भरतपुर

SMS हॉस्पिटल में सिस्टम की बड़ी चूक : राजस्थान की महिला को ‘बाहरी राज्य’ बताकर वसूले पैसे, जांच भी नहीं हो सकी

घंटों लाइन में भटकते रहे मरीज और परिजन, शिकायत के बाद भी नहीं मिली राहत

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट

जयपुर स्थित राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सवाई मान सिंह (SMS) हॉस्पिटल में सिस्टम की एक गंभीर खामी ने स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल दी। डीग जिले से इलाज कराने पहुंची एक बुजुर्ग महिला को अस्पताल के रिकॉर्ड में दूसरे राज्य का नागरिक बता दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मुफ्त मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं के बदले उनसे रजिस्ट्रेशन शुल्क से लेकर जांच तक के पैसे मांगे गए।

मामला सामने आने के बाद भी अस्पताल प्रशासन की ओर से तत्काल कोई समाधान नहीं निकाला गया। मरीज और उसका बेटा घंटों तक काउंटरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन न तो जांच हो सकी और न ही समय पर इलाज मिल पाया। अंततः परेशान होकर परिजन ने अधीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

डीग से इलाज कराने जयपुर पहुंची थी महिला

डीग जिले की रहने वाली 58 वर्षीय जड़ावो देवी गठिया और अन्य बीमारियों से पीड़ित हैं। बेहतर इलाज की उम्मीद में वह अपने बेटे केदार के साथ 10 मई की शाम जयपुर पहुंचीं। रातभर मां-बेटा अस्पताल परिसर में ही रुके रहे ताकि सुबह जल्दी ओपीडी में पर्ची बनवा सकें।

11 मई की सुबह दोनों रजिस्ट्रेशन काउंटर की लंबी लाइन में लगे। केदार ने अस्पताल कर्मी को आधार कार्ड और जनआधार कार्ड दोनों दिखाए और स्पष्ट रूप से बताया कि वे राजस्थान के डीग जिले के निवासी हैं। इसके बावजूद ऑपरेटर ने उन्हें बाहरी राज्य का मरीज मानते हुए पर्ची बना दी और रजिस्ट्रेशन के नाम पर 10 रुपये वसूल लिए।

सिस्टम में गलत एंट्री का खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ा

पर्ची बनने के बाद जड़ावो देवी को रूमेटोलॉजी विभाग की ओपीडी में ले जाया गया। वहां भी उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ा। करीब 2 से 3 घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद डॉक्टर से मुलाकात हो सकी। डॉक्टर ने जांचें और दवाइयां लिखीं।

लेकिन असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई। दवा काउंटर पर भी काफी देर तक लाइन में लगने के बावजूद दवाइयां उपलब्ध नहीं हो सकीं। इसके बाद जब जांच के लिए बिल कटवाने पहुंचे तो उनसे करीब 1100 रुपये जमा कराने को कहा गया।

केदार ने जब कर्मचारियों से कहा कि वे राजस्थान के ही निवासी हैं और उनके पास जनआधार कार्ड भी मौजूद है, तब भी किसी ने उनकी बात गंभीरता से नहीं सुनी। सिस्टम में हुई गलत एंट्री को सुधारने के बजाय कर्मचारियों ने उन्हें अलग-अलग काउंटरों पर भेजना शुरू कर दिया।

शिकायत के बावजूद नहीं मिला समाधान

मरीज के बेटे केदार ने बताया कि बिलिंग काउंटर पर उन्होंने काफी देर तक कर्मचारियों से बहस की और अपनी बात समझाने की कोशिश की। इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ।

इसके बाद वे अपनी मां को लेकर ब्लड कलेक्शन सेंटर के 61 नंबर काउंटर पर पहुंचे। वहां भी उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों को पूरी स्थिति बताई, लेकिन किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की।

कई घंटे तक इधर-उधर भटकने के कारण जांच का समय निकल गया और दोपहर के करीब 3 बज गए। मजबूर होकर केदार को अधीक्षक कार्यालय पहुंचना पड़ा, जहां उन्होंने पूरे मामले की लिखित शिकायत दर्ज कराई।

सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर उठे सवाल

इस घटना ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के बावजूद यदि एक मरीज की पहचान और दस्तावेजों की सही जांच नहीं हो पा रही है, तो आम लोगों को मिलने वाली सुविधाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल सिस्टम लागू किए जाने का मकसद मरीजों को बेहतर और तेज सेवाएं देना था, लेकिन कई बार तकनीकी त्रुटियां और कर्मचारियों की लापरवाही मरीजों के लिए परेशानी का कारण बन जाती हैं। राजस्थान सरकार जनआधार और स्वास्थ्य योजनाओं के जरिए मुफ्त इलाज का दावा करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई मरीजों को अब भी सिस्टम की खामियों का सामना करना पड़ रहा है।

मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी लंबी लाइनों से

एसएमएस अस्पताल में रोजाना हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में रजिस्ट्रेशन, जांच और दवा वितरण काउंटरों पर लंबी लाइनें आम बात हैं। ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है। जड़ावो देवी का मामला भी इसी अव्यवस्था की एक तस्वीर बनकर सामने आया है, जहां एक तकनीकी गलती के कारण मरीज को पूरे दिन अस्पताल परिसर में भटकना पड़ा और जरूरी जांच तक नहीं हो सकी।

प्रशासनिक कार्रवाई की मांग तेज

घटना सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों और मरीजों के परिजनों ने मांग की है कि मामले की जांच कर जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही ऐसी व्यवस्था बनाई जाए ताकि भविष्य में किसी मरीज को इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम के साथ-साथ कर्मचारियों को संवेदनशील और जिम्मेदार व्यवहार का प्रशिक्षण भी दिया जाना जरूरी है। केवल तकनीक के भरोसे स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।

डीग की जड़ावो देवी का मामला सिर्फ एक मरीज की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों की बड़ी तस्वीर पेश करता है। इलाज की उम्मीद लेकर राजधानी पहुंचे मरीज और उनके परिजन अगर घंटों अस्पताल के काउंटरों पर भटकते रहें, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

जरूरत इस बात की है कि अस्पताल प्रशासन शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करे और सिस्टम की खामियों को दूर कर मरीजों को राहत दिलाए। आखिर सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य आम जनता को सहज और सुलभ इलाज उपलब्ध कराना है, न कि उन्हें तकनीकी गलतियों और अव्यवस्था के बीच परेशान होने के लिए मजबूर करना।

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