20 अक्टूबर 2026 4:21 अपराह्न

मैं, बहराइच……. इतिहास के आँसू, वर्तमान की चिंगारियाँ में बहाने को क्यों हूँ मजबूर..?

बहराइच के इतिहास, राजा सुहेलदेव, सांस्कृतिक विरासत और वर्तमान परिस्थितियों को दर्शाती फीचर इमेज, साथ में लेखक चुन्नीलाल प्रधान की तस्वीर

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आलेख – अनिल अनूप

प्रस्तुति — चुन्नीलाल प्रधान

मैं हूँ आपकी सभ्यता और संस्कृति को अपने कंधों पर संभाले सदियों से आपकी पीढ़ियों को सिर्फ दुलारता रहा हूँ। मैं आपकी पीढ़ी दर पीढ़ी के अरमानों का आईना लिए आज भी हर चौराहे पर खड़ा रहता हूँ जिसे आप सभी प्यार से आज तक बहराइच कहते आए हैं।

मैं बहराइच, केवल नक्शे पर बना हुआ कोई शहर या जिला नहीं हूँ। मैं उन स्मृतियों का नाम हूँ, जिनमें पीढ़ियों की आवाजें बसी हैं। मेरे रास्तों पर चलने वालों ने केवल अपने घरों तक पहुँचने का रास्ता नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने समय के साथ एक ऐसी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी गढ़ी है, जिसे पीढ़ियाँ अपने साथ आगे ले जाती रही हैं। मेरी मिट्टी में इतिहास है, मेरी हवाओं में लोकजीवन है और मेरी गलियों में उन असंख्य लोगों की कहानियाँ हैं जिन्होंने मेरे वर्तमान को आकार दिया है।

बहराइच के इतिहास की टीस और वर्तमान की चिंगारियाँ

मैं बहराइच, इतिहास की धरा पर आज जलते कोने से उठती अपनी टीस को क्यों झेल रहा हूँ? हमारे चेहरे झुलसा दिए, हमारे साज ओ ऋंगार पर धुएं की परतें डाल दी गईं, आखिर क्यों? क्या बिगाड़ रहा था मैं आपका?

मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन गलियों में उत्सव आते थे, जिन रास्तों पर लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े दिखाई देते थे, उन्हीं रास्तों पर अविश्वास और तनाव की परछाइयाँ क्यों दिखाई देने लगीं? क्या किसी शहर की पहचान उसके भवनों से होती है या उन रिश्तों से, जिन्हें उसके लोग वर्षों में बनाते हैं? यदि रिश्ते टूटने लगें तो शहर की दीवारें बच भी जाएँ, उसकी आत्मा कहाँ बचती है?

आप तो खुशी खुशी माँ दुर्गा को विदा करने जा रहे थे। मैंने हर कदम पर अपने सीना गर्व से बिछाए, आपको क्या हो गया कि हमारी आन बान के साथ अपनी झूठी शान बघाडने लगे?

उत्सव किसी एक व्यक्ति, समुदाय या वर्ग की संपत्ति नहीं होते। उत्सव तो समाज को जोड़ने का अवसर होते हैं। उनमें आस्था होती है, उमंग होती है और अपने आसपास के लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़ने की इच्छा होती है। फिर वही उत्सव यदि तनाव का कारण बनने लगें तो सवाल केवल घटना पर नहीं उठता, सवाल उस मानसिकता पर भी उठता है जो उत्सव की खुशी से अधिक टकराव को महत्व देने लगती है।

बहराइच का गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक पहचान

मैं बहराइच, एक ऐसा स्थान जिसका नाम सुनते ही इतिहास की सजीव छवियाँ आँखों के सामने आ जाती हैं। मुझे तो सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की राजधानी होने का भी सम्मान मिला है। मेरा ही प्राचीन नाम “ब्रहमाइच” था, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर बहराइच बन गया।

महर्षि बालार्क की तपोभूमि और राजा सुहेलदेव की न्यायप्रिय राजधानी के रूप में मैं सदियों से अपने महान इतिहास का साक्षी रहा हूँ। इस धरती पर होने वाले सुहेलदेव और मसूद गाजी के ऐतिहासिक युद्ध की गाथाएं आज भी यहाँ की हवाओं में गूंजती हैं। हमने मौर्य, बौद्ध, मुगल और नवाबी काल की अनेक झलकियाँ देखी हैं, और 18वीं शताब्दी में यह अवध के नवाबों द्वारा शासित रहा हूँ। किसानों के एका आंदोलन का केंद्र रहा मैं, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का भी अहम हिस्सा भी रहा हूँ।

इतिहास किसी संग्रहालय में बंद तस्वीर नहीं होता। इतिहास वर्तमान से संवाद करता है और आने वाली पीढ़ियों को यह बताता है कि समाज ने किन परिस्थितियों में अपने रास्ते बनाए। बहराइच का इतिहास भी केवल राजाओं, युद्धों और शासन परिवर्तन की कथा नहीं है। इसके भीतर लोकजीवन, धार्मिक आस्था, सामाजिक संबंध, संघर्ष और सह-अस्तित्व की अनेक परतें हैं।

इसीलिए जब बहराइच की पहचान पर कोई संकट आता है तो चोट केवल आज के नागरिक को नहीं लगती, बल्कि वह उस सामूहिक स्मृति को भी घायल करती है जिसे पीढ़ियों ने संभालकर रखा है।

बहराइच आज हिंसा और नफरत की आग में क्यों जल रहा है?

लेकिन आज, इस गौरवशाली इतिहास के साये में, मैं,बहराइच जल रहा हूँ। वह धरती, जो कभी समर्पण, संघर्ष और वीरता की कहानियों का गवाह थी, आज हिंसा और नफरत की लपटों में घिर चुकी है। शहर का कोना-कोना दंगों की आग से धधक रहा है। वो गलियां, जिनमें कभी सत्य और शांति की बातें होती थीं, आज वहाँ दंगाई दहाड़ रहे हैं। मंदिरों के शिखर और मस्जिदों के मीनारों के बीच एक खामोश दर्द छुपा है, जो इतिहास की इस गौरवशाली भूमि को अंदर से खा रहा है।

यह दर्द सिर्फ खून से लाल हुई सड़कों का नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत का है जिसे हमने खो दिया है।

हिंसा के बाद सबसे पहले टूटता है विश्वास। घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं, बाजारों की आवाजें धीमी पड़ जाती हैं और पड़ोसी, जो कल तक एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे, एक-दूसरे को संदेह की नजर से देखने लगते हैं। किसी भी समाज के लिए इससे बड़ा संकट क्या हो सकता है कि उसके नागरिक अपने ही शहर में अपने आसपास के लोगों से भय महसूस करने लगें?

सत्ता की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं होती। सत्ता से यह भी अपेक्षा होती है कि वह समाज के भीतर भरोसा कायम करे, अफवाहों पर रोक लगाए, दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करे और आम नागरिक को यह विश्वास दिलाए कि उसकी सुरक्षा और सम्मान किसी राजनीतिक या सामुदायिक पहचान पर निर्भर नहीं है।

बहराइच की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर सवाल

बहराइच, जो कभी धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक था, आज नफरत और विभाजन की आग में झुलस रहा है। फकीर सैयद सालार मसूद और महाराजा सुहेलदेव की लड़ाई का यही वो बहराइच है, जो कभी अपने न्यायप्रिय शासक और सूफी संतों की गाथाओं के लिए जाना जाता था। आज के बहराइच में भी वही संघर्ष हो रहा है, लेकिन इस बार यह संघर्ष भीतर से है। एकता और भाईचारे का टुकड़ा-टुकड़ा हो जाना, उस सांस्कृतिक धरोहर का टूट जाना है जिसे सदियों से संजोया गया था।

इतिहास के पात्रों को लेकर समाज में अलग-अलग धारणाएँ हो सकती हैं। इतिहास पर बहस भी हो सकती है और उसके विभिन्न पक्षों को समझने की कोशिश भी की जा सकती है। लेकिन इतिहास की किसी स्मृति को वर्तमान की नफरत का ईंधन बना देना उस इतिहास के साथ भी अन्याय है और वर्तमान पीढ़ी के साथ भी।

बहराइच की सांस्कृतिक पहचान का अर्थ यही होना चाहिए कि अलग-अलग आस्थाओं और परंपराओं के लोग अपनी-अपनी पहचान के साथ एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करें। संस्कृति तब जीवित रहती है जब वह संवाद करती है; संस्कृति तब मरने लगती है जब उसे टकराव का हथियार बना दिया जाता है।

यहाँ की मिट्टी अब भी सुहेलदेव की वीरता की कहानियाँ सुनाती है, लेकिन क्या अब कोई सुनने वाला बचा है? क्या कोई उस महात्म्य को समझ पाएगा जो कभी बहराइच की पहचान थी? या फिर इस हिंसा और नफरत की आग में वह सब कुछ जलकर राख हो जाएगा, जो कभी हमारे पूर्वजों ने संजोया था?

यह सवाल केवल बहराइच से नहीं, हम सभी से है। आने वाली पीढ़ियाँ जब पीछे मुड़कर देखेंगी तो वे यह भी पूछेंगी कि जिस समय समाज के सामने अपने इतिहास और संस्कृति को बचाने की चुनौती थी, उस समय हमने क्या किया? क्या हमने आग को और हवा दी या उसे बुझाने के लिए पानी तलाशा? क्या हमने अफवाह को सच मान लिया या सत्य तक पहुँचने की कोशिश की? क्या हमने किसी समुदाय को दोषी मानकर स्वयं को निर्दोष समझ लिया या फिर कानून और न्याय को अपना रास्ता बनाया?

बहराइच की धरती का समाज और सत्ता से सवाल

आज, बहराइच की धरती आप सभी को पुकार रही है। वो आप सब से पूछ रही है कि क्या हम उसकी महानता को फिर से पहचान पाएंगे? क्या हम फिर से उसके गौरवशाली अतीत को जीवित कर पाएंगे? या फिर उसे दंगों की आग में जलने के लिए छोड़ देंगे?

मैं बहराइच हूँ। मैंने समय को बदलते देखा है। मैंने शासन बदलते देखे हैं। मैंने संघर्ष देखे हैं, उत्सव देखे हैं और पीढ़ियों को बदलते देखा है। मेरी इच्छा आज भी वही है—मेरे रास्तों पर फिर से विश्वास लौटे, मेरे बाजारों में फिर से सामान्य जीवन की आवाज सुनाई दे, मेरे घरों में भय की जगह उम्मीद हो और मेरे नागरिक अपनी पहचान के साथ एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा करें।

सत्ता से मेरा सवाल भी यही है कि इतिहास की इस धरती को केवल चुनावी भाषणों, राजनीतिक नारों या प्रशासनिक आंकड़ों में मत देखिए। बहराइच को उसके नागरिकों की आँखों से देखिए। उस माँ की आँखों से देखिए जो अपने बच्चे की सुरक्षा चाहती है। उस दुकानदार की आँखों से देखिए जो बिना भय के अपनी दुकान खोलना चाहता है। उस युवा की आँखों से देखिए जो अपने शहर को अवसरों और विकास के साथ देखना चाहता है। उस बुजुर्ग की आँखों से देखिए जिसने अपने जीवन में इस शहर को कई रूपों में बदलते देखा है।

और समाज से भी मेरा सवाल है—क्या हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? क्या हम अपने भीतर के गुस्से को विवेक से नियंत्रित कर पाएंगे? क्या हम अफवाहों और उकसावे से ऊपर उठकर सत्य को पहचानेंगे? क्या हम यह समझ पाएंगे कि किसी भी शहर की असली ताकत उसके मंदिरों, मस्जिदों, बाजारों या इमारतों से अधिक उसके नागरिकों के आपसी भरोसे में होती है?

मैं बहराइच हूँ। इतिहास ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मेरी आने वाली पीढ़ियों के लिए यह तय करना आपके हाथ में है कि उन्हें विरासत में इतिहास के आँसू मिलेंगे या शांति, भाईचारे और सांस्कृतिक समन्वय की वह रोशनी, जिसके सहारे कोई भी शहर अपने गौरवशाली अतीत से भविष्य की ओर बढ़ता है।

सवाल अभी भी वही है—मैं, बहराइच, इतिहास के आँसू वर्तमान की चिंगारियों में बहाने को क्यों हूँ मजबूर..? संस्कृति का यह सवाल आखिर सत्ता और समाज दोनों कब सुनेंगे?

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