मुस्कुराइए… आप लखनऊ में हैं! मगर इस शहर की आँखों में कुछ सवाल अब भी बाकी हैं…
एक संपादक की लखनऊ यात्रा, जहाँ तहज़ीब के साथ-साथ भूख भी खड़ी मिली
अंजनी कुमार की पत्नी
रात का सफ़र अपने अंतिम पर्यवेक्षण की ओर बढ़ रहा था। ट्रेन की अलौकिक हो रही थी। खिड़की के बाहर की फिल्में रोशनियां बता रही हैं कि कोई बड़ा शहर आने वाला है। डिजिटल के किनारे भागती, शानदार बाजार, और स्टेशन के बाहरी हिस्से तक के आकर्षक प्रकाशक… सभी ग्रुप एक खास लोग पैदा कर रहे थे।
“ नहीं आ गया… ”
सामने बैठे बुज़ुर्ग यात्री ने मुस्कुराकर कहा। उनके अपने गानों में इस शहर का पुराना पुरानापन महसूस हुआ था।
संपादक जी ने धीरे से बैग संभाला। आँखों में उत्सुकता थी। यह कोई पहली यात्रा नहीं थी, मगर हर शहर का पहला दृश्य हमेशा नया होता है। विशेष रूप से तब, जब वह शहर की एकमात्र राजधानी न ताज़ीब, अदब, राजनीति और इतिहास का जीवंत वर्णन करता था।
ट्रेन जैसी ही चारबाग स्टेशन पर रुकी, बाहर का दृश्य किसी नवाबी बिल्डिंग जैसा लगा। लाल-सफेद रंग से सजा स्टेशन अपनी स्थापत्य कला में किसी महल से कम नहीं दिख रही थी।
भीड़ थी, मगर भाग नहीं। आवाज़ें वाली, मगर वो एक अजीब सी नारी थी। कुलियों की कॉल में भी शामिल था थान की तहजीब।
मंच पर संपादक जी की एक झलक दिखाई दी।
“प्रणाम संपादक जी!” ये थे कमलेश चौधरी – अनुज तुल्य, अपनेपन से खास, आंखों में सम्मान और चेहरे पर पूरी सादगी, जो लागू नहीं होती। उन्होंने आगे बरबा बैग थाम लिया।
“तुम्हें अकेले आना ठीक नहीं लगा…सोकून की सरज़मीं पर पहला कदम अपने लोगों के साथ पड़े।”
संपादक जी चित्रलिपि। चारबाग स्टेशन के बाहर सबसे पहले जो बोर्ड दिखा, उस पर बड़े पैमाने पर लिखा था – ” मुद्रा, आप लखनऊ में हैं!”
क्लासिक, यह वाक्य सूट ही सैलून पर मस्को ए जेनेटिक था। यह वही शहर था, जहां भाषा भी बोली जाती है। जहाँ “पहले आप” केवल संवाद नहीं, संस्कृति है। जहां राजनीति भी शेरो-शायरी के बीच है। मगर फिर…
उसी बोर्ड के नीचे, एक माली-कुचैली वेश्यालय वाली महिलाएँ दिखाई देती हैं। बालबच्चे हुए। चेहरे पर गंदगी। भगवान में डूबा हुआ एक बच्चा। पास में खड़ा दूसरा बच्चा बार-बार अपनी रोज़गार खींच रहा था। उन्होंने प्रचारित बोली- “बाबू…रोटी खिलाए दो…बच्चों के प्रतिनिधि हैं…” संपादक जी के कदम वहीं थे। एक तरफ बोर्ड कह रहा था – “मुस्कुराएँ…” दूसरी तरफ भूख थी, जो मुस्कुराने नहीं दे रही थी।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा, जैसे कि नाॅनचल ने अपना असली परिचय पहले ही दे दिया हो। यह शहर केवल मस्जिद, इमामबाड़ों और राजनीति का नाम नहीं है। यह विरोधाभासों का भी शहर है। यहां तहजीब के साथ तंगी भी चलती है। यहां शायरी के पीछे सिसकियां भी मौजूद हैं।
कमलेश कुमार चौधरी ने धीरे से कहा- “संपादक जी…यही है असली नाम। यहां अदब भी मिलेगा और दर्द भी।” संपादक जी ने जेब से कुछ पैसे निकाले। मगर महिला के हाथ पकड़कर उनकी नजर बच्चों की आंखों पर टिकी हुई थी। वह बच्चा पैसे नहीं देख रहा था। वह सिर्फ खाने की उम्मीद देख रहा था।
और संभवतः यही वह क्षण था, जहां एक यात्रा वृत्तान्त केवल यात्रा नहीं रह जाती। वह समाज का आईना बन जाता है।
नवाबों का शहर…और सत्य के दर्शन
स्टेशन से बाहर की मैन्युफैक्चरिंग ही लखनऊ अपनी पूरी शान में दिखाई दी। चौड़ी सड़कें। जगमगाती लाइटें। पुराने और नए शहर का अनोखा संगम। एक तरफा ऐतिहासिक स्मारक स्थल। दूसरी तरफ ऊंची-ऊंची आधुनिक इमारत। कार आगे बढ़ रही थी और कमलेश कुमार चौधरी रास्ते भर शहर के किस्से सुनाते जा रहे थे।
“यही से विधानसभा जाएगी सड़क…” “ऊपर पवित्रगंज है…” “वो सामने बड़ा इमामबाड़ा है…” हर मोड़ पर इतिहास था। हर फैसले पर राजनीति।
लखनऊ केवल उत्तर प्रदेश की राजधानी नहीं है। यह शक्ति का धुरी है। यहां दिए गए कई जजमेंट बार पूरे देश की राजनीति की दिशा बदलते हैं।
यह वही शहर है जहां कभी-कभी अटल बिहारी वाजपेयी की आवाज गूंजी होती है। जहां पर शत्रु सिंह यादव ने अपना राजनीतिक अध्याय लिखा। जहां आशुतोष ने सत्य के आउटपुट को बदल दिया। जहां योगी आदित्यनाथ की सरकार अपनी श्रमिक छाप छोड़ रही है।
ये शहर के नेताओं को सिर्फ कुर्सी नहीं देता…पहचानना भी देता है। मगर राजनीति की सबसे बड़ी कंपनी यही है कि सत्ता की गलियों से कुछ ही किलोमीटर दूर का भूखा अब भी जमीन पर सोती है।
संपादक जी की नज़र में वो औरतें बार-बार घूमती रहीं। उन्होंने कार की खिड़की से बाहर की ओर देखते हुए कहा-
“कमलेश… शहर की असली पहचान उसकी मौसी से नहीं, उसकी आखिरी आदमी का हाल है।” कमलेश कुछ पल चुप रहे। फिर से ईसा मसीह ने कहा- “और शायद ऐसे ही सच होते हैं बोलने के लिए ही पत्रकार पैदा होते हैं…”
हजरतगंज की चमक और स्पेक्ट्रम की रात
रात की गहराई और गहराई हो गई थी। शोरीगंज खाकी में ना रहा था। बिग-बैल्ज़ शो-रूम, फिलाडेल्फिया कैफे, चमचमाती गर्ल, एली यंग, महँगी गाड़ियाँ… सब कुछ इतनी खूबसूरत कि कोई भी कह उठे- “वाह!” मगर ठीक है वही फर्मामा पर कुछ लोग पेपरी पेपर सोने की तैयारी कर रहे थे।
एक बच्चा अपनी माँ के आँचल में सोया था। पास ही कोई बुज़ुर्ग पैदल यात्री सिरहाने चला गया।
संपादक जी ने गहरी सांस ली। उन्हें ऐसा लगा जैसे शहर की दो सिद्धांतों में बँटा हुआ है- एक हिस्सा जो रोशनी में जीता है। भाग 2 जो अँधेरे को ओढ़कर सोवेता है। और सबसे खतरनाक बात यह है कि दोनों पार्ट अब एक-दूसरे को छोड़ने का मन बना रहे हैं।
तहज़ीब केवल भाषा नहीं, संवेदना भी है
नेशनल की सबसे बड़ी प्राकृतिक जंजाली मणि है। यहां लोग “तुम” नहीं, “तुम” कहते हैं। यहां बहस भी मुस्कुराती है।
मगर संपादक जी सोच रहे थे- अगर किसी शहर में लोग बेहद शालीन हों, मगर उनके आसपास कोई भूखा सो जाए… तो क्या वह तहजीब पूरी कहलाएगी?
तहजीब के केवल शब्दों की परिभाषा नहीं है। तहज़ीब वह है, जहाँ कोई भूखा न रहे। तहजीब वह है, जहां किसी महिला को बच्चे के साथ हाथ मिला कर जबरदस्ती नहीं की जाती। ताहजी वह है, जहां मार्शलहट का अधिकार केवल अमीरों तक सीमित नहीं है।
पत्रकारिता का असली मकसद
कार अब होटल की ओर बढ़ रही थी। रास्ते भर शहर जा रहा था। जगह-जगह राजनीतिक पोस्टर लगे थे। कहीं किसी नेता की होर्डिंग। कमलेश कुमार चौधरी ने मुस्कुराकर पूछा- “संपादक जी, लखनऊ कैसा लगा?” संपादक जी कुछ पल चुप रहे। फिर बोले- “लखनऊ सुंदर है…मगर अधूरा है।”
“क्यों?”
“जैसे इस शहर में मुस्कान का बोर्ड तो है…मगर हर चेहरे पर मुस्कान नहीं है।” कार में कुछ पल के लिए नष्ट कर दिया गया।
सबसे प्रसिद्ध समान सन्नाटे को आवाज़ देने का नाम है। समाचार केवल घटनाएँ नहीं चिल्लाएँ। समाचार वह प्रश्न करते हैं, जिसमें समाज तलता रहता है। और यात्रा वृत्तान्त केवल स्थान का वर्णन नहीं होता। वह समय और समाज का उपन्यास है।
चारबाग से एक प्रश्न
रात बजेगी। सुबह का अखबार छपेंगे। राजनीति पर बहस होगी। विधानसभा में आरोप-प्रत्यारोप। टीवी स्टूडियो में चीखें गूंजेंगी। मगर चारबाग स्टेशन के बाहर वह लेडीज कल भी मांगती है। उनका बच्चा लगभग कल भी रोमांस में रहेगा।
और टैग करें “मुस्कुराइए, आप लखनऊ में हैं” वाला बोर्ड फिर किसी नए यात्री का स्वागत। सवाल यह नहीं है कि लखनऊ सबसे खूबसूरत है। प्रश्न यह है कि यह प्राकृतिक भंडार क्या है?
अंत में…
रात के आखिरी पहरे होटल की खिड़की से बाहर निकले संपादक जी के मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-शहर की असली पहचान उनकी पहचान नहीं रही। उनकी असली पहचान वह इंसान है, जो सबसे आखिरी बार पर खड़ा हुआ है। यदि वह चित्रांकन कर रहा है… तो कोई भी शहरी चित्रांकन नहीं मिला है।
बाकी पुनः आरंभ बोर्ड ले जाना चाहिए। और शायद लिखना चाहिए – ” सोचिए… आप उस भारत की राजधानी में हैं, जहां सपनों के साथ-साथ भूख भी रहती है।”
(दृश्यगत भाव को समाचार संपादक “अंजनी कुमार त्रिपाठी” ने शब्दांकित किया है- संपादक)







