20 अक्टूबर 2026 4:48 अपराह्न

शिक्षक की नौकरी छोड़ी, सिद्धांतों को चुना ; गरीबों-कर्मचारियों के अधिकारों के लिए छह दशक से जारी है संघर्ष

समाजसेवी एवं कर्मचारी नेता सत्य नारायण त्रिपाठी और प्रस्तुति दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर के साथ छह दशक के संघर्ष को दर्शाती फीचर इमेज

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आलेख- दिलीप शुक्ला
प्रस्तुति – दुर्गा प्रसाद शुक्ला

भौतिक सुख-सुविधाओं और व्यक्तिगत सफलता को जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानने वाले दौर में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही दिखाई देते हैं, जिन्होंने सम्मानजनक नौकरी, निजी सुविधाओं और पारिवारिक सुख से अधिक महत्व समाजसेवा, सिद्धांत और मेहनतकश वर्ग के अधिकारों को दिया हो। गोंडा जिले के सत्य नारायण त्रिपाठी इसी विरल परंपरा के ऐसे कर्मठ और संघर्षशील व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने शिक्षक की नौकरी मिलने के बावजूद अपने वैचारिक सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और महज एक वर्ष के भीतर नौकरी छोड़कर समाज तथा कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया।

सत्य नारायण त्रिपाठी का सार्वजनिक जीवन छह दशक से अधिक समय से संघर्ष, सादगी, ईमानदारी और संगठनात्मक सक्रियता से जुड़ा रहा है। गरीबों, भूमिहीनों, मजदूरों, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों के लिए आंदोलनों में भाग लेते हुए उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उनका दावा है कि इन संघर्षों का उद्देश्य कभी व्यक्तिगत लाभ हासिल करना नहीं रहा, बल्कि उन लोगों की आवाज बनना रहा है, जो अपनी बात सत्ता और प्रशासन के सामने मजबूती से नहीं रख पाते।

सिंघवापुर गांव में हुआ जन्म, संघर्षशील जीवन की पड़ी नींव

सत्य नारायण त्रिपाठी का जन्म एक जनवरी 1943 को गोंडा जिले की सदर तहसील क्षेत्र के सिंघवापुर गांव में राम अभिलाख त्रिपाठी और सुब्बा देवी के घर हुआ। चार भाइयों और दो बहनों में वे सबसे बड़े थे। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े त्रिपाठी ने प्रारंभिक शिक्षा निकटवर्ती बसालतपुर गांव में प्राप्त की। इसके बाद जिला मुख्यालय स्थित टामसन इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट और बलरामपुर के एमएलके कॉलेज से वर्ष 1964 में स्नातक की शिक्षा पूरी की।

शिक्षा के दौरान ही उनके भीतर सामाजिक सरोकारों और समाज के कमजोर तबकों के प्रति संवेदनशीलता विकसित होने लगी थी। कॉलेज के दिनों में वामपंथी विचारधारा से जुड़े नेताओं का संपर्क उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।

1962 में स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़कर शुरू किया सार्वजनिक जीवन

एमएलके कॉलेज, बलरामपुर में अध्ययन के दौरान प्रख्यात आरएसपी नेता केशव प्रसाद शुक्ला तथा कामरेड झारखण्डे राय के संपर्क ने सत्य नारायण त्रिपाठी को सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया। वर्ष 1962 में कामरेड झारखण्डे राय और कामरेड सरजू पाण्डेय ने उनके सदस्यता फार्म के प्रस्तावक और समर्थक बनकर उन्हें स्टूडेंट फेडरेशन से जोड़ा।

यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई। उन्होंने छात्रसंघ का चुनाव भले ही नहीं लड़ा, लेकिन छात्रों के बीच उनकी सक्रियता और लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। छात्र समस्याओं, सामाजिक मुद्दों और जनहित के सवालों को लेकर उनकी सक्रियता ने आगे चलकर उन्हें कर्मचारी और श्रमिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया।

शिक्षक की नौकरी मिली, लेकिन सिद्धांतों से समझौता मंजूर नहीं हुआ

वर्ष 1966 में सत्य नारायण त्रिपाठी को बाबागंज स्थित संत सहजवन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिली। एक युवा के लिए उस दौर में शिक्षक की सरकारी अथवा सम्मानजनक नौकरी जीवन की बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। लेकिन त्रिपाठी ने नौकरी को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना।

विद्यालय में रहते हुए उन्होंने शिक्षक समस्याओं और सामाजिक मुद्दों को लेकर संगठनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेना जारी रखा। उन्होंने साथियों के साथ शिक्षक संगठन बनाया और उन्हें संगठन का सचिव बनाया गया। इसी दौरान राजनीतिक और वैचारिक गतिविधियों को लेकर विद्यालय प्रबंधन के साथ मतभेद बढ़ने लगे।

वर्ष 1967 में चुनावी गतिविधियों के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन को लेकर भी उनसे प्रचार करने के लिए कहा गया। स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े होने और अपने वैचारिक सिद्धांतों के कारण उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रबंधन के साथ उनके संबंधों में और तल्खी आई।

प्रबंधन की ओर से सामाजिक गतिविधियों और शिक्षक समस्याओं से जुड़े आंदोलनों में उनकी भागीदारी पर रोक लगाने की कोशिश हुई। समझौते के प्रयास भी हुए, लेकिन त्रिपाठी ने अंततः नौकरी को अपने सामाजिक मिशन में बाधा मानते हुए त्यागपत्र दे दिया।

यह फैसला उनके जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। उन्होंने नियमित नौकरी की सुरक्षा छोड़कर संघर्ष का रास्ता चुना।

झारखण्डे राय और सरजू पाण्डेय को माना वैचारिक गुरु

सत्य नारायण त्रिपाठी अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन की प्रेरणा का श्रेय कामरेड झारखण्डे राय और कामरेड सरजू पाण्डेय को देते हैं। उनका कहना है कि इन दोनों नेताओं के सादगीपूर्ण जीवन, ईमानदारी और मेहनतकश वर्ग के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

उनके अनुसार, उस दौर के कई जनप्रतिनिधि सीमित वेतन और सुविधाओं के बावजूद सार्वजनिक जीवन में सादगी, ईमानदारी और जनप्रतिबद्धता की मिसाल पेश करते थे। झारखण्डे राय और सरजू पाण्डेय उनके लिए केवल राजनीतिक नेता नहीं बल्कि वैचारिक गुरु थे।

इन्हीं प्रेरणाओं के कारण उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा जनसंघर्ष को प्राथमिकता दी और लंबे समय तक मजदूरों, कर्मचारियों तथा गरीबों के बीच सक्रिय रहे।

गरीबों और कर्मचारियों की लड़ाई में कई बार गए जेल

नौकरी छोड़ने के बाद सत्य नारायण त्रिपाठी कर्मचारी संगठनों और सामाजिक आंदोलनों से पूरी तरह जुड़ गए। शिक्षक और कर्मचारियों की समस्याओं के साथ-साथ भूमिहीन गरीबों के अधिकारों को लेकर भी उन्होंने आंदोलनों में हिस्सा लिया।

सत्तर के दशक में भूमिहीन गरीबों को ग्राम समाज की खाली जमीन पर अधिकार दिलाने के लिए चलाए गए आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उनका कहना है कि संघर्ष के दबाव के बाद पात्र भूमिहीनों को जमीन के पट्टे मिलने लगे और उन्हें कब्जा दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

उनके लिए आंदोलन केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं था। वे इसे प्रशासनिक व्यवस्था में गरीबों की हिस्सेदारी और अधिकार सुनिश्चित करने का माध्यम मानते रहे।

बाढ़ राहत में अनियमितता के खिलाफ उठाई आवाज

सत्य नारायण त्रिपाठी अपने संघर्षपूर्ण जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि गोंडा में भीषण बारिश और बाढ़ के दौरान बड़ी संख्या में गरीबों के मकान गिर गए थे। राहत और अनुदान राशि के वितरण में कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं।

उन्होंने तत्कालीन प्रशासन के सामने पात्र लोगों को राहत दिलाने की मांग उठाई। उनके अनुसार, जब उन्होंने बड़ी संख्या में प्रार्थना पत्र प्रशासन तक पहुंचाए तो मामला गंभीर हो गया। बाद में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी और कामरेड झारखण्डे राय से संपर्क किया।

त्रिपाठी के मुताबिक, इस मामले के बाद गोंडा में जिलाधिकारी का तबादला हुआ और अनुदान वितरण की जांच की घोषणा की गई। उनका दावा है कि जांच में अनियमितताएं सामने आने के बाद संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भी हुई।

यह घटना उनके जीवन में प्रशासनिक जवाबदेही के लिए किए गए संघर्षों की एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में सामने आती है।

20 हजार से अधिक लोगों की आजीविका से जोड़ने का दावा

सत्य नारायण त्रिपाठी के लंबे सार्वजनिक जीवन में कर्मचारी संगठनों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। वे दावा करते हैं कि उनके प्रयासों और आंदोलनों के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार और आजीविका से जुड़ी सुविधाएं हासिल करने में मदद मिली।

उनका कहना है कि कर्मचारी आंदोलन केवल वेतन बढ़ाने का संघर्ष नहीं है, बल्कि नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, समान कार्य के लिए समान वेतन और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों की लड़ाई भी है।

वे लंबे समय से मानते रहे हैं कि श्रमिक और कर्मचारी संगठन तभी प्रभावी हो सकते हैं जब वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सामूहिक हितों को प्राथमिकता दें।

ट्रेड यूनियन आंदोलन में छह दशक की सक्रियता

सत्य नारायण त्रिपाठी वर्ष 1967 से उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग कर्मचारी संघ से जुड़े रहे हैं। समय के साथ उन्होंने कर्मचारी और श्रमिक संगठनों में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं।

वे अपने लंबे संगठनात्मक जीवन में उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष, राज्य कर्मचारी महासंघ के मंडल अध्यक्ष, संविदा श्रमिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष और एटक सहित विभिन्न ट्रेड यूनियन संगठनों में जिम्मेदारियां निभाने की बात कहते हैं।

उनकी सक्रियता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी लंबे समय तक जुड़ी रही। वर्ष 1995 के बाद वे कई बार पार्टी के जिला मंत्री रहे और प्रदेश अनुशासन समिति में भी जिम्मेदारी निभाई।

उनका सार्वजनिक जीवन किसी एक पद तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अलग-अलग कर्मचारी और श्रमिक संगठनों के मंच से मेहनतकश वर्ग की समस्याओं को उठाया।

यूनियनों में बढ़ते व्यक्तिवाद से चिंतित

आज के ट्रेड यूनियन आंदोलन को लेकर सत्य नारायण त्रिपाठी की चिंता भी स्पष्ट है। उनका कहना है कि श्रमिक संगठनों के बीच एकता कमजोर होने का नुकसान सबसे अधिक कर्मचारियों और मजदूरों को उठाना पड़ रहा है।

उनके अनुसार, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या बढ़ी और आउटसोर्सिंग जैसी व्यवस्थाओं का विस्तार हुआ। ऐसे समय में ट्रेड यूनियनों की एकजुटता और अधिक जरूरी थी।

वे कहते हैं कि विभिन्न झंडों और संगठनों के बावजूद मेहनतकश लोगों को अपने साझा हितों के लिए एक मंच पर आना चाहिए। उनके अनुसार, जब यूनियनें व्यक्तिगत स्वार्थ, गुटबाजी और संगठनात्मक वर्चस्व की राजनीति में उलझती हैं तो वास्तविक कर्मचारी हित पीछे छूट जाते हैं।

पुरानी पेंशन व्यवस्था को लेकर संघर्ष जारी

सत्य नारायण त्रिपाठी के वर्तमान संघर्षों में कर्मचारियों की पेंशन का मुद्दा भी प्रमुख है। वे विशेष रूप से उन कर्मचारियों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं, जिन्होंने दैनिक वेतन, तदर्थ या कार्यप्रभारित व्यवस्था में लंबे समय तक सेवाएं दीं और बाद में नियमित हुए।

उनका तर्क है कि यदि किसी कर्मचारी ने दशकों तक लगातार सेवा की है तो केवल नियमितीकरण की तारीख के आधार पर उसकी पूरी सेवा अवधि को पेंशन संबंधी लाभों से अलग करना न्यायसंगत नहीं होना चाहिए।

वे पेंशन को कर्मचारियों के बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी का दावा

लोक निर्माण विभाग कर्मचारी संघ से जुड़े अपने दायित्वों के तहत सत्य नारायण त्रिपाठी ने ऐसे कर्मचारियों के पेंशन और ग्रेच्युटी संबंधी अधिकारों के लिए न्यायिक लड़ाई आगे बढ़ाने की बात कही है।

उनका कहना है कि कई कर्मचारी लंबे समय तक दैनिक वेतन या वर्कचार्ज व्यवस्था में सेवा करने के बाद नियमित हुए, लेकिन उनकी पुरानी सेवा को पेंशन योग्य सेवा में शामिल नहीं किया गया। इससे ऐसे कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

वे इस मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाने की बात कहते हैं। हालांकि इस संबंध में लागू नियमों, संबंधित न्यायिक आदेशों और राज्य सरकार की नीतियों की स्थिति को प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर देखना आवश्यक होगा।

निजी जीवन में भी सादगी और त्याग

सत्य नारायण त्रिपाठी का निजी जीवन भी उनके सार्वजनिक जीवन की तरह सादगी से जुड़ा रहा। पत्नी के निधन के बाद उन्होंने आजीवन अकेले रहकर समाजसेवा को प्राथमिकता देने का संकल्प लिया।

नगर के सुभाष नगर स्थित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय में रहकर उन्होंने लंबे समय तक संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाया। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा कर्मचारी कार्यालयों, आंदोलनों, बैठकों, धरनों और जनसरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों में बीता।

वे अपने जीवन को उपलब्धियों की सूची के बजाय संघर्षों की यात्रा के रूप में देखते हैं।

घर-परिवार से अधिक समाज को दिया समय

सत्य नारायण त्रिपाठी का कहना है कि उन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया भी है। सामाजिक संघर्षों में लगातार सक्रिय रहने के कारण निजी जीवन के लिए समय कम मिला। लेकिन उन्हें इस बात का संतोष है कि उन्होंने अपना जीवन मेहनतकश और वंचित वर्ग की आवाज उठाने में लगाया।

उनके शब्दों में समाजसेवा से उन्हें आत्मिक शांति मिलती है। आज उम्र के आठवें दशक को पार करने के बावजूद उनका कहना है कि संघर्ष के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई है।

हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जिस कर्मचारी और श्रमिक एकता का सपना लेकर उन्होंने अपना जीवन लगाया, वह आज पहले जैसी मजबूत नहीं दिखाई देती।

छह दशक बाद भी संघर्ष की लौ कायम

सत्य नारायण त्रिपाठी की जीवन यात्रा को केवल एक कर्मचारी नेता की कहानी मानना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। यह कहानी उस पीढ़ी की भी कहानी है, जिसने सार्वजनिक जीवन में विचारधारा, सादगी और त्याग को महत्व दिया।

एक ओर जहां उन्होंने शिक्षक की सुरक्षित और सम्मानित नौकरी छोड़ी, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपना जीवन उन लोगों के लिए समर्पित किया जिनके पास अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के सीमित साधन थे।

भूमिहीनों के लिए जमीन का सवाल हो, कर्मचारियों की सेवा शर्तें हों, मजदूरों का शोषण हो या पेंशन का मुद्दा—उनके सार्वजनिक जीवन की धुरी हमेशा मेहनतकश और वंचित वर्ग के अधिकारों के आसपास रही।

आज जब सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत लाभ, पद और सुविधा को लेकर लगातार सवाल उठते हैं, ऐसे समय में सत्य नारायण त्रिपाठी का जीवन यह सवाल भी सामने रखता है कि क्या राजनीति और सामाजिक आंदोलन अभी भी त्याग, सिद्धांत और जनप्रतिबद्धता के रास्ते पर चल सकते हैं?

सत्य नारायण त्रिपाठी का जवाब उनके छह दशक लंबे सार्वजनिक जीवन में दिखाई देता है। शिक्षक की नौकरी छोड़ने से शुरू हुई उनकी संघर्ष यात्रा आज भी जारी है। उम्र बढ़ी, परिस्थितियां बदलीं, कर्मचारी आंदोलनों का स्वरूप बदला और राजनीतिक परिदृश्य भी कई बार बदला, लेकिन उनके अनुसार मेहनतकश लोगों के अधिकारों की लड़ाई की जरूरत आज भी उतनी ही है।

यही कारण है कि गोंडा के सार्वजनिक जीवन में सत्य नारायण त्रिपाठी की पहचान एक ऐसे कर्मचारी नेता और समाजसेवी के रूप में बनी हुई है, जिसने व्यक्तिगत सुविधा की अपेक्षा सिद्धांतों को चुना और संघर्ष को ही अपने जीवन का आधार बनाया।

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