चित्रकूट। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मऊ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC Mau) में प्रसव से संबंधित कागजात तैयार करने के नाम पर कथित रूप से पैसे मांगने का मामला सामने आया है। एक दिव्यांग महिला ने अस्पताल में रात की ड्यूटी पर तैनात महिला कर्मचारी पर एक हजार रुपये मांगने का आरोप लगाया है। महिला का कहना है कि उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार 300 रुपये दिए, लेकिन कर्मचारी ने कथित तौर पर रकम स्वीकार करने के बजाय फेंक दी और पूरे एक हजार रुपये देने का दबाव बनाया। आरोप के मुताबिक, पैसे नहीं देने पर उसके कागजात फेंक दिए गए और दस्तावेज तैयार नहीं करने की धमकी भी दी गई।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि आरोप लगाने वाली महिला दिव्यांग है और प्रसव जैसी संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा से जुड़े दस्तावेज बनवाने के लिए अस्पताल पहुंची थी। इसी प्रकरण में एक अन्य महिला के परिजनों ने भी डिलीवरी के नाम पर 500 रुपये लिए जाने का आरोप लगाया है। दोनों शिकायतों ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मऊ में प्रसव संबंधी सेवाओं, मरीजों के साथ व्यवहार और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कर्मचारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
दिव्यांग महिला कुन्नू ने सुनाई आपबीती
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत बरियारी कलां के मजरा बेलहा निवासी कुन्नू पत्नी हनुमान ने मऊ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डिलीवरी से संबंधित कागजात बनवाने के दौरान कथित रूप से पैसे मांगे जाने की शिकायत की है। कुन्नू के मुताबिक, रात की ड्यूटी पर मौजूद महिला कर्मचारी ने उनसे कागजात तैयार करने के नाम पर 1000 रुपये की मांग की थी।
महिला का आरोप है कि आर्थिक और शारीरिक परिस्थितियों के बीच उसने किसी तरह 300 रुपये देने की कोशिश की, लेकिन कर्मचारी ने कथित तौर पर उन रुपयों को फेंक दिया। इसके बाद उससे पूरी रकम यानी 1000 रुपये देने का दबाव बनाया गया। कुन्नू का कहना है कि जब वह मांगी गई पूरी रकम नहीं दे सकीं, तो उनके कागजात फेंक दिए गए और दस्तावेज तैयार नहीं करने की धमकी दी गई।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल पैसों की मांग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों के साथ व्यवहार और जरूरतमंदों को मिलने वाली सेवाओं की उपलब्धता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। खासकर दिव्यांग महिला के साथ कथित व्यवहार की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनुचित मांग की गई थी या नहीं।
दूसरी महिला से भी 500 रुपये लेने का आरोप
मऊ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से जुड़ा यह मामला केवल कुन्नू की शिकायत तक सीमित नहीं है। पूनम देवी पत्नी गिरजा शंकर के मामले में भी डिलीवरी के नाम पर 500 रुपये लिए जाने का आरोप लगाया गया है। इस संबंध में जानकारी पूनम देवी की मां ने दी। इस दूसरे आरोप के सामने आने से अस्पताल में प्रसव संबंधी सेवाओं के दौरान कथित तौर पर पैसे लिए जाने की शिकायतों की जांच का महत्व और बढ़ गया है।
हालांकि, दोनों मामलों की परिस्थितियां, कथित भुगतान का उद्देश्य और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। यह भी आवश्यक होगा कि संबंधित महिलाओं और उनके परिजनों के बयान दर्ज किए जाएं तथा अस्पताल में उस समय ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों से उनका पक्ष पूछा जाए। केवल आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों को गंभीरता से लेकर निष्पक्ष जांच करना प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है।
CHC अधीक्षक ने जांच और कार्रवाई की बात कही
इस मामले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मऊ के अधीक्षक आशीष कंकरिया से बात की गई। उन्होंने प्रकरण की जांच कराने और उचित कार्रवाई करने की बात कही है। अधीक्षक के इस आश्वासन के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायतों की जांच किस प्रकार की जाती है और उसके निष्कर्षों के आधार पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
जांच के दौरान यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि डिलीवरी से संबंधित कागजात तैयार करने के लिए किसी निर्धारित शुल्क का प्रावधान है या नहीं। यदि कोई शुल्क निर्धारित है, तो उसकी जानकारी मरीजों को स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए और भुगतान की विधिवत रसीद उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यदि किसी कर्मचारी ने बिना किसी वैध आधार के पैसे मांगे या भुगतान नहीं करने पर दस्तावेज रोकने की धमकी दी, तो जांच के निष्कर्षों के अनुसार नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही, संबंधित कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर देना और शिकायतकर्ताओं के बयानों तथा उपलब्ध अभिलेखों का मिलान करना भी निष्पक्ष जांच का आवश्यक हिस्सा होगा। इससे न केवल वास्तविक स्थिति सामने आएगी, बल्कि भविष्य में इस प्रकार की शिकायतों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए भी ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों के अधिकारों का सवाल
सरकारी स्वास्थ्य केंद्र आम नागरिकों, गरीब परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए चिकित्सा सेवाओं का महत्वपूर्ण आधार हैं। प्रसव के समय महिलाओं और उनके परिजनों को चिकित्सकीय देखभाल के साथ-साथ जरूरी कागजात, पंजीकरण और अन्य औपचारिकताओं में भी अस्पताल के सहयोग की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में यदि किसी मरीज या परिजन से अनुचित तरीके से पैसे मांगने की शिकायत सामने आती है, तो उसका असर लोगों के भरोसे पर पड़ता है।
विशेष रूप से दिव्यांग महिलाओं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और दूरदराज के गांवों से आने वाले मरीजों को अपनी समस्याएं अधिकारियों तक पहुंचाने में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अस्पताल प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीजों को आवश्यक प्रक्रियाओं की सही जानकारी मिले, शुल्क से संबंधित नियम स्पष्ट हों और शिकायत करने वाले लोगों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव या दबाव न बनाया जाए।
मऊ CHC से जुड़े इन आरोपों की जांच केवल संबंधित कर्मचारियों की भूमिका तय करने के लिए ही नहीं, बल्कि अस्पताल की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि शिकायतें सही साबित होती हैं, तो उचित कार्रवाई के साथ ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिससे भविष्य में किसी मरीज को कागजात बनवाने या आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने के लिए कथित रूप से अनुचित भुगतान के दबाव का सामना न करना पड़े।
जांच के नतीजों पर टिकी निगाहें
चित्रकूट के मऊ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डिलीवरी संबंधी कागजात के नाम पर पैसे मांगने और लेने के ये आरोप स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीरता से विचार करने का विषय हैं। एक ओर दिव्यांग महिला कुन्नू ने 1000 रुपये की कथित मांग, 300 रुपये फेंके जाने और कागजात नहीं बनाने की धमकी देने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर पूनम देवी के मामले में 500 रुपये लिए जाने का आरोप सामने आया है। अब इन शिकायतों की सत्यता जांच के बाद ही निर्धारित हो सकेगी।
CHC अधीक्षक आशीष कंकरिया ने जांच और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है। ऐसे में जरूरी है कि जांच समयबद्ध, निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित हो। शिकायतकर्ताओं को अपनी बात रखने का अवसर मिले और संबंधित कर्मचारियों का पक्ष भी दर्ज किया जाए। जांच में यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सम्मानजनक व्यवहार, पारदर्शी प्रक्रिया और निर्धारित नियमों के अनुसार सेवाएं मिलना आवश्यक है। मऊ CHC के इस मामले में जांच का परिणाम ही बताएगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और जिम्मेदारी किसकी बनती है। फिलहाल, क्षेत्र के लोगों की निगाहें स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।












