22 अक्टूबर 2026 2:18 पूर्वाह्न

राणा का मसखरा ; पाठा की राजनीति, विकास और जवाबदेही

जनगणदूत के व्यंग्य स्तंभ राणा का मसखरा में संपादक अनिल अनूप और संजय सिंह राणा की तस्वीरों के साथ पाठा की राजनीति, ग्रामीण विकास और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को दर्शाती फीचर इमेज।

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आलेख- अनिल अनूप | प्रस्तुति- सूरज सिंह राणा

“का बताई संपादक जी! पाठा मा विकास तौ खूब होइ गवा है, बस जनता के आंखिन तक पहुंचै मा थोड़ी देर लागत है!” रात के सन्नाटे मा फोन की घंटी बजी तौ उधर से संजय सिंह राणा की पाठा वाली ठेठ बोली सुनाई पड़ी। आवाज मा वही देसी मिठास, बात मा वही तंज अउर अंदाज ऐसा कि गंभीर से गंभीर सियासी मसला भी हंसी-हंसी मा जनता के सामने खुल जाए।

मैंने पूछा, “राणा जी, ई विकास आखिर रहत कहां है? भाषण मा, सरकारी कागज मा, उद्घाटन के पत्थर मा या फिर जनता के घर-दुआर तक भी पहुंचत है?” राणा हंसे, बोले, “संपादक जी, विकास के भी कई ठिकाना हैं। नेता जी के भाषण मा ऊ हवाई जहाज से उड़त है, अफसरन की फाइल मा दौड़त है, अउर जनता के गांव पहुंचते-पहुंचते कई बार रास्ता भूल जात है!”

बस, यहीं से शुरू हुई पाठा की राजनीति, ग्रामीण विकास, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और सरकारी व्यवस्था पर हमारी फोन वाली बातचीत। आप पढ़ रहे हैं ‘राणा का मसखरा’—एक ऐसा व्यंग्यात्मक संवाद जिसमें हंसी के बहाने उन सवालों को उठाया जाता है, जिन्हें अक्सर चुनावी नारों और विकास के दावों के बीच पीछे छोड़ दिया जाता है।

पाठा की सड़कें और विकास के दावे

मैंने पूछा, “राणा जी, जरा बताइए, पाठा में विकास की गाड़ी किस रफ्तार से चल रही है?” राणा बोले, “संपादक जी, गाड़ी तौ तेज चलत है, लेकिन सड़क पूछो तौ ड्राइवर भी माथा खुजावै लगत है। भाषण मा सड़क चमचमात है, नक्शा मा गांव शहर से जुड़ जात है, लेकिन जमीन पर कहीं गड्ढा इंतजार करत है तौ कहीं बरसात के पानी से रास्ता परेशान करत है।”

“मान लीजिए, मानिकपुर से बरगढ़ की ओर जाने वाले किसी मार्ग या रैपुरा क्षेत्र के किसी अंदरूनी गांव में सड़क की हालत पर सवाल उठता है, तौ जनता का पूछना गलत कैसे होइ गवा? आखिर सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्कूल, अस्पताल, बाजार, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी जरूरत है।”

राणा ने बात आगे बढ़ाई, “संपादक जी, सड़क बनवाना एक काम है, ओकर रखरखाव कराना दूसरा। उद्घाटन के दिन फीता कट जात है, फोटो छप जात है, मिठाई बंट जात है। फिर कुछ दिन बाद सड़क पूछै लगत है—भइया, अब हमार हाल पूछै वाला भी कोई है कि नाहीं?”

मैंने कहा, “तो जनता को केवल नई सड़क का वादा नहीं, उसकी गुणवत्ता, निर्माण की समयसीमा और मरम्मत का हिसाब भी मांगना चाहिए।” राणा बोले, “बिल्कुल संपादक जी! विकास का मतलब पत्थर पर नाम खुदवाना नहीं, जनता के रास्ते आसान करना है। सड़क बनी है तौ कितनी चली, नाली बनी है तौ पानी निकरा कि नाहीं, अउर काम पर कितना खर्च भवा—ई सब सवाल लोकतंत्र में पूछे ही जाने चाहिए।”

विधायक जी से सवाल: भाषण के बाद काम का हिसाब कौन देगा?

मैंने पूछा, “राणा जी, विधायक जी की जिम्मेदारी आखिर कहां से शुरू होती है और कहां खत्म?” राणा बोले, “संपादक जी, चुनाव के समय विधायक जी जनता के दरवाजे पर ऐसे पहुंचत हैं जैसे घर के पुराने रिश्तेदार हों। हाथ जोड़त हैं, हाल पूछत हैं, समस्या सुनत हैं अउर भरोसा देत हैं कि अबकी बार सब ठीक होई। चुनाव बीतते ही जनता सोचत है कि अब काम शुरू होई, लेकिन कभी-कभी काम से पहिले अगला चुनाव आ धमकत है!”

व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सवाल गंभीर है। विधायक से क्षेत्र की सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, पेयजल, स्थानीय रोजगार और विकास योजनाओं पर सवाल पूछना जनता का अधिकार है। विधानसभा में क्षेत्र के मुद्दे उठाना, संबंधित विभागों से जवाब मांगना और स्वीकृत योजनाओं की प्रगति पर नजर रखना जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

राणा बोले, “संपादक जी, जनता भी अब पूछै लगी है कि घोषणा कब हुई, पैसा कब आया, काम कब शुरू भवा अउर पूरा कब होई? खाली माइक पकड़ के कहि दिहिन कि विकास होइ गवा, तौ विकास के प्रमाणपत्र कौन बांटिहै?”

मैंने कहा, “बात सही है। लेकिन विधायक को भी उन समस्याओं का श्रेय या दोष अकेले नहीं दिया जा सकता, जिनमें कई विभागों और सरकार के अलग-अलग स्तरों की भूमिका होती है। इसलिए सवाल तथ्य के आधार पर होना चाहिए।” राणा ने तुरंत कहा, “अरे संपादक जी, हमहूं तो यही कहत हैं। सही काम भवा है तौ तारीफ होय, अधूरा है तौ जवाब मांगा जाय। राजनीति में हिसाब-किताब बंद होइ गवा तौ जनता के भरोसे का खाता खाली होई।”

सांसद जी का क्षेत्र, जनता की उम्मीदें

मैंने अगला सवाल दागा, “राणा जी, सांसद जी से जनता क्या उम्मीद रखे?” राणा बोले, “संपादक जी, सांसद जी का क्षेत्र बड़ा होत है, जिम्मेदारी भी बड़ी होत है। जनता सोचत है कि अबकी बार बड़े अस्पताल, अच्छी सड़क, रेल, रोजगार अउर क्षेत्र के लिए बड़े काम आईं। लेकिन जनता को ई भी समझना चाही कि हर स्थानीय समस्या सीधे सांसद के एक आदेश से हल नहीं हो सकत।”

यही लोकतांत्रिक समझ जरूरी है। सांसद राष्ट्रीय स्तर पर कानून निर्माण, संसद में क्षेत्र की आवाज उठाने, केंद्र की योजनाओं की निगरानी और संबंधित मंत्रालयों तक समस्याएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन स्थानीय सड़क, पंचायत का काम या किसी विभाग की सेवा में देरी के लिए संबंधित जिम्मेदारियों और अधिकारों को भी देखना होगा।

राणा बोले, “संपादक जी, जनता को बस इतना समझा द्या कि सांसद जी का काम केवल मंच से हाथ हिलाना नाहीं, अउर जनता का काम केवल जयकारा लगाना नाहीं। जनता सवाल पूछै, प्रतिनिधि जवाब दें। काम हुआ है तौ उसका ब्योरा सामने आए, काम अटका है तौ कारण बताया जाए।”

प्रधान जी और ग्राम पंचायत: गांव की सरकार का इम्तिहान

अब बात ग्राम पंचायत की चली। मैंने पूछा, “राणा जी, गांव के विकास में प्रधान जी की भूमिका कैसी होनी चाहिए?” राणा बोले, “संपादक जी, प्रधान जी गांव के सबसे नजदीक वाले जनप्रतिनिधि हैं। गांव में नाली जाम होय, हैंडपंप खराब होय, रास्ता टूटै या सफाई की जरूरत पड़ै, तौ सबसे पहिले जनता उन्हीं के दरवाजे पहुंचत है।”

“लेकिन प्रधान जी के भी दो रूप हो सकत हैं,” राणा ने हंसते हुए कहा, “एक चुनाव के समय वाला अउर दूसरा चुनाव जीतने के बाद वाला। पहिले वाला कहत है—आपका हर दुख हमार दुख। दूसरा कभी-कभी कहत है—आपकी समस्या संबंधित विभाग को भेज दी गई है!”

मैंने कहा, “पंचायत के काम में पारदर्शिता जरूरी है। ग्राम सभा की बैठकें, योजनाओं की जानकारी, खर्च का विवरण और लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया जनता के सामने स्पष्ट रहनी चाहिए।” राणा बोले, “बिल्कुल संपादक जी। ग्राम सभा खाली दस्तखत करावै की जगह नहीं, गांव के फैसले पर चर्चा करै का मंच है। जनता को पता होना चाहिए कि कौन-सा काम मंजूर भवा, कितना खर्च आया अउर काम पूरा हुआ कि अधूरा रहि गवा।”

गांव की राजनीति में आपसी तालमेल का महत्व भी कम नहीं। प्रधान, पंचायत सचिव, ब्लॉक स्तर के अधिकारी और दूसरे विभाग यदि मिलकर काम करें तो कई समस्याएं जल्दी हल हो सकती हैं। लेकिन तालमेल का अर्थ जवाबदेही से बचना नहीं है। यदि काम नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी है, यह स्पष्ट होना चाहिए।

अफसरशाही और जनता: फाइल चले, तभी काम बढ़े

मैंने पूछा, “राणा जी, सरकारी कार्यालयों में जनता की परेशानी पर क्या कहेंगे?” राणा बोले, “संपादक जी, सरकारी दफ्तर में आदमी एक काम लेकर जात है, तौ कभी-कभी लौटते समय उसके पास काम से ज्यादा कागज हो जात हैं। एक प्रमाणपत्र के लिए पूछो तौ दूसरा कागज मांग लिया जात है, दूसरे के लिए जाओ तौ तीसरे की जानकारी मिलत है। आदमी सोचत है कि काम करवाने आया था या कागजों का संग्रहालय बनवाने!”

मानिकपुर या किसी अन्य ब्लॉक के कार्यालय का उदाहरण लें—यदि किसी नागरिक को पेंशन, प्रमाणपत्र, भूमि अभिलेख या किसी सरकारी योजना के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो समस्या की वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है। हर देरी को बिना प्रमाण भ्रष्टाचार कहना उचित नहीं, लेकिन अनावश्यक देरी, अस्पष्ट प्रक्रिया और नागरिकों को सही जानकारी न मिलना भी प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवाल हैं।

राणा बोले, “संपादक जी, जनता को दफ्तर का चक्कर कम लगना चाही। कौन कागज चाही, कितने दिन मा काम होई, शिकायत कहां करी जाय—ई सब साफ-साफ बताय द्या। नियम जनता की मदद खातिर हैं, जनता को उलझावै खातिर नाहीं।”

मैंने कहा, “अधिकारियों को भी पर्याप्त संसाधन, स्पष्ट निर्देश और समय पर निर्णय लेने की व्यवस्था चाहिए। हर समस्या का हल केवल आरोप लगाने से नहीं निकलेगा; शिकायत की जांच, जिम्मेदारी तय करने और सुधार की प्रक्रिया भी जरूरी है।” राणा बोले, “बिल्कुल! जहां अधिकारी अच्छा काम करें, उनका सम्मान होय। जहां लापरवाही होय, वहां जांच होय। सरकार का मतलब केवल आदेश जारी करना नहीं, जनता को सेवा मिलना है।”

भ्रष्टाचार पर व्यंग्य नहीं, पारदर्शिता का सवाल

बात भ्रष्टाचार पर पहुंची तो मैंने पूछा, “राणा जी, विकास योजनाओं में गड़बड़ी की शिकायत हो तो जनता क्या करे?” राणा बोले, “संपादक जी, पहिले जानकारी जुटावै। काम का बोर्ड देखै, स्वीकृत लागत पूछै, काम की स्थिति समझै, उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड देखै अउर जरूरत पड़ै तौ लिखित शिकायत करै। केवल सुनी-सुनाई बात पर किसी को चोर कहि देना ठीक नाहीं।”

उनकी बात में व्यंग्य कम और समझदारी ज्यादा थी। किसी योजना में अनियमितता का आरोप हो तो उसके समर्थन में दस्तावेज, भुगतान का विवरण, निरीक्षण रिपोर्ट या अन्य विश्वसनीय प्रमाण जरूरी हैं। शिकायत संबंधित विभाग, सक्षम अधिकारी या निर्धारित शिकायत व्यवस्था तक पहुंचाई जा सकती है। जांच के निष्कर्ष आने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना उचित नहीं है।

राणा ने फिर अपना देसी तीर छोड़ा, “संपादक जी, जनता को ई बताय द्या कि विकास के पैसा का हिसाब मांगना दुश्मनी नाहीं है। पैसा जनता के काम खातिर आया है तौ जनता पूछिहै कि खर्च कहां भवा। हिसाब साफ है तौ डर काहे का, अउर गड़बड़ी है तौ जांच से परहेज काहे का?”

मैंने कहा, “लोकतंत्र में पारदर्शिता किसी एक दल या व्यक्ति के खिलाफ अभियान नहीं है। यह व्यवस्था को बेहतर बनाने का तरीका है।” राणा बोले, “तौ फिर संपादक जी, ई बात हर चुनावी मंच पर लिख द्या—विकास के साथ हिसाब भी जरूरी है। जनता के सवाल से भागै वाला विकास आखिर जनता के भरोसे तक कैसे पहुंची?”

फीता कट गया, अब रखरखाव कौन करेगा?

मैंने पूछा, “राणा जी, उद्घाटन और शिलान्यास की राजनीति पर आपका क्या कहना है?” राणा बोले, “संपादक जी, फीता काटना आसान काम है। कैंची आई, फीता कटा, फोटो खिंची, समाचार छपा। असली परीक्षा तौ तब शुरू होत है जब सड़क टूटै, नाली जाम होय या पानी की टंकी बंद पड़ै।”

विकास की सफलता केवल किसी परियोजना के उद्घाटन से नहीं मापी जानी चाहिए। उसकी गुणवत्ता, उपयोगिता, रखरखाव और आम लोगों को मिलने वाले लाभ का आकलन भी जरूरी है। कोई निर्माण कार्य समय पर पूरा हुआ या नहीं, निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी किस विभाग की है—ये ऐसे सवाल हैं जो सार्वजनिक धन के बेहतर इस्तेमाल में मदद करते हैं।

राणा बोले, “संपादक जी, फोटो खिंचवाना बुरा नाहीं, लेकिन फोटो के बाद काम भी दिखना चाही। जनता को पट्टिका पर नाम पढ़कर नहीं, सुविधा इस्तेमाल करके भरोसा होई। विकास का असली विज्ञापन जनता की संतुष्टि है।”

जाति, समाज और चुनाव: जनता कब तक बंटती रहेगी?

राजनीति से बात समाज की ओर मुड़ी तो मैंने पूछा, “राणा जी, चुनाव में जाति और बिरादरी की चर्चा इतनी क्यों होती है?” राणा बोले, “संपादक जी, चुनाव आते ही पुराना परिचय ताजा हो जात है। कोई बिरादरी का नाम लेत है, कोई समाज के सम्मान की बात करत है, कोई पुराने रिश्ते याद दिलावत है। लेकिन सड़क, स्कूल, अस्पताल अउर रोजगार के सवाल कई बार पीछे छूट जात हैं।”

सामाजिक पहचान लोगों के जीवन का हिस्सा है, लेकिन लोकतांत्रिक निर्णय में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, समान अवसर और सार्वजनिक सेवाओं को भी महत्व मिलना चाहिए। किसी प्रतिनिधि का मूल्यांकन केवल उसकी जाति, समुदाय या राजनीतिक नजदीकी के आधार पर नहीं, बल्कि उसके काम, व्यवहार और जवाबदेही के आधार पर भी होना चाहिए।

राणा बोले, “संपादक जी, चुनाव में जनता का वोट बहुत कीमती है। वोट देके पांच बरस चुप बैठ जाना जरूरी नाहीं। सवाल पूछना, जनसभा में समस्या उठाना, ग्राम सभा में भाग लेना अउर अपने अधिकार जानना भी नागरिक की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं, व्यवस्था की निगरानी करने वाली ताकत भी है।”

पाठा की बोली, संस्कृति और बदलता समाज

मैंने कहा, “राणा जी, राजनीति की बात बहुत हुई। पाठा की बोली-बानी और संस्कृति पर भी कुछ कहिए।” राणा बोले, “संपादक जी, पाठा की बोली मा अपनापन है। आदमी सीधे बात करत है, कभी मजाक मा बड़ी बात कहि जात है। यहां के लोकगीत, कहावतें, मेल-मिलाप अउर कठिन हालात में एक-दूसरे का साथ देय की परंपरा समाज की असली पूंजी हैं।”

स्थानीय बोली केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र की स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। लोककथाओं, गीतों, कहावतों और बुजुर्गों के अनुभवों में वह इतिहास दर्ज है जो कई बार सरकारी दस्तावेजों में नहीं मिलता। बदलते समय में शिक्षा, तकनीक और नए रोजगार के अवसरों के साथ स्थानीय संस्कृति को सहेजना भी महत्वपूर्ण है।

राणा हंसे, “हमरी बोली सुनके कोई हंसे तौ हंसै, लेकिन बोली के भीतर की बात समझै भी। देसी आदमी का मजाक उड़ाना आसान है, उसकी परेशानी समझना कठिन। पाठा के लोगन को केवल चुनावी भीड़ समझै वाला यहां के समाज की असली ताकत नहीं पहचान पावत।”

साहित्य और पत्रकारिता: सवाल पूछना भी समाज सेवा

मैंने पूछा, “राणा जी, पत्रकारिता और साहित्य की इस बातचीत में क्या भूमिका है?” राणा बोले, “संपादक जी, साहित्य समाज को सोचै की ताकत देत है अउर पत्रकारिता समाज के सामने सवाल रखत है। दोनों का काम केवल तारीफ करना नाहीं। जहां अच्छा काम होय, वहां प्रशंसा होय; जहां समस्या होय, वहां तथ्य के साथ बात उठे।”

स्थानीय पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि वह गांवों की समस्याओं, सार्वजनिक योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिकों के अनुभवों को सामने लाए। साथ ही किसी भी आरोप को प्रकाशित करने से पहले तथ्य जांचना, संबंधित पक्ष का जवाब लेना और अफवाह को समाचार से अलग रखना जरूरी है। आलोचना का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही को मजबूत करना होना चाहिए।

राणा बोले, “संपादक जी, कलम की ताकत तब है जब ऊ जनता की बात कहै, लेकिन जिम्मेदारी के साथ। केवल सनसनी से पाठक कुछ देर हंस या नाराज हो सकत है, पर तथ्य पर टिकी बात लंबे समय तक असर छोड़त है। व्यंग्य का तीर व्यवस्था की कमियों पर चले, बिना प्रमाण किसी की इज्जत पर नहीं।”

आखिर जनता चाहती क्या है?

रात काफी हो चुकी थी। मैंने राणा से आखिरी सवाल पूछा, “तो पाठा की जनता की सबसे बड़ी मांग क्या है?” राणा कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, “संपादक जी, जनता बहुत बड़ी-बड़ी बात नाहीं मांगत। रास्ता ठीक होय, बच्चन को पढ़ाई मिले, बीमार को इलाज मिले, किसान-मजदूर को मेहनत का उचित फल मिले, सरकारी दफ्तर में काम नियम से होय अउर जनप्रतिनिधि जरूरत के समय जनता की बात सुनें—ई कोई आसमान से तारा मांगना है का?”

उन्होंने आगे कहा, “नेता जी कहत हैं काम हुआ, तौ जनता पूछिहै कौन काम हुआ। प्रधान जी कहत हैं पैसा खर्च भवा, तौ जनता पूछिहै कहां खर्च भवा। अफसर जी कहत हैं फाइल चल रही है, तौ जनता पूछिहै कब तक पूरी होई। ई सवाल दुश्मनी नाहीं हैं, संपादक जी; ई तो लोकतंत्र के रोजमर्रा के सवाल हैं।”

मैंने कहा, “राणा जी, आपकी बात का मतलब यही है कि विकास के दावों को जमीन पर परखना चाहिए, लेकिन आलोचना भी जिम्मेदारी से होनी चाहिए।” राणा बोले, “बिल्कुल संपादक जी! नेता जी, प्रधान जी, अफसर जी—हमका भाषण कम, काम ज्यादा चाही। अउर काम भवा है तौ हिसाब द्या; काहे कि जनता अब पूछै लागी है, तौ लोकतंत्र की सेहत खातिर ई अच्छी बात है!”

फोन कट गया, लेकिन राणा की बात देर तक मन में गूंजती रही। पाठा की राजनीति पर यह देसी मसखरी केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि एक सीधी बात याद दिलाने के लिए है—लोकतंत्र में जनता की उम्मीदें, जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही एक-दूसरे से जुड़ी हैं। विकास का दावा हो या भ्रष्टाचार की शिकायत, दोनों का मूल्यांकन तथ्यों, पारदर्शिता और जनता को मिलने वाले वास्तविक लाभ के आधार पर होना चाहिए।

‘राणा का मसखरा’ इसी बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश है—पाठा की बोली में, देसी हास्य के साथ और ऐसे सवालों के सहारे जो गांव, समाज, राजनीति, संस्कृति और साहित्य से जुड़े हैं। क्योंकि कभी-कभी एक ठेठ देसी सवाल, लंबे राजनीतिक भाषण से ज्यादा देर तक याद रहता है।

संपादकीय स्पष्टीकरण: यह आलेख काल्पनिक व्यंग्यात्मक टेलीफोनिक संवाद के रूप में लिखा गया है। मानिकपुर, बरगढ़ और रैपुरा के संदर्भ उदाहरणात्मक हैं; इन्हें किसी विशिष्ट सड़क, व्यक्ति, अधिकारी या जनप्रतिनिधि के विरुद्ध प्रमाणित आरोप न माना जाए। किसी वास्तविक स्थानीय समस्या या अनियमितता पर निष्कर्ष निकालने से पहले स्वतंत्र तथ्य-जांच आवश्यक है।

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