अलीगढ़

मंदिर हटाने के नोटिस पर विवाद गहराया, मंदिर समिति ने उठाई निष्पक्ष जांच और वैकल्पिक समाधान की मांग

 

ठाकुर बक्शी सिंह की रिपोर्ट

क्रिस्टोफर के खैरेश्वर चौक स्थित प्राचीन बालाजी मंदिर को हटाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएच धर्मशाला) द्वारा जारी नोटिस में स्थानीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा किया गया है। यह मामला अब केवल गैर कानूनी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक आस्था, कानूनी प्रक्रिया और विकास के बीच संतुलन का महत्व बन गया है। टेम्पल कमेटी ने इस कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि जब भी कोर्ट में विचार किया जाए, तब किसी भी प्रकार की शिकायत न की जाए और न ही न्यायसंगत हो।

मंदिर समिति के सदस्यों का कहना है कि खैरेश्वर चौराहे पर स्थित यह बालाजी मंदिर वर्ष 2008 से पहले स्थापित हुआ था और यह क्षेत्रवासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में कलाकार पूजा-प्रतिष्ठा करने आते हैं। ऐसे में इस धार्मिक स्थल को हटाने का निर्णय स्थानीय लोगों की भावनाओं को आहत कर सकता है। समिति का यह भी कहना है कि भूमि अधिग्रहण के अधिकार के तहत “सेक्शन 3जी अवार्ड” में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि टेम्पल का केवल आंशिक हिस्सा ही अधिग्रहण क्षेत्र में है, और इसके समाधान के लिए मैत्रीपूर्ण सहमति को अलग रखा जाएगा।

समिति ने यह भी याद दिलाया कि साल 2012 में इसी मुद्दे को लेकर कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई थी। उस समय कोर्ट ने मंदिर समिति के पक्ष को सही माना था और एनएच भवन को अपनी कार्रवाई से पीछे हटना पड़ा था। ऐसे में अब एक बार फिर से मंदिर को “अवैध कब्ज़ा” से हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। समिति के अनुसार, यह केवल पुराने निर्णयों की अनदेखी नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय प्रक्रिया का भी उल्लंघन होता है।

हाल ही में एनएच फिल्म द्वारा धारा 26 के तहत मंदिर पर अवैध कब्जे का नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस में मंदिर समिति से कहा गया है कि वे स्वयं मंदिर को हटाने की कार्रवाई करें। हालाँकि, समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस आदेश का पालन तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि मामले में वैज्ञानिक जांच नहीं की गई और सभी अध्ययनों के बाद कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।

मंदिर समिति का रुख साफ है कि वे विकास कार्य के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सड़कें और चट्टानी ओवरऑल जैसी परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने का समाधान नहीं किया जा सकता है। समिति ने “पिलर बेस्ड नॉटीओवर” जैसे वैकल्पिक मॉडल की सिफारिश की है, जिससे विकास कार्य भी बाधित नहीं होगा और मंदिर भी सुरक्षित रहेगा। उनका मानना ​​है कि यदि प्रशासन इच्छाशक्ति सक्रिय है, तो तीक्ष्णता के हितों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उद्योग को बढ़ावा दिया जा सकता है।

इस मामले को लेकर मंदिर समिति ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम को मंजूरी दे दी है। साथ ही एनएच होटल के उच्च अधिकारियों को भी पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की गई है। समिति ने प्रशासन से अपील की है कि किसी भी प्रकार की आवंटन कार्रवाई से पहले जांच की जाए और सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाए।

महत्वपूर्ण बात यह है कि 21 अप्रैल 2026 को मंदिर समिति के प्रतिनिधि ने सेंट्रल रोड ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के निदेशक से भी मुलाकात की थी। इस मुलाक़ात के बाद मंत्री कार्यालय की ओर से मामले के तकनीकी अध्ययन के निर्देश लखनऊ स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को दिए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि केंद्र स्तर पर भी इस मामले में चयन किया जा रहा है।

इसके अलावा एनएचएम प्रोजेक्ट प्रोजेक्ट के निदेशक लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत यादव ने प्रशासन को जानकारी दी है कि मंदिर समिति ने नोटिस बैठक के बाद स्वयं मंदिर की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। प्रशासन अब इस मामले पर आगे की कार्रवाई पर विचार कर रहा है।

प्रेस वार्ता के दौरान मंदिर समिति के कई प्रमुख सदस्य मौजूद रहे, जिनमें अंसल वार्ष्णेय, शुभम वार्ष्णेय, विवेक वार्ष्णेय, नीरज काका, अरविंद वार्ष्णेय, सुभाष चंद्र गुप्ता, गोपाल गुप्ता, केशव गुप्ता और अनिल राज शामिल हैं। सभी ने एक स्वर में कहा कि वे कानून का सम्मान करते हैं, लेकिन अपनी आस्था और अधिकार की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।

यह मामला अब प्रशासन, न्यायिक और स्थानीय जनता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती बन गया है। एक ओर जहां विकास कार्यों को गति देना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक स्थलों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस प्रेरक मुद्दे का समाधान किस तरह निकालता है।

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