नवाबों की शान, पटरियों पर चलता था रुतबा… रामपुर का वो ‘शाही रेलवे स्टेशन’ जहां से सफर करता था पूरा राजघराना
कमलेश कुमार चौधरी की खास रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की धरती पर नवाबों और रियासतों की कहानियां आज भी इतिहास की दीवारों से टकराकर सुनाई देती हैं। कहीं महलों की भव्यता है, कहीं तहजीब की खुशबू और कहीं ऐसी अनोखी विरासतें, जिन पर यकीन करना भी मुश्किल लगता है। रामपुर की नवाबी विरासत भी कुछ ऐसी ही है। यहां एक ऐसा निजी रेलवे स्टेशन हुआ करता था, जो किसी आम व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि केवल नवाब और उनके शाही परिवार के लिए बनाया गया था। यह स्टेशन सिर्फ एक इमारत नहीं था, बल्कि नवाबी रुतबे, शान और विलासिता की जीती-जागती तस्वीर था।
आज यह स्टेशन जर्जर हालत में खामोश खड़ा जरूर दिखाई देता है, लेकिन कभी यहां से निकलने वाली शाही रेलगाड़ियां पूरे इलाके में नवाबों की ताकत और ऐश्वर्य का एहसास कराती थीं। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक नवाब साहब का सफर आम यात्रियों की तरह नहीं, बल्कि राजसी अंदाज में हुआ करता था।
रोहिल्ला युद्ध के बाद शुरू हुई रामपुर रियासत की कहानी
रामपुर रियासत का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1772 में रोहिल्लाओं और मराठों के बीच भीषण संघर्ष हुआ था। उस दौर में अवध के नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायता मांगी। युद्ध के बाद रोहिल्लाओं को बरेली से हटना पड़ा। इसके कुछ समय बाद अक्टूबर 1774 में नवाब फैजुल्लाह खान ने ब्रिटिश कमांडर कर्नल चैंपियन की मौजूदगी में रामपुर रियासत की स्थापना की।
धीरे-धीरे रामपुर उत्तर भारत की सबसे प्रतिष्ठित रियासतों में शामिल हो गया। यहां कला, संगीत, साहित्य और स्थापत्य को खूब संरक्षण मिला। इसी नवाबी संस्कृति के बीच बाद में वह निजी रेलवे स्टेशन बना, जो आज भी इतिहास प्रेमियों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है।
जब नवाब ने अपने लिए बनवाया निजी रेलवे स्टेशन
देश में रेल सेवा का विस्तार शुरू हुआ तो दिल्ली से मुरादाबाद होते हुए लखनऊ तक रेल लाइन पहुंची। इसी दौरान रामपुर के नौवें नवाब हामिद अली खान ने अपने परिवार के लिए एक निजी रेलवे स्टेशन बनवाने का फैसला किया।
वर्तमान रामपुर रेलवे स्टेशन के ठीक पास स्थित यह इमारत उस दौर में “नवाब रेलवे स्टेशन” के नाम से जानी जाती थी। बताया जाता है कि इसकी भव्यता किसी आलीशान महल से कम नहीं थी। आज इसकी अनुमानित कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है।
सबसे खास बात यह थी कि मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी एक अलग रेल लाइन बिछाई गई थी, जो सीधे नवाब के निजी परिसर तक पहुंचती थी। यह लाइन मुख्य रेलवे ट्रैक से जुड़ी रहती थी, ताकि नवाब का सैलून कोच सीधे बड़ी ट्रेनों से जोड़ा जा सके।
ट्रेन नहीं, शाही रथों की तरह चलते थे सैलून कोच
उस दौर में नवाब और उनका परिवार साधारण डिब्बों में सफर नहीं करता था। उनके लिए विशेष सैलून कोच तैयार किए गए थे। इन कोचों को देखकर ऐसा लगता था मानो कोई चलता-फिरता महल हो।
रामपुर स्टेशन परिसर में शाही रथनुमा डिब्बे पटरियों पर खड़े रहते थे। जब दिल्ली या लखनऊ जाने वाली ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती, तब इन सैलून कोचों को मुख्य ट्रेन से जोड़ दिया जाता था। इसके बाद पूरा राजपरिवार उसी में बैठकर सफर करता था।
आज के समय में यह कल्पना भले ही किसी फिल्मी दृश्य जैसी लगे, लेकिन उस दौर में यह नवाबी शान का हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद भी कुछ वर्षों तक यह परंपरा जारी रही, जब तक कि भारत सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त नहीं कर दिया।
अंदर से किसी पांच सितारा महल जैसी थी ट्रेन
रामपुर नवाब की निजी ट्रेन सिर्फ यात्रा का साधन नहीं थी, बल्कि शाही जीवनशैली का चलता-फिरता उदाहरण थी। ट्रेन में कुल चार डिब्बे थे और हर डिब्बे को अलग उद्देश्य के लिए तैयार किया गया था।
इनमें आलीशान बेडरूम, डाइनिंग रूम, रसोईघर और मनोरंजन कक्ष मौजूद थे। ट्रेन के अंदर फारसी कालीन बिछे रहते थे। सागवान की लकड़ी से बने नक्काशीदार फर्नीचर इसकी सुंदरता को और बढ़ाते थे। झूमरों की रोशनी और शाही सजावट इसे किसी महल जैसा रूप देती थी। इतना ही नहीं, नवाब के नौकरों और रसोइयों के लिए भी अलग व्यवस्था होती थी, ताकि सफर के दौरान शाही आराम में कोई कमी न आए। कहा जाता है कि इस ट्रेन को बड़ौदा स्टेट रेल बिल्डर्स ने खास तौर पर नवाब की पसंद के अनुसार तैयार किया था।
बर्फ की सिल्लियों से ठंडी होती थी ट्रेन
आज एयर कंडीशनर आम बात है, लेकिन उस दौर में नवाब की ट्रेन में यात्रियों को ठंडक पहुंचाने के लिए बेहद अनोखा तरीका अपनाया जाता था। सैलून कोचों को ठंडा रखने के लिए उनमें बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियां रखी जाती थीं। साथ में पंखे और ब्लोअर लगाए गए थे, जो पूरे डिब्बे में ठंडी हवा फैलाते थे। उस समय के हिसाब से यह व्यवस्था किसी आधुनिक तकनीक से कम नहीं मानी जाती थी। 1925 में नवाब ने रामपुर और मिलक के बीच निजी रेल पटरियां भी बिछवाईं। मिलक एक छोटा कस्बा था, जहां नवाब अक्सर प्रशासनिक कामकाज देखने जाया करते थे।
बंटवारे के दौर में भी हुआ इस्तेमाल
1947 में देश विभाजन के समय यह स्टेशन एक अलग वजह से चर्चा में आया। बताया जाता है कि उस समय इस निजी स्टेशन का इस्तेमाल पाकिस्तान जाने वाले लोगों को पहुंचाने के लिए भी किया गया था। यह दौर रामपुर रियासत और उसके नवाबी इतिहास के लिए बड़ा परिवर्तन लेकर आया। बाद में 1949 में रामपुर रियासत का भारत संघ में विलय हो गया।
करोड़ों की संपत्ति और दशकों लंबा विवाद
रामपुर के अंतिम नवाब रजा अली खान का निधन 1966 में हुआ। उनके निधन के बाद राजपरिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति को लेकर लंबा कानूनी विवाद शुरू हो गया। करीब 47 वर्षों तक चली इस लड़ाई के बाद दिसंबर 2021 में अदालत ने लगभग 2,664 करोड़ रुपये की संपत्ति पर फैसला सुनाया। संपत्ति विवाद का असर इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन पर भी पड़ा। धीरे-धीरे यहां आम लोगों का आना-जाना बंद हो गया और रखरखाव के अभाव में यह धरोहर वीरान होती चली गई।
अब जंग खा रहे हैं शाही डिब्बे
जिस स्टेशन पर कभी नवाबी रुतबे की चमक दिखाई देती थी, वहां आज खामोशी पसरी हुई है। नवाब के निजी रेल डिब्बे अब जंग खा चुके हैं। खिड़कियां और दरवाजे टूट चुके हैं। बरामदों का प्लास्टर झड़ रहा है और छतों में दरारें पड़ चुकी हैं कभी शानदार दिखने वाली यह इमारत अब अतिक्रमण और उपेक्षा का शिकार बन गई है। कहीं इसका इस्तेमाल गैरेज की तरह हो रहा है तो कहीं साइकिल स्टैंड बना दिया गया है।
इंडो-सारासेनिक शैली में बनी यह इमारत 19वीं शताब्दी के आखिर में तैयार हुई थी। इसे प्रसिद्ध वास्तुकार डब्ल्यूसी राइट ने डिजाइन किया था। इसकी वास्तुकला आज भी उस दौर की शाही भव्यता की गवाही देती है।
विरासत बचाने की जरूरत
रामपुर का यह नवाब रेलवे स्टेशन सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और नवाबी संस्कृति की दुर्लभ धरोहर है। यह उस दौर की कहानी कहता है, जब सत्ता, शान और तकनीक का अनोखा संगम देखने को मिलता था।
जरूरत इस बात की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित किया जाए। अगर सरकार और पुरातत्व विभाग गंभीर प्रयास करें तो यह स्टेशन पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। इससे आने वाली पीढ़ियां भी जान सकेंगी कि कभी भारत में ऐसे नवाब भी थे, जिनकी अपनी निजी रेलगाड़ी और निजी रेलवे स्टेशन हुआ करते थे।







