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जरा सी लापरवाही के चलते स्कूल के सभी 76 छात्र कैसे हो गये फेल❓आइए जानते हैं

प्रैक्टिकल अंक अपलोड न होने से छात्रों पर टूटा संकट, अभिभावकों में गुस्सा

रिपोर्टर ठाकुर बख्श सिंह

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। यहां एक छोटी सी लापरवाही ने 76 छात्रों के पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर दिया और उन्हें ‘फेल’ का तमगा झेलने को मजबूर कर दिया। यह मामला सर्वोदय इंटर कॉलेज से जुड़ा है, जहां प्रशासनिक चूक के कारण हाईस्कूल के छात्रों की मार्कशीट में भारी गड़बड़ी सामने आई है।

यूपी बोर्ड का रिजल्ट जैसे ही घोषित हुआ, अन्य स्कूलों में जहां खुशी का माहौल था, वहीं इस कॉलेज में निराशा और आक्रोश का माहौल बन गया। छात्रों ने जब अपनी मार्कशीट देखी, तो वे हैरान रह गए। अधिकांश छात्रों के प्रैक्टिकल (प्रयोगात्मक परीक्षा) के अंक ‘अनुपस्थित’ या ‘शून्य’ दर्ज किए गए थे, जबकि उन्होंने सभी परीक्षाएं दी थीं।

मेहनत के बावजूद मिला फेल का झटका

छात्रों का कहना है कि उन्होंने पूरे साल मेहनत की और लिखित परीक्षाओं में अच्छे अंक भी प्राप्त किए। प्रैक्टिकल परीक्षाओं में भी उन्होंने पूरी ईमानदारी से भाग लिया था। उन्हें विश्वास था कि उनका परिणाम अच्छा आएगा, लेकिन जब मार्कशीट सामने आई, तो उनकी उम्मीदें टूट गईं।

प्रैक्टिकल के अंक न जुड़ने के कारण बोर्ड के नियमों के अनुसार उन्हें फेल घोषित कर दिया गया। यह स्थिति छात्रों के लिए बेहद निराशाजनक और मानसिक रूप से परेशान करने वाली है। कई छात्र तो अपने आगे के करियर की योजना बना चुके थे, लेकिन अब वे असमंजस की स्थिति में हैं।

कहां हुई चूक? सामने आई बड़ी लापरवाही

मामले की जांच में जो जानकारी सामने आई, उसने सभी को चौंका दिया। बताया जा रहा है कि कॉलेज प्रशासन की ओर से प्रैक्टिकल परीक्षा के अंक समय पर यूपी बोर्ड के पोर्टल पर अपलोड ही नहीं किए गए।

यह जिम्मेदारी स्कूल के क्लर्क या संबंधित कर्मचारी की थी, लेकिन उनकी लापरवाही के कारण यह महत्वपूर्ण कार्य अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप बोर्ड के पास छात्रों के प्रैक्टिकल अंकों का डेटा नहीं पहुंचा और सिस्टम ने उन्हें ‘अनुपस्थित’ मानते हुए फेल घोषित कर दिया।

एक छोटी सी प्रशासनिक गलती ने 76 छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया, जो शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विफलता को दर्शाता है।

अभिभावकों का फूटा गुस्सा

इस घटना के सामने आने के बाद से अभिभावकों में भारी आक्रोश है। स्कूल परिसर में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है और अभिभावक लगातार स्कूल प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं।

उनका कहना है कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए नियमित रूप से फीस जमा करते हैं और स्कूल पर भरोसा करते हैं। लेकिन जब स्कूल ही अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता, तो इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है।

कई अभिभावकों ने यह भी कहा कि उनके बच्चे मानसिक रूप से बेहद परेशान हैं। रिजल्ट के बाद से वे तनाव में हैं और भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

छात्रों के भविष्य पर संकट

इस घटना ने छात्रों के भविष्य को अनिश्चितता में डाल दिया है। जिन छात्रों को अब इंटरमीडिएट में प्रवेश लेना था, वे अब इंतजार की स्थिति में हैं। यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो उनका एक पूरा शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो सकता है।

छात्र लगातार शिक्षा विभाग और बोर्ड अधिकारियों से गुहार लगा रहे हैं कि उनकी समस्या का जल्द समाधान किया जाए। उनका सवाल है कि जब गलती उनकी नहीं है, तो सजा उन्हें क्यों दी जा रही है?

जिम्मेदारी तय करने की मांग

यह मामला केवल एक स्कूल की लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से छात्रों का मनोबल टूटता है और शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास कम होता है।

अब जरूरत है कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं।

समाधान की उम्मीद में छात्र

फिलहाल छात्र और उनके अभिभावक प्रशासन से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जल्द ही प्रैक्टिकल के अंक अपडेट किए जाएंगे और संशोधित परिणाम जारी होगा।

यदि समय रहते सही कदम उठाए गए, तो इन छात्रों का भविष्य बचाया जा सकता है। लेकिन यह घटना एक बड़ा सबक है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जरा सी लापरवाही भी कितनी भारी पड़ सकती है।

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