जमीन के रिकॉर्ड होंगे पूरी तरह पारदर्शी, जानिए धारा 34 और दाखिल-खारिज की संपूर्ण प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग द्वारा भूमि पर कब्ज़ा करने एवं भूमि अभिलेखों पर कब्ज़ा करने हेतु धारा 34 के तहत भू-खारिज प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जा रही है। रजिस्ट्री के बाद नामांतरण कानूनी रूप से आवश्यक है, जिससे नए मालिक का नाम खतौनी में दर्ज किया जा सके। प्रशासन को समय पर नाम परिवर्तन के लिए सलाह दी जा रही है ताकि भविष्य में भूमि में महामहिम और वैधानिक भूमि को स्थापित किया जा सके।
रिपोर्ट:संजय सिंह राणा
उत्तर प्रदेश के पुरातत्व संहिता, 2006 के 34 के अंतर्गत नामांतरण (दाखिल-ख़ारिज) की प्रक्रिया को विशेष महत्व दिया जा रहा है। प्रशासन का मानना है कि यदि भूमि से संबंधित अभिलेखों को समय पर अद्यतन किया जाए तो भविष्य में अधिकांश भूमि को मस्जिद से हटाया जा सकता है।
भूमि या विरासत में प्राप्त होने के बाद केवल रजिस्टर प्रमाण पत्र नहीं होता है। असल में सरकारी अभिलेखों में मालिकाना हक के लिए आवेदन-खारिज लेना अनिवार्य माना जाता है। यही कारण है कि जिला प्रशासन लोगों को इस प्रक्रिया के प्रति अनुसंधान के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
धारा 34 का प्रावधान क्या है?
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 34 भूमि के नामांतरण से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था है। इस धारा के अनुसार यदि किसी व्यक्ति ने जमीन का विवरण दिया है, विरासत में उसे संपत्ति मिली है, वसीयत के आधार पर स्वामित्व प्राप्त है या परिवार के स्वामित्व वाली भूमि उसकी विशिष्टता में है, तो उसे निर्धारित समय के भीतर राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करना आवश्यक है।
धारा 34 का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अभिलेखों में भूमि के वास्तविक स्वामी का नाम दर्ज हो और भविष्य में स्वामित्व में लेकर किसी प्रकार का भ्रम या विवाद न हो।
पैगम्बर-ख़रीज़ का अर्थ क्या है?
पैगम्बर-खारिज एक आदर्श अरबी शब्द है। इसमें “दाखिल” का अर्थ नए मालिक का नाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज किया जाता है, जबकि “ख़ारिज” का अर्थ पुराने मालिक का नाम अलग किया जाता है।
जब किसी भूमि का स्वामित्व एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास होता है, तब राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में इस बदलाव को दर्ज करने की प्रक्रिया ही अंतिम-खारिज कहलाती है। इस प्रक्रिया के बाद ही स्वामी का नाम खतौनी में दर्ज होता है और उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में वैध भूमि स्वामी माना जाता है।
केवल वास्तुकला व्यवस्था क्यों नहीं?
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि जमीन की रजिस्ट्री हो जाने के बाद उनकी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो गई है। जबकि वास्तविकता यह है कि रजिस्ट्रीकरण केवल स्वामित्व वाले पासपोर्ट का दस्तावेजी प्रमाण है।
यदि रजिस्ट्री के बाद नामांतरण नहीं होता तो खतौनी और राजस्व अभिलेखों में पुराने मालिक का नाम ही दर्ज रहता है। ऐसी स्थिति में भविष्य में ऋण लेना, भूमि पर कब्ज़ा करना, सरकारी मंज़ूरी का लाभ लेना या स्वामित्व प्रमाणित करने में ज़मीन पर कब्ज़ा करना पड़ सकता है। रजिस्ट्रीकरण के तुरंत बाद पैस्ले-खारिज की सलाह भी दी जाती है।
इंटरनेट ने लोगों को सलाहकार बनाया
क्राइस्टचर्च ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से नागरिकों को धारा 34 के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जिलों में भूमि अभिलेखों को पूरी तरह से सही, संरक्षित और विवादमुक्त बनाए रखने के लिए उनके नामकरण की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को नाम परिवर्तन की प्रक्रिया में कोई रुचि नहीं है तो वह समय पर पूर्णता के साथ बात कर सकता है। इससे संबंधित सभी स्टार्स को जस्टिससंगत का अवसर मिलता है और स्टार्स की सामग्रियां प्रमाणित होती हैं।
पासपोर्ट में अंतिम-खारिज की पूरी प्रक्रिया
आवेदन करना पहला चरण
भूमि का पंजीकरण होने के बाद संबंधित व्यक्ति का नाम परिवर्तन के लिए आवेदन करना होता है। यह आवेदन तहसील कार्यालय में ऑनलाइन या ऑफ़लाइन पोर्टल के माध्यम से किया जा सकता है।
आवश्यक जमा करना
आवेदन के साथ कुछ आवश्यक दस्तावेज संलग्न होने होते हैं। इनमें से मुख्य रूप से—
- पंजीकृत वैयक्तिक विलेख (रजिस्ट्री)
- खतौनी की प्रति
- आधार कार्ड
- पहचान पत्र
- शपथ पत्र
जैसे अवलोकन शामिल होते हैं।
राजस्व विभाग द्वारा जांच
आवेदन प्राप्त होने के बाद नामांकित संबंधित दस्तावेजों की जांच के निर्देश दिए जाते हैं। वकील के स्वामित्व वाली भूमि की स्थिति और दस्तावेज़ का सत्यापन किया जाता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाती है।
नोटिस और कौशल का अवसर
नामांतरण प्रक्रिया में फ़्लैट बनाए रखने के लिए संबंधित स्टाइक को जारी करने की सूचना दी जाती है। अगर किसी व्यक्ति का नाम दोस्ती पर है तो वह अवधि के अंदर अपना परिचय करा सकता है।
आम तौर पर 30 दिनों के लिए दस्तावेज़ों में प्रवेश किया जाता है। इस दौरान सभी स्टार्स को अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है।
अंतिम आदेश और नाम दर्ज होना
यदि जांच के दौरान कोई विवाद सामने नहीं आता है और कोई वैध वैदिक प्रमाण नहीं मिलता है तो केवल नाम प्रारूप का उद्धरण प्रदान किया जाता है। इसके बाद नए स्वामी का नाम खतौनी और अन्य राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया है।
भूमि विवाद कम करने में अहम भूमिका
विशेषज्ञ का मानना है कि समय पर प्लाई-खारिज व्युत्पत्ति से भूमि शास्त्रीय औषधि में कमी आती है। कई मामलों में साझीदार तक के कारोबार वाले साझीदार की वजह यही है कि असली स्वामी का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जाता है।
धारा 34 के अंतर्गत नामांतरण की व्यवस्था और अभिलेखों का अद्यतनीकरण किया जाता है, बल्कि किसानों, भूमिधरों और आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाती है।
नागरिकों के लिए प्रशासन की अपील
जिला प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि जमीन की पहचान, विरासत प्राप्त करने या किसी अन्य माध्यम से संपत्ति का स्वामित्व हासिल करने के बाद जल्द से जल्द नाम परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी करें। इसे न केवल सरकारी रिकॉर्ड सही कहा गया है बल्कि भविष्य में किसी भी प्रकार की कानूनी या संवैधानिक समस्या से भी बचा जा सकता है।
राजस्व विभाग का मानना है कि भूमि और अद्यतन भूमि अभिलेख ही भूमि प्रबंधन की मजबूत संस्थाएँ हैं। धारा 34 के प्रभावकारी वास्तुशिल्प सेक में भूमि अभिलेख अधिक खड्ड, विश्वसनीय और विवादमुक्त बन गये।







