बिलासपुर

भोजली चौक और प्रतिमा स्थापना की मांग तेज, लोक संस्कृति संरक्षण के लिए समिति ने महापौर से लगाई गुहार

तोरवा क्षेत्र में भोजली माता की प्रतिमा स्थापित करने की मांग, महिलाओं की आस्था और लोक परंपरा से जुड़ा है धान मंडी चौक

हरीश चन्द्र गुप्ता की रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक पर्वों को संरक्षित रखने की दिशा में बिलासपुर के तोरवा क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण मांग सामने आई है। बिलासपुर के तोरवा स्थित धान मंडी चौक को “भोजली चौक” घोषित कर वहां भोजली माता की प्रतिमा स्थापित किए जाने की मांग भोजली महोत्सव समिति द्वारा नगर निगम महापौर के समक्ष रखी गई है। समिति का कहना है कि यह स्थान वर्षों से लोक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है, इसलिए इसे सांस्कृतिक पहचान के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

समिति के पदाधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने विकास भवन पहुंचकर नगर निगम महापौर पूजा विधानी से मुलाकात की और ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि तोरवा गुंबर पेट्रोल पंप के पास स्थित धान मंडी चौक को आधिकारिक रूप से भोजली चौक के रूप में विकसित किया जाए। साथ ही वहां भोजली माता स्वरूप प्रतिमा स्थापित कर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को स्थायी पहचान दी जाए।

महिलाओं की आस्था का केंद्र है धान मंडी चौक

तोरवा का धान मंडी चौक लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का मुख्य स्थल रहा है। हर वर्ष भोजली पर्व, गौरा-गौरी विसर्जन और अन्य पारंपरिक आयोजनों के दौरान सैकड़ों महिलाओं की टोली इसी चौक से होकर भोजली घाट और छठ घाट तक जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह केवल एक चौक नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

भोजली महोत्सव समिति के सदस्यों ने बताया कि भोजली पर्व छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर्व में महिलाएं हरियाली, समृद्धि और सामाजिक सद्भाव की कामना करते हुए भोजली माता की पूजा करती हैं। विसर्जन यात्रा के दौरान पारंपरिक गीत, लोक वाद्य और सांस्कृतिक झांकियां क्षेत्र की पहचान बन चुकी हैं।

सड़क चौड़ीकरण के बीच सांस्कृतिक पहचान बचाने की मांग

समिति ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में तोरवा क्षेत्र के चौक-चौराहों और सड़कों का चौड़ीकरण एवं सौंदर्यीकरण कार्य तेजी से किया जा रहा है। ऐसे में यदि अभी भोजली चौक और प्रतिमा स्थापना का निर्णय लिया जाता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित हो सकेगा।

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि शहरों के आधुनिकीकरण के साथ-साथ लोक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को भी संरक्षित रखना आवश्यक है। यदि भोजली माता की प्रतिमा स्थापित होती है तो यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के रूप में भी विकसित हो सकता है।

लोक संस्कृति को जीवित रखने में समिति की अहम भूमिका

भोजली महोत्सव समिति पिछले कई वर्षों से क्षेत्र में लोक कला और पारंपरिक पर्वों को जीवित रखने का कार्य कर रही है। समिति के अध्यक्ष शंकर यादव ने बताया कि आधुनिकता के दौर में भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को बचाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भोजली पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि समिति हर वर्ष बड़े स्तर पर भोजली महोत्सव का आयोजन करती है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं, युवा और स्थानीय नागरिक भाग लेते हैं। लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

महापौर से सकारात्मक पहल की उम्मीद

समिति के सदस्यों ने महापौर से आग्रह किया कि शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए भोजली चौक और प्रतिमा स्थापना की मांग को गंभीरता से लिया जाए। उनका कहना है कि इससे न केवल लोक आस्था को सम्मान मिलेगा, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक छवि भी मजबूत होगी।

स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि नगर निगम प्रशासन इस मांग पर सकारात्मक निर्णय लेते हुए तोरवा क्षेत्र को एक नई सांस्कृतिक पहचान देगा। यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो आने वाले समय में भोजली चौक शहर के प्रमुख सांस्कृतिक स्थलों में शामिल हो सकता है।

समिति के सदस्य रहे उपस्थित

इस दौरान भोजली महोत्सव समिति के कई पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से घनश्याम रजक, चंदन यादव, हजारी सूर्यवंशी, नंदकिशोर यादव, सुनील भोई, नारायण श्रीवास, सुरेश दास मानिकपुरी, बृजभूषण सरवन, गोपाल यादव और अमित यादव सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में लोक संस्कृति संरक्षण के लिए भोजली चौक और प्रतिमा स्थापना की मांग को आवश्यक बताया।

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