भाजपा के सामने क्षेत्रीय दल क्यों पड़ रहे कमजोर? शंकराचार्य के शिष्य ने बताई ‘धूर्त राजनीति’ की वजह
बंगाल हिंसा से लेकर ईरान-अमेरिका तनाव तक बोले अविमुक्तेश्वरानंद, कहा— अब राजनीति में सीधेपन से नहीं चलेगा काम
कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
देश की राजनीति इन दिनों तीव्र ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी लगातार अपने संगठन और चुनावी रणनीति के दम पर देश के अधिकांश राज्यों में मजबूत होती दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों का जनाधार धीरे-धीरे सिमटता नजर आ रहा है। इसी राजनीतिक परिदृश्य के बीच ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ऐसा बयान दिया है जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
गौ रक्षक धर्म युद्ध यात्रा के दौरान मऊ पहुंचे अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भाजपा की राजनीतिक रणनीति, पश्चिम बंगाल की हिंसा, क्षेत्रीय दलों की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसे कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्रीय दलों को भाजपा जैसी ताकत हासिल करनी है तो उन्हें भी “धूर्त राजनीति” सीखनी पड़ेगी।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में विपक्ष की एकजुटता, क्षेत्रीय दलों की भूमिका और भाजपा के बढ़ते प्रभाव को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
“सिर्फ सीधेपन से राजनीति नहीं चलती”
मीडिया से बातचीत के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि आज की राजनीति पहले जैसी नहीं रह गई है। अब केवल ईमानदारी और सीधेपन के भरोसे राजनीति में टिके रहना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा जिस प्रकार रणनीतिक सोच, संगठन क्षमता और राजनीतिक चतुराई के बल पर देशभर में अपना विस्तार कर रही है, उसी तरह की राजनीतिक समझ क्षेत्रीय दलों को भी विकसित करनी होगी।
उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि राजनीति अब केवल विचारधारा की लड़ाई नहीं रह गई, बल्कि यह संसाधनों, रणनीति और प्रभाव प्रबंधन का खेल बन चुकी है। ऐसे में जो दल समय के अनुसार खुद को ढालने में असफल रहेंगे, उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक विपक्षी दलों के लिए एक अप्रत्यक्ष सलाह के रूप में भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि भाजपा ने बूथ स्तर तक जिस तरह संगठन को मजबूत किया है, वैसी तैयारी अधिकांश क्षेत्रीय दलों में दिखाई नहीं देती।
बंगाल हिंसा पर केंद्र सरकार से पूछे सवाल
पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद लगातार सामने आ रही हिंसक घटनाओं को लेकर भी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं भारी सुरक्षा व्यवस्था और केंद्रीय बलों के साथ बंगाल में मौजूद थे, फिर भी चुनाव के बाद हिंसा की घटनाएं सामने आना कई सवाल खड़े करता है।
उन्होंने पूछा कि जब सुरक्षा एजेंसियां पूरी ताकत के साथ तैनात थीं तो आखिर हिंसा को क्यों नहीं रोका जा सका। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव के बाद हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
शंकराचार्य के शिष्य ने कहा कि राजनीतिक दलों को सत्ता के लिए संघर्ष करना चाहिए, लेकिन जनता के बीच भय और हिंसा का माहौल बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल की घटनाओं ने देशभर में चिंता का वातावरण पैदा किया है और केंद्र व राज्य सरकार दोनों को इसकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।
“भारत में भी दिखने लगा दो-दलीय राजनीति का असर”
देश में क्षेत्रीय दलों के कमजोर पड़ने पर बोलते हुए अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि भारतीय राजनीति धीरे-धीरे अमेरिका की तरह दो प्रमुख दलों के इर्द-गिर्द सिमटती दिखाई दे रही है। उनका कहना था कि बड़े राजनीतिक दलों और पूंजीवादी शक्तियों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे छोटे और क्षेत्रीय दलों की भूमिका सीमित होती जा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीति अब विचारधारा से अधिक संसाधनों और आर्थिक ताकत पर निर्भर होती जा रही है। बड़ी राजनीतिक पार्टियां चुनाव प्रचार, मीडिया प्रबंधन और जनसंपर्क में जिस स्तर पर संसाधनों का इस्तेमाल कर रही हैं, उसके सामने छोटे दल खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि आज देश की राजनीति केवल “दो चेहरों” के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके इस बयान को प्रधानमंत्री Narendra Modi और कांग्रेस नेता Rahul Gandhi की ओर संकेत माना।
“बाहरी प्रभाव भी तय कर रहे राजनीति की दिशा”
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि भारत की राजनीति पर बाहरी प्रभाव बढ़ते जा रहे हैं। उनका कहना था कि वैश्विक पूंजी और अंतरराष्ट्रीय हित अब भारतीय लोकतंत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं।
उन्होंने दावा किया कि राजनीतिक दलों की नीतियों और चुनावी रणनीतियों के पीछे बड़े आर्थिक हित काम कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने किसी संगठन या देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में चुनावी खर्च, डिजिटल प्रचार और बड़े पैमाने पर संसाधनों के इस्तेमाल ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह बदल दिया है। ऐसे माहौल में क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
ईरान-अमेरिका तनाव पर भी रखी राय
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बोलते हुए अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी भी युद्ध का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया को उसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि यदि दुनिया में कहीं भी युद्ध जैसी स्थिति बनती है तो उसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा संकट और आम लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए दोनों देशों को अपने मतभेदों का समाधान बातचीत के जरिए निकालना चाहिए।
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि दुनिया के बुद्धिजीवियों, शांति समर्थकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आगे आकर युद्ध रोकने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। उनका कहना था कि आज विश्व को संघर्ष नहीं बल्कि संवाद की आवश्यकता है।
राजनीतिक बयान से बढ़ी हलचल
मऊ में दिया गया अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का यह बयान अब राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है। भाजपा समर्थक जहां इसे विपक्ष की कमजोरी की स्वीकारोक्ति मान रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों के समर्थक इसे वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य बता रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि धार्मिक और आध्यात्मिक जगत से जुड़े बड़े चेहरे जब राजनीति पर टिप्पणी करते हैं तो उसका प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब देश में चुनावी राजनीति लगातार आक्रामक होती जा रही है, तब इस तरह के बयान नई बहसों को जन्म देते हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय राजनीति अब वैचारिक संघर्ष से आगे बढ़कर पूरी तरह रणनीतिक और संसाधन आधारित राजनीति में बदल चुकी है? और क्या क्षेत्रीय दल वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रभाव खोते जा रहे हैं?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय की राजनीति तय करेंगे, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि मऊ से उठी यह राजनीतिक चर्चा अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुकी है।
महत्वपूर्ण सवाल-जवाब
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भाजपा को लेकर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्रीय दलों को भाजपा की तरह मजबूत बनना है तो उन्हें भाजपा जैसी राजनीतिक चतुराई और रणनीति अपनानी होगी।
क्षेत्रीय दलों पर उनका बयान क्यों चर्चा में है?
उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीति में केवल सीधे-सादे तरीके से टिकना मुश्किल है। उनके इस बयान को क्षेत्रीय दलों के लिए बड़ी राजनीतिक सलाह माना जा रहा है।
बंगाल हिंसा पर उन्होंने क्या सवाल उठाए?
उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद चुनाव बाद हिंसा होना गंभीर सवाल खड़े करता है। इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
दो-दलीय व्यवस्था को लेकर उनका क्या मत है?
उन्होंने कहा कि भारत की राजनीति में भी अमेरिका जैसी दो-दलीय व्यवस्था का प्रभाव दिखने लगा है, जिससे क्षेत्रीय दलों की भूमिका कमजोर पड़ रही है।
ईरान-अमेरिका तनाव पर अविमुक्तेश्वरानंद ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि युद्ध का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता। ऐसे मामलों में दुनिया के बुद्धिजीवियों और शांति समर्थकों को आगे आना चाहिए।











