“चलो गाँव की ओर” : पंचायत सहायकों की मनमानी से चरमराई ग्राम व्यवस्था, बंद पड़े सचिवालय और भटकते ग्रामीण
संजय सिंह राणा की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट
चित्रकूट। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में ग्राम पंचायत स्तर पर सुशासन की जो परिकल्पना की गई थी, वह कागज़ों में तो सशक्त दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। पंचायत सहायकों की नियुक्ति का उद्देश्य गांवों में ही लोगों को सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना था, ताकि ग्रामीणों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए ब्लॉक या जिला मुख्यालय का चक्कर न लगाना पड़े। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि पंचायत सहायकों की कार्यशैली, उनकी अनुपस्थिति और प्रशासनिक लापरवाही ने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
क्या है पंचायत सहायकों की भूमिका और नियुक्ति का नियम?
पंचायती राज विभाग द्वारा पंचायत सहायकों की नियुक्ति एक वर्ष के अनुबंध पर की जाती है। यदि उनकी कार्यशैली संतोषजनक रहती है तो हर वर्ष उनका अनुबंध बढ़ाया जाता है। तीन वर्षों तक लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले सहायकों का अनुबंध दो वर्षों के लिए बढ़ाने का प्रावधान भी है।
इनका मुख्य कार्य ग्राम पंचायतों में डिजिटल सेवाएं देना, प्रमाण पत्र बनवाने में सहायता करना, सरकारी योजनाओं की जानकारी देना और पंचायत सचिवालय को सक्रिय रखना होता है। लेकिन चित्रकूट में इस व्यवस्था का क्रियान्वयन पूरी तरह से प्रभावित दिखाई दे रहा है।
जमीनी हकीकत : कागज़ों में तैनाती, जमीन पर गायब
चित्रकूट जिले की 332 ग्राम पंचायतों में पंचायत सहायकों की तैनाती दिखती जरूर है, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश पंचायत सहायकों की उपस्थिति केवल कागज़ों तक सीमित है।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान कई पंचायत भवनों का निरीक्षण किया गया, जहां सचिवालय के दरवाजों पर ताले लटके हुए मिले। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि पंचायत सहायक सप्ताह में एक-दो दिन भी नियमित रूप से नहीं आते।
गांव के एक बुजुर्ग ने कहा-
“हम लोग राशन कार्ड, आय प्रमाण पत्र या अन्य कागज़ बनवाने के लिए कई बार पंचायत भवन जाते हैं, लेकिन वहां हमेशा ताला लगा रहता है। मजबूरी में ब्लॉक जाना पड़ता है, जहां पूरा दिन खराब हो जाता है।”
बिना अनुबंध के भी मानदेय का खेल
सबसे गंभीर मामला यह सामने आया है कि कई ग्राम पंचायतों में पंचायत सहायकों का अनुबंध ही नहीं हुआ है, इसके बावजूद उन्हें नियमित मानदेय दिया जा रहा है। यह सीधे तौर पर शासन के निर्देशों की अवहेलना है। सूत्रों के अनुसार, इसमें ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की मिलीभगत की बात सामने आ रही है।
कुछ पंचायतों में ऐसे भी मामले सामने आए हैं जहां सहायक न तो काम कर रहे हैं और न ही नियमित उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं, फिर भी हर महीने भुगतान लिया जा रहा है।
मानदेय के लिए दबाव, काम के प्रति लापरवाही
जहां एक ओर कई पंचायत सहायक काम करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे मानदेय के लिए ग्राम प्रधान और सचिव पर दबाव बनाते नजर आते हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक अनुशासन पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि निगरानी तंत्र पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी परेशानी : दर-दर की ठोकरें
पंचायत सहायकों की अनुपस्थिति का सीधा असर आम ग्रामीणों पर पड़ रहा है।
- आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र बनवाने में कठिनाई
- पेंशन योजनाओं की जानकारी न मिलना
- मनरेगा और अन्य योजनाओं में पारदर्शिता की कमी
- डिजिटल सेवाओं का लाभ न मिल पाना
ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए ब्लॉक और जिला मुख्यालय जाना पड़ रहा है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहा है।
खाली पड़े सचिवालय : करोड़ों की लागत बेकार?
गांवों में सचिवालय भवनों का निर्माण इसलिए कराया गया था ताकि ग्रामीणों को एक ही स्थान पर सभी सरकारी सुविधाएं मिल सकें। लेकिन आज स्थिति यह है कि ये भवन अधिकतर समय बंद रहते हैं। यह सवाल उठता है कि जब इन भवनों का उपयोग ही नहीं हो रहा, तो इन पर खर्च किए गए करोड़ों रुपये का क्या औचित्य है?
जिम्मेदार अधिकारी भी मौन क्यों?
जिले के सभी ब्लॉकों में सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) की तैनाती है। इसके अलावा जिला पंचायत राज अधिकारी भी इस पूरे तंत्र की निगरानी के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन अधिकारियों द्वारा पंचायत सहायकों की कार्यशैली पर कोई ठोस निगरानी नहीं की जा रही है। न तो नियमित निरीक्षण हो रहा है, न ही अनुपस्थित रहने वालों पर कार्रवाई।
सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी : जवाबदेही का अभाव
पूरे मामले में सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही की कमी है।
- पंचायत सहायक काम नहीं कर रहे
- प्रधान और सचिव मिलीभगत कर रहे
- अधिकारी निगरानी नहीं कर रहे
ऐसे में यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर जिम्मेदार कौन है?
क्या कहता है प्रशासन?
जब इस विषय पर संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो ज्यादातर ने औपचारिक जवाब देते हुए कहा कि “जांच कर कार्रवाई की जाएगी।” लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई है।
समाधान क्या हो सकता है?
स्थिति को सुधारने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता है:
- बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य की जाए
- हर पंचायत भवन में CCTV कैमरे लगाए जाएं
- मासिक कार्य मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की जाए
- बिना अनुबंध भुगतान पर तत्काल रोक लगे
-
अनुपस्थित रहने वालों का अनुबंध समाप्त किया जाए
- ग्रामीणों के लिए शिकायत हेल्पलाइन शुरू हो
चित्रकूट में पंचायत सहायकों की लापरवाही और प्रशासनिक ढिलाई ने ग्रामीण व्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। जिस योजना का उद्देश्य गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था, वही योजना भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जिला प्रशासन इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेकर सख्त कार्रवाई करेगा, या फिर पंचायत भवनों पर ऐसे ही ताले लटके रहेंगे और ग्रामीण यूं ही भटकते रहेंगे?
(यह रिपोर्ट प्रशासन को आईना दिखाने और ग्रामीणों की आवाज़ उठाने का प्रयास है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी कब जागते हैं और व्यवस्था को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाते हैं।)
पंचायत सहायकों की नियुक्ति कैसे होती है?
पंचायत सहायकों की नियुक्ति पंचायती राज विभाग द्वारा एक वर्ष के अनुबंध पर की जाती है, जिसे कार्यशैली के आधार पर हर साल बढ़ाया जा सकता है।
क्या बिना अनुबंध के भी भुगतान किया जा रहा है?
हां, चित्रकूट के कई ग्राम पंचायतों में बिना वैध अनुबंध के भी पंचायत सहायकों को मानदेय दिए जाने के मामले सामने आए हैं।
पंचायत सचिवालय बंद क्यों रहते हैं?
अधिकतर पंचायत सहायकों की अनुपस्थिति और निगरानी की कमी के कारण सचिवालयों में ताला लटका रहता है।
इसका असर ग्रामीणों पर क्या पड़ रहा है?
ग्रामीणों को छोटे-छोटे सरकारी कामों के लिए ब्लॉक और जिला मुख्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहा है।
प्रशासन इस मामले में क्या कर रहा है?
फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिली है, हालांकि अधिकारियों द्वारा जांच का आश्वासन दिया गया है।
समाधान के लिए क्या कदम जरूरी हैं?
बायोमेट्रिक उपस्थिति, CCTV निगरानी, नियमित निरीक्षण और दोषियों पर सख्त कार्रवाई जैसे कदम उठाना बेहद जरूरी है।











