भरतपुर

हृदय को छू लेने वाली मिसाल : 90 वर्षीय सास को सिर पर बैठाकर 84 कोस परिक्रमा करा रही बहू, संस्कारों को मिला नया सम्मान

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट

भरतपुर/ब्रज मंडल आधुनिक दौर में जहां पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती दूरियां और बुजुर्गों की उपेक्षा की घटनाएं अक्सर चर्चा में रहती हैं, वहीं ब्रजभूमि से सामने आई एक प्रेरणादायक तस्वीर ने समाज को भावुक कर दिया है। हरियाणा की प्रसिद्ध रागिनी गायिका काजल चौधरी अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को ब्रज की पवित्र 84 कोस परिक्रमा कराने के लिए जिस समर्पण और सेवा भाव का परिचय दे रही हैं, उसने लाखों लोगों का दिल जीत लिया है।

काजल चौधरी अपनी वृद्ध सास को एक विशेष टब में बैठाकर सिर पर उठाए हुए ब्रज की कठिन और लंबी परिक्रमा पूरी कर रही हैं। तपती धूप, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद बहू का यह अद्भुत सेवा भाव लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। ब्रज क्षेत्र में जहां-जहां यह जोड़ी पहुंच रही है, वहां श्रद्धालु उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ रहे हैं।

संस्कारों की मिसाल बनी बहू

भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। इतिहास और धार्मिक ग्रंथों में श्रवण कुमार की कथा आज भी आदर्श मानी जाती है। अब उसी परंपरा को जीवंत करती हुई एक बहू ने समाज को यह संदेश दिया है कि रिश्तों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं बल्कि कर्मों से होता है।

काजल चौधरी ने अपनी सास को ब्रजधाम की 84 कोस यात्रा कराने का संकल्प लिया था। लेकिन उम्र अधिक होने और स्वास्थ्य कारणों से उनकी सास स्वयं चलने-फिरने में असमर्थ थीं। ऐसे में बहू ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी सास को सिर पर उठाकर पूरी परिक्रमा कराने का निर्णय लिया और उसी संकल्प को निभाने में जुट गईं।

श्रद्धा और सेवा का अद्भुत संगम

ब्रज की 84 कोस परिक्रमा धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह यात्रा भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों से होकर गुजरती है और हजारों श्रद्धालु हर वर्ष इसे पूर्ण करने का संकल्प लेते हैं। परिक्रमा मार्ग में कई स्थान ऐसे भी हैं जहां चलना आसान नहीं होता।

ऐसे कठिन मार्गों पर 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला को सिर पर उठाकर ले जाना किसी सामान्य कार्य से कम नहीं है। लेकिन काजल चौधरी की भक्ति और सेवा भावना ने इस चुनौती को भी सहज बना दिया है। उनके चेहरे पर थकान से अधिक संतोष और श्रद्धा दिखाई देती है।

यात्रा के दौरान सास और बहू के बीच का भावनात्मक रिश्ता भी लोगों को भावुक कर रहा है। सास जहां बहू के इस त्याग और समर्पण से अभिभूत हैं, वहीं बहू इसे अपना कर्तव्य और सौभाग्य बता रही हैं।

जहां पहुंचती हैं, लोग करते हैं स्वागत

ब्रज मंडल के गांवों, कस्बों और धार्मिक स्थलों पर जब लोग काजल चौधरी को अपनी बुजुर्ग सास को सिर पर लेकर चलते हुए देखते हैं तो भावुक हो उठते हैं। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने उन पर पुष्पवर्षा की। महिलाओं ने आरती उतारी और लोगों ने उनके इस प्रयास की खुलकर सराहना की।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने आज तक ऐसा उदाहरण नहीं देखा। अनेक श्रद्धालु इसे केवल सेवा नहीं बल्कि भक्ति और संस्कारों का सर्वोच्च रूप मान रहे हैं।

यात्रा के दौरान सास भी लोगों को आशीर्वाद दे रही हैं। उन्हें देखकर अनेक बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं। लोग इस दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में कैद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर छाई ‘कलियुग की श्रवण कुमार’

काजल चौधरी की यह अनोखी यात्रा अब सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। हजारों लोग उनके वीडियो और तस्वीरें साझा कर रहे हैं। इंटरनेट पर उन्हें “कलियुग की श्रवण कुमार” कहा जा रहा है।

सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का कहना है कि आज के समय में जब कई लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता और परिजनों की जिम्मेदारी उठाने से बचते हैं, तब काजल चौधरी का यह कदम समाज को नई दिशा देने वाला है।

कई लोगों ने टिप्पणी करते हुए लिखा कि रिश्तों की असली ताकत सेवा और सम्मान में होती है। यह घटना आने वाली पीढ़ियों को परिवार के महत्व और बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संदेश देती है।

बदलते समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश

समाजशास्त्रियों का मानना है कि तेजी से बदलती जीवनशैली और एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच ऐसे उदाहरण सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने का कार्य करते हैं। बुजुर्गों के प्रति सम्मान और उनकी देखभाल भारतीय संस्कृति की पहचान रही है।

काजल चौधरी की यह यात्रा केवल धार्मिक परिक्रमा नहीं बल्कि सामाजिक संदेश भी है। यह बताती है कि यदि परिवार में प्रेम, सम्मान और समर्पण हो तो कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती।

84 कोस परिक्रमा का धार्मिक महत्व

ब्रज की 84 कोस परिक्रमा हिंदू धर्म की प्रमुख धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। माना जाता है कि इस परिक्रमा के माध्यम से श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलास्थलियों के दर्शन करते हैं। यह यात्रा मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव सहित अनेक पवित्र स्थलों से होकर गुजरती है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई यह परिक्रमा आध्यात्मिक शांति और पुण्य प्रदान करती है। ऐसे में एक बहू द्वारा अपनी वृद्ध सास को यह पवित्र यात्रा कराना सेवा और धर्म का अद्भुत संगम माना जा रहा है।

समाज के लिए बनी प्रेरणा

काजल चौधरी की यह पहल केवल एक परिवार की कहानी नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि संस्कार, सम्मान और सेवा भावना आज भी जीवित हैं। जिस प्रकार उन्होंने अपनी बुजुर्ग सास की इच्छा को अपना लक्ष्य बनाया, वह भारतीय पारिवारिक मूल्यों की सुंदर झलक प्रस्तुत करता है।

ब्रजभूमि में इन दिनों यह दृश्य श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग इसे रिश्तों की मजबूती, बुजुर्गों के सम्मान और भारतीय संस्कृति की महान परंपरा का जीवंत उदाहरण बता रहे हैं।

काजल चौधरी की यह यात्रा आने वाले समय में भी समाज को यह संदेश देती रहेगी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि अपने बुजुर्गों की सेवा में भी दिखाई देती है।

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