक सन्नाटा फैल गया। राणा शायद समझ नहीं पाए कि क्या कहें।

संपादक फिर बोले —  “लोग कहते हैं माँ की आँखें ऐसी थीं… माँ की मुस्कान वैसी थी… लेकिन मेरे पास माँ की कोई तस्वीर नहीं… कोई स्मृति नहीं… कोई आवाज नहीं…” “बस लोगों से सुना है कि वो बहुत शांत थीं…” फोन के उस पार राणा की साँसें भारी होने लगीं।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा — “सर… तब तो आपने माँ को महसूस करके जिया होगा…” संपादक हल्का-सा हँसे… लेकिन वह हँसी भीतर से टूटी हुई थी।

“हाँ राणा जी… शायद मैंने दुनिया की हर अच्छी स्त्री में माँ तलाशने की कोशिश की…”  माँ सिर्फ जन्म देने वाली स्त्री नहीं होती। ”

राणा बोले — “सर, मेरी माँ पढ़ी-लिखी नहीं थीं… लेकिन जिंदगी की सबसे बड़ी शिक्षक वही थीं…” “जब पहली बार रिपोर्टिंग करने निकला था, माँ ने कहा था —  ‘बेटा… खबर ऐसी लिखना कि किसी गरीब का दिल न टूटे…’”

“आज सोचता हूँ… पत्रकारिता का पहला पाठ मुझे किसी यूनिवर्सिटी ने नहीं, माँ ने पढ़ाया था…” संपादक तुरंत बोले — “सही कहा आपने…”  “माँ बच्चों को सिर्फ पालती नहीं… उनके भीतर इंसान भी बनाती है…”

“माँ भूखी रह सकती है, लेकिन बच्चे को भूखा नहीं देख सकती…” वार्ता अब और भावुक होती जा रही थी। राणा ने एक घटना सुनाई।

“सर… बचपन में घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। एक बार रात में सिर्फ दो रोटियाँ बची थीं। माँ ने कहा —  मुझे भूख नहीं है… तुम लोग खा लो…’” “लेकिन बाद में मैंने देखा… वो चुपचाप पानी पीकर सो गई थीं…” फोन पर कुछ पल तक कोई नहीं बोला। फिर संपादक की भारी आवाज आई —  “दुनिया में सबसे बड़ा त्याग अगर किसी ने किया है… तो वह माँ ने किया है…” “वह अपनी इच्छाएँ मार देती है… लेकिन बच्चों के सपनों को मरने नहीं देती…” “माँ मरती नहीं… धीरे-धीरे भीतर बस जाती है” राणा अब रो पड़े थे। उन्होंने कहा —  “सर… अंतिम समय में माँ बार-बार मेरा हाथ पकड़ रही थीं… जैसे कुछ कहना चाहती हों… लेकिन मैं समझ नहीं पाया…” संपादक ने बहुत धीमे स्वर में कहा — “माँ आखिरी समय में भी बच्चों की चिंता ही करती है…वह शायद यही सोच रही होंगी कि मेरे बाद मेरा बेटा कैसे रहेगा…” कुछ देर तक दोनों तरफ सिर्फ सिसकियाँ थीं।

फिर संपादक बोले —  “राणा जी… माँ मरती नहीं… वह धीरे-धीरे हमारे भीतर बस जाती है…”  जब आप किसी भूखे को खाना खिलाते हैं… माँ वहीं होती है।जब आप थककर भी परिवार के लिए खड़े रहते हैं… माँ वहीं होती है। जब आप किसी रोते हुए इंसान को दिलासा देते हैं… माँ वहीं होती है…”

भारतीय संस्कृति में माँ का स्थान

भारत में माँ को सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि सृष्टि का आधार समझा गया। “मातृदेवो भवः” — यानी माँ देवता के समान है। हमारी संस्कृति में धरती को “मातृभूमि”, भाषा को “मातृभाषा” और गाय को “गौमाता” कहा गया। क्यों? क्योंकि माँ सिर्फ रिश्ता नहीं… संरक्षण का भाव है?  “

आधुनिक समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य

संपादक ने अचानक विषय को समाज की ओर मोड़ा। “आज लोग माँ-बाप को बोझ समझने लगे हैं…”  “जिस माँ ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया… उसी को बुढ़ापे में अकेला छोड़ दिया जाता है…” “यह आधुनिकता नहीं… संवेदनहीनता है…” राणा ने सहमति जताई।

“सर… गाँवों में अब भी माँ के हाथ का खाना याद किया जाता है… लेकिन शहरों में लोग माँ की आवाज तक से चिढ़ने लगे हैं…”

माँ का प्यार विज्ञान से भी परे है

दुनिया के तमाम मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे का पहला भावनात्मक रिश्ता माँ से बनता है। माँ की गोद बच्चे का पहला संसार होती है। उसकी धड़कन, उसकी आवाज, उसकी उँगलियाँ… बच्चे की पूरी मानसिक संरचना को आकार देती हैं।

लेकिन शायद विज्ञान भी उस एहसास को पूरी तरह नहीं समझ सकता, जब एक माँ बिना कहे अपने बच्चे का दर्द पहचान लेती है।

“काश… एक बार माँ को देख पाता…” वार्ता के अंतिम हिस्से में संपादक की आवाज भर्रा गई। “राणा जी… जिंदगी में बहुत कुछ मिला… नाम मिला… संघर्ष मिला… लोग मिले… लेकिन एक कमी हमेशा रही…”  “काश… एक बार माँ को देख पाता…” फोन पर फिर लंबी खामोशी छा गई।

राणा सिर्फ इतना कह सके – “सारे…प्रोमोटर मां को छोड़ दिया जाता है, वे अनाथ हो जाते हैं…लेकिन बाघ मां को देखा ही नहीं…उनका दर्द हल्का और गहरा होता है…”

माँ पर लिखा नहीं जा सकता…सिर्फ महसूस किया जा सकता है

मदर्स डे हर साल आएगा और आएगा। लोग तस्वीरें लाएंगे, संदेश लिखेंगे, उपहार देंगे। लेकिन माँ का असली सम्मान शायद ऐसा ही होता है कि – हम उन्हें समय दे देते हैं… उनकी थकान…उनकी आदतें पढ़ती हैं… और यह भी याद आता है कि दुनिया में सबसे सच्चा प्यार अक्सर बिना शर्त माँ ही करती हैं।

क्योंकि माँ कोई शब्द नहीं… उसे एहसास होता है, जो इंसान के टूट जाने पर भी उसे जीने की वजह देता है। और भी आसान – माँ की जगह इस दुनिया में कोई नहीं ले सकता।

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