गौशालाओं का गहन निरीक्षण: गौ संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने पर जोर
रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
चित्रकूट। उत्तर प्रदेश में गौ संरक्षण एवं संवर्धन को नई दिशा देने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग के संयुक्त निरीक्षण दल ने चित्रकूट जनपद की विभिन्न गौशालाओं और गो आश्रय स्थलों का व्यापक निरीक्षण किया। निरीक्षण के बाद जनपद स्तरीय अनुश्रवण, मूल्यांकन एवं समीक्षा समिति की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें गौ आधारित समग्र विकास मॉडल को मजबूत बनाने पर विस्तार से चर्चा हुई।
इस संयुक्त निरीक्षण दल का नेतृत्व आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्त और सदस्य रमाकांत उपाध्याय ने किया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि गौ संरक्षण केवल एक योजना न रहकर एक जनआंदोलन का रूप ले, जिसमें समाज की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो।
गौ संरक्षण को मिला प्राथमिकता का दर्जा
निरीक्षण के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि राज्य सरकार की शीर्ष प्राथमिकता “गौ संरक्षण एवं गौ संवर्धन” है। इस दिशा में गौवंशों के स्वास्थ्य, पोषण और संरक्षण के साथ-साथ उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की रणनीति पर विशेष बल दिया गया। अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि योजनाओं का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जाए।
हरे चारे की उपलब्धता पर जोर
गौशालाओं में वर्षभर हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए गोचर भूमि पर नैपियर घास की बुवाई को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए। इसके लिए सरकार द्वारा प्रति हेक्टेयर आर्थिक सहायता भी प्रदान की जा रही है। साथ ही किसानों को प्रोत्साहित करते हुए अनुबंध आधारित चारा उत्पादन (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) मॉडल अपनाने की बात कही गई, जिससे गौशालाओं को सस्ता और नियमित चारा मिल सके।
जहां गोचर भूमि उपलब्ध नहीं है, वहां स्थानीय किसानों के साथ समन्वय स्थापित कर चारा उत्पादन सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया, जिससे गौवंशों के पोषण में कोई कमी न आए।
संतुलित पोषण और स्वास्थ्य प्रबंधन
निरीक्षण दल ने गौवंशों के संतुलित आहार पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए। हरे चारे के साथ भूसा, चोकर और पशु आहार की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा गया। वर्तमान में गेहूं कटाई के चलते भूसे की उपलब्धता को देखते हुए कम से कम छह महीने का भंडारण अनिवार्य करने पर जोर दिया गया।
इसके अलावा गौशालाओं में स्वच्छ पेयजल, चूना युक्त पानी और सेंधा नमक के लिक ब्रिक्स की व्यवस्था करने को कहा गया, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार हो सके।
मुख्यमंत्री सहभागिता योजना का विस्तार
ग्रामीण स्तर पर आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए “मुख्यमंत्री सहभागिता योजना” को व्यापक रूप से लागू करने पर जोर दिया गया। इसके तहत युवाओं, महिलाओं और छोटे किसानों को देशी गौवंश उपलब्ध कराकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने की योजना है।
गोबर और गोमूत्र आधारित उत्पादों जैसे जैविक खाद, बायोपेस्टिसाइड, जीवामृत आदि के उत्पादन को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की रणनीति पर भी चर्चा हुई।
गौ आधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम
बैठक में यह भी बताया गया कि गौ आधारित मॉडल अपनाकर गांवों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से घरेलू ईंधन और बिजली उत्पादन संभव है, जबकि उससे निकलने वाली स्लरी का उपयोग प्राकृतिक खेती में कर मृदा की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए विषमुक्त खेती को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, जिससे जनस्वास्थ्य में भी सुधार आएगा।
जनसहभागिता से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था
निरीक्षण दल ने युवाओं, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भागीदारी बढ़ाने पर बल दिया। गोबर के गमले, गो-काष्ठ, धूप, गोनाइल और अन्य उत्पादों के निर्माण के माध्यम से रोजगार के नए अवसर सृजित करने की योजना पर जोर दिया गया।
इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि एक चक्रीय (सर्कुलर) आर्थिक मॉडल भी विकसित होगा।
गौशाला प्रबंधन में सुधार के निर्देश
निरीक्षण के दौरान गौशालाओं में आवश्यक व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। बीमार पशुओं के लिए अलग आइसोलेशन वार्ड, बछड़ों के लिए पृथक शेड और ब्लॉक स्तर पर नंदी गौशालाओं की स्थापना को अनिवार्य बताया गया।
इसके अलावा वर्ष 2024 के शासनादेश के अनुसार गौशालाओं के संचालन को स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला समूहों और युवाओं को सौंपने की प्रक्रिया तेज करने पर जोर दिया गया, ताकि प्रबंधन में पारदर्शिता और गुणवत्ता लाई जा सके।
समेकित विकास मॉडल पर जोर
बैठक में विभिन्न विभागों—पशुपालन, कृषि, उद्यान, आयुष, कौशल विकास, सहकारिता, वन विभाग और MSME—के बीच समन्वय स्थापित कर गौ आधारित समग्र विकास मॉडल लागू करने की रणनीति बनाई गई।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और पर्यावरण संतुलन सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने पर सहमति बनी।
उच्च गुणवत्ता वाले गौवंश संवर्धन पर फोकस
गौशालाओं में बेहतर नस्ल के नंदी रखने और सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक के उपयोग से उच्च गुणवत्ता वाले गौवंश विकसित करने की योजना पर भी चर्चा हुई। इससे भविष्य में गौ संरक्षण को स्थायी आधार मिल सकेगा।
संयुक्त निरीक्षण दल ने स्पष्ट किया कि गौ संरक्षण को केवल पशुपालन तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जनस्वास्थ्य से जोड़ते हुए एक व्यापक विकास मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा।
साथ ही सभी अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि निरीक्षण के दौरान दिए गए दिशा-निर्देशों का समयबद्ध और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करें, ताकि योजनाओं का लाभ सीधे धरातल पर दिखाई दे।
🔴 महत्वपूर्ण सवाल-जवाब (FAQ)
❓ चित्रकूट में गौशालाओं का निरीक्षण क्यों किया गया?
गौ संरक्षण एवं संवर्धन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का मूल्यांकन करने और जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं को सुधारने के उद्देश्य से निरीक्षण किया गया।
❓ निरीक्षण में किन प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया गया?
हरे चारे की उपलब्धता, संतुलित पोषण, गौवंश स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ाव जैसे प्रमुख विषयों पर विशेष ध्यान दिया गया।
❓ मुख्यमंत्री सहभागिता योजना का उद्देश्य क्या है?
युवाओं, महिलाओं और किसानों को देशी गौवंश देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना और गो आधारित उत्पादों के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़ाना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है।
❓ गौ आधारित अर्थव्यवस्था से क्या लाभ होंगे?
बायोगैस, जैविक खाद और प्राकृतिक खेती के माध्यम से किसानों की आय बढ़ेगी, पर्यावरण संरक्षण होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
❓ गौशालाओं के बेहतर प्रबंधन के लिए क्या निर्देश दिए गए?
बीमार पशुओं के लिए अलग वार्ड, पर्याप्त चारा-पानी, भंडारण व्यवस्था और NGO/SHG के माध्यम से संचालन को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए।










