संजय सिंह राणा का संघर्ष: क्या सच लिखने वाले पत्रकारों की सुरक्षा केवल भाषणों तक सीमित है?
न दबाव से समझौता, न सच से दूरी: संजय सिंह राणा की बेखौफ पत्रकारिता का सफर
चित्रकूट के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह राणा का संघर्ष आज पत्रकार सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वन माफियाओं के खिलाफ लगातार आवाज उठाने वाले राणा ने बुंदेलखंड के पाठा क्षेत्र में आदिवासी अधिकारों और सामाजिक जागरूकता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया। कथित हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्हें अब तक अपेक्षित न्याय नहीं मिल सका। यह मामला केवल एक पत्रकार पर हुए अत्याचार का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में सच बोलने वालों की सुरक्षा, पत्रकारों पर बढ़ते हमलों और प्रशासनिक जवाबदेही का भी महत्वपूर्ण विषय है। यह विशेष लेख संजय सिंह राणा के सामाजिक योगदान, पत्रकारिता के संघर्ष और न्याय की प्रतीक्षा की कहानी को विस्तार से प्रस्तुत करता है।
कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज यह स्तंभ स्वयं अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पत्रकारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। लगभग हर गली-मोहल्ले में एक-दो पत्रकार या स्वयंभू वरिष्ठ पत्रकार दिखाई पड़ जाते हैं। पत्रकारिता के इस विस्तार का सकारात्मक पक्ष भी है, लेकिन इसका एक चिंताजनक पहलू यह है कि वास्तविक और जनपक्षधर पत्रकारिता धीरे-धीरे हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है।
आज पत्रकारिता की गरिमा, निष्पक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले पत्रकार सबसे अधिक असुरक्षित हैं। कहीं रेत माफियाओं द्वारा पत्रकारों को कुचला जा रहा है, कहीं भूमाफियाओं और दबंगों द्वारा उन्हें धमकियां दी जा रही हैं। पत्रकारों पर हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन व्यवस्था की संवेदनशीलता घटती दिखाई दे रही है।
ऐसे ही संघर्षशील पत्रकारों में एक नाम है बुंदेलखंड और चित्रकूट क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह राणा का, जिन्होंने पिछले दो दशकों से पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया है। आज उनका जीवन इस सवाल का प्रतीक बन गया है कि क्या सच बोलने और जनहित की लड़ाई लड़ने वालों के लिए इस व्यवस्था में कोई जगह बची है?
बुंदेलखंड में पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार का पर्याय बने संजय सिंह राणा
चित्रकूट का पाठा क्षेत्र लंबे समय तक देश के सबसे पिछड़े और उपेक्षित क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। यहां रहने वाले आदिवासी समुदाय आधुनिक विकास की मुख्यधारा से काफी हद तक कटे हुए थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सरकारी योजनाओं की जानकारी तक उनकी पहुंच सीमित थी।
ऐसे समय में संजय सिंह राणा ने केवल समाचार संकलन का कार्य नहीं किया, बल्कि आदिवासी समाज के बीच जागरूकता फैलाने का अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों, सरकारी योजनाओं और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक किया। आदिवासी समुदाय को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाया और उन्हें शासन-प्रशासन से संवाद स्थापित करने का रास्ता दिखाया।
यदि आज पाठा क्षेत्र के अनेक परिवार सरकारी योजनाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं, तो उसमें संजय सिंह राणा जैसे सामाजिक सरोकार वाले पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
वन माफियाओं के खिलाफ आवाज़ उठाने की मिली दर्दनाक सजा
संजय सिंह राणा लगातार वन माफियाओं और अवैध गतिविधियों के खिलाफ समाचार प्रकाशित करते रहे। आरोप है कि इसी कारण उन्हें सुनियोजित तरीके से जीप के नीचे कुचलने का प्रयास किया गया। यह हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता और सच बोलने की ताकत पर हमला था।
इस घटना में उनका एक पैर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। लंबे उपचार और शुभचिंतकों के सहयोग के बाद वे किसी तरह चलने-फिरने की स्थिति में लौट सके। लेकिन यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि एक पत्रकार पर इतने गंभीर हमले के बाद भी न्याय की प्रक्रिया इतनी कमजोर क्यों दिखाई देती है?
आरोपियों की पहचान के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पीड़ित पत्रकार द्वारा आरोपियों की पहचान बताई जा चुकी थी, तो फिर प्रशासनिक कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? यदि अपराधियों के नाम और घटनाक्रम सामने थे, तो कानून का पहिया क्यों नहीं घूम सका?
यह केवल संजय सिंह राणा का मामला नहीं है। यह पूरे देश में पत्रकार सुरक्षा की स्थिति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। जब कोई पत्रकार माफियाओं, भ्रष्टाचार और अवैध कारोबार के खिलाफ लिखता है, तब क्या राज्य व्यवस्था उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाती है?
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी बताया जाता है कि घटना के बाद वर्षों तक किसी जिम्मेदार अधिकारी ने राणा की स्थिति जानने की गंभीर पहल नहीं की। यदि यह सच है, तो यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता क्यों?
देशभर में पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। कई पत्रकारों ने भ्रष्टाचार, खनन माफिया, भूमाफिया और वन माफियाओं के खिलाफ रिपोर्टिंग करते हुए अपनी जान गंवाई है। इसके बावजूद पत्रकार सुरक्षा को लेकर ठोस और प्रभावी कानून की मांग लंबे समय से लंबित है।
संजय सिंह राणा का मामला यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में पत्रकार केवल खबर लिखने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह समाज की आंख, कान और आवाज़ होता है। यदि वही असुरक्षित हो जाए तो लोकतंत्र का आधार कमजोर पड़ जाता है।
सम्मान और पुरस्कारों के बीच संघर्षरत पत्रकार
हर वर्ष विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान प्रदान किए जाते हैं। यह स्वागतयोग्य परंपरा है। लेकिन सम्मान का वास्तविक अर्थ केवल मंच, शॉल और प्रशस्ति पत्र नहीं होता। सम्मान का अर्थ है कठिन समय में समाज और व्यवस्था का उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना।
आज जब संजय सिंह राणा जैसे पत्रकार आर्थिक, शारीरिक और मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हम वास्तव में समाज के वास्तविक योद्धाओं को पहचान पा रहे हैं? क्या जनसेवा और सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष करने वालों को पर्याप्त संरक्षण और सम्मान मिल रहा है?
इतिहास याद रखेगा ऐसे जुझारू पत्रकारों को
समय के साथ सरकारें बदलती हैं, पद बदलते हैं और सत्ता के समीकरण बदल जाते हैं। लेकिन समाज के लिए किए गए कार्य इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। संजय सिंह राणा का संघर्ष भी उसी श्रेणी में दिखाई देता है।
उन्होंने आदिवासी समाज के बीच जागरूकता फैलाने, वन माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाने और जनहित के मुद्दों को सामने लाने का जो कार्य किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय रहेगा।
आज आवश्यकता केवल सहानुभूति की नहीं, बल्कि न्याय, सुरक्षा और सम्मान की है। यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाना है तो उन पत्रकारों की रक्षा करनी होगी जो सत्ता, माफिया और अन्याय के सामने झुकने के बजाय सच का साथ चुनते हैं।
सवाल आज भी वही है—क्या सच लिखने और समाज के लिए लड़ने वाले पत्रकारों की सुरक्षा केवल सरकारी भाषणों और घोषणाओं तक सीमित रहेगी, या फिर व्यवस्था वास्तव में उनके साथ खड़ी दिखाई देगी?







