रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला | जनगणदूत
मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड में एक ऐसा भावनात्मक मोड़ सामने आया है, जिसने एक बार फिर अपराध, सजा और मासूम बच्चों के भविष्य से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पति सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में मौत की सजा पाने वाली मुस्कान रस्तोगी की 10 महीने की बेटी राधा को लेकर मुंबई के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर फैजान अंसारी ने मेरठ जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने बच्ची को गोद लेने और उसकी परवरिश से लेकर पढ़ाई, इलाज तथा भविष्य की जिम्मेदारियां उठाने की इच्छा जताते हुए अदालत में अर्जी दाखिल की है। हालांकि, इस पहल के बाद सबसे अहम सवाल यही है कि राधा के हितों को ध्यान में रखते हुए कानून क्या फैसला करता है और उसे सुरक्षित, स्थिर तथा स्नेहपूर्ण बचपन कैसे मिल सकेगा।
इस मामले में एक ओर पति की निर्मम हत्या से जुड़ा गंभीर आपराधिक प्रकरण है, तो दूसरी ओर ऐसी बच्ची का भविष्य है, जिसका इस अपराध में कोई दोष नहीं है। अदालत के फैसले, कानूनी प्रक्रिया और पारिवारिक परिस्थितियों के बीच राधा की जिंदगी का सवाल संवेदनशीलता के साथ देखा जाना जरूरी है। मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड अब केवल अपराध और सजा की खबर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भी चर्चा में है कि गंभीर अपराध के आरोप में दोषसिद्ध माता-पिता के बच्चों की देखभाल और पुनर्वास की व्यवस्था किस तरह की जानी चाहिए।
राधा को गोद लेने के लिए फैजान अंसारी ने दी अर्जी
मुंबई के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर फैजान अंसारी ने मेरठ जिला अदालत में अर्जी देकर 10 महीने की राधा को गोद लेने की इच्छा जाहिर की है। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने बताया कि मुस्कान को 14 अक्टूबर को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद उन्होंने बच्ची के भविष्य के बारे में सोचा और अपनी कानूनी टीम से चर्चा की। इसके बाद वह बच्ची की जिम्मेदारी उठाने का प्रस्ताव लेकर अदालत पहुंचे।
फैजान के मुताबिक, उनका उद्देश्य राधा को जेल के वातावरण से बाहर एक बेहतर जीवन और परवरिश उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि वह बच्ची की शिक्षा, स्वास्थ्य, कपड़ों और भविष्य की अन्य जरूरतों का खर्च उठाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि वह उसकी शादी तक की जिम्मेदारी निभाना चाहते हैं। इस दावे के समर्थन में उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति से संबंधित जानकारी भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने की बात कही है।
फैजान ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके अनुसार इस पहल का उद्देश्य न तो मुस्कान को मिली सजा की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना है और न ही प्रचार हासिल करना। हालांकि, किसी बच्चे को गोद लेने की इच्छा व्यक्त करना और कानूनी रूप से उसका अभिभावक बन जाना दो अलग-अलग बातें हैं। अर्जी पर निर्णय संबंधित कानूनों, आवश्यक जांच और बच्ची के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखकर ही किया जा सकता है। फिलहाल फैजान की पहल को बच्ची के भविष्य से जुड़ा प्रस्ताव माना जाना चाहिए, न कि गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हो जाने की पुष्टि।
जेल में मां के साथ रह रही है मासूम राधा
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राधा का जन्म 24 नवंबर 2025 को मेरठ के एक मेडिकल कॉलेज में हुआ था। जन्म के बाद से वह अपनी मां मुस्कान के साथ मेरठ जिला जेल में रह रही है। जेल संबंधी नियमों के तहत महिला बंदियों के छोटे बच्चों को निर्धारित आयु तक अपनी मां के साथ रहने की अनुमति हो सकती है। सामान्य तौर पर छह वर्ष तक के बच्चों के संबंध में यह व्यवस्था लागू होती है, लेकिन प्रत्येक मामले में लागू नियमों, बच्चे की परिस्थितियों और संबंधित अधिकारियों की प्रक्रिया को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मां के साथ जेल में रह रही राधा के भविष्य को लेकर फैजान की अर्जी ने एक नई चर्चा शुरू कर दी है। क्या बच्ची को किसी उपयुक्त परिवार में सुरक्षित वातावरण मिल सकेगा? क्या उसे ऐसी परवरिश उपलब्ध हो पाएगी, जिसमें उसकी भावनात्मक जरूरतों, स्वास्थ्य और शिक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए? और यदि गोद लेने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं होता, तो उसके लिए वैकल्पिक देखभाल की क्या व्यवस्था होगी? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल भावनाओं या सार्वजनिक चर्चाओं से नहीं, बल्कि ठोस कानूनी प्रक्रिया और बच्चे की जरूरतों के आकलन से मिलना चाहिए।
राधा के मामले में यह भी जरूरी है कि उसकी पहचान, गरिमा और निजी जीवन की रक्षा की जाए। किसी गंभीर अपराध से जुड़े परिवार में जन्म लेने का अर्थ यह नहीं कि बच्चे को भी समाज की नफरत या तिरस्कार का सामना करना पड़े। एक मासूम बच्ची को सुरक्षित बचपन, उचित शिक्षा, चिकित्सा सुविधा और भावनात्मक सहारा मिलना चाहिए। यही किसी भी संवेदनशील बाल संरक्षण व्यवस्था की बुनियादी कसौटी है।
सात साल की पीहू भी नाना-नानी के साथ रह रही है
मुस्कान रस्तोगी की एक बड़ी बेटी पीहू भी है, जिसकी उम्र करीब सात वर्ष बताई गई है। वह फिलहाल अपनी मां के माता-पिता के साथ रह रही है। इस प्रकार, इस पूरे प्रकरण का प्रभाव केवल राधा तक सीमित नहीं है। परिवार की दोनों बच्चियों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन उनके सामने सुरक्षित वातावरण, स्थिर पारिवारिक संबंधों और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े सवाल मौजूद हैं।
बच्चों के लिए माता-पिता से जुड़ी परिस्थितियां समझना और उनसे भावनात्मक रूप से निपटना आसान नहीं होता। ऐसे समय में परिवार, बाल कल्याण से जुड़ी संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चियों को उनकी उम्र के अनुरूप देखभाल मिले, उनकी पढ़ाई बाधित न हो और उन्हें परिवार के आपराधिक मामले के कारण सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े।
राधा को गोद लेने की अर्जी पर विचार करते समय उसकी मौजूदा देखभाल, संभावित अभिभावक की पृष्ठभूमि, घरेलू वातावरण, आर्थिक स्थिरता और दीर्घकालीन जिम्मेदारी निभाने की क्षमता जैसे पहलुओं का मूल्यांकन महत्वपूर्ण होगा। केवल आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं हैं; बच्चे को निरंतर स्नेह, सुरक्षा, जिम्मेदार अभिभावकत्व और उम्र बढ़ने के साथ बदलती जरूरतों के अनुरूप सहयोग भी चाहिए।
क्या था मेरठ का चर्चित ब्लू ड्रम हत्याकांड?
मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड ने मार्च 2025 में सामने आने के बाद देशभर में व्यापक चर्चा पैदा की थी। मामले के केंद्र में सौरभ राजपूत की हत्या और उनके शव को छिपाने के लिए कथित तौर पर अपनाया गया तरीका था। पुलिस के आरोपों के मुताबिक, हत्या के बाद शव के टुकड़े किए गए और उन्हें नीले ड्रम में रखकर सीमेंट से ढक दिया गया। इस भयावह घटनाक्रम के कारण मामला लंबे समय तक सुर्खियों में रहा।
प्रस्तुत घटनाक्रम के अनुसार, सौरभ राजपूत ने वर्ष 2016 में मुस्कान रस्तोगी से प्रेम विवाह किया था। वर्ष 2019 में दोनों के बीच विवाद हुआ और वे अलग रहने लगे। इसी वर्ष उनकी बेटी पीहू का जन्म हुआ। बाद में परिवार के हस्तक्षेप से दोनों के बीच समझौता हुआ और वे फिर साथ रहने लगे। इसके बाद सौरभ लंदन चले गए। इसी दौरान मुस्कान की अपने स्कूल के सहपाठी साहिल शुक्ला से नजदीकियां बढ़ने की बात सामने आई।
बताया गया है कि सौरभ 24 फरवरी 2025 को लंदन से भारत लौटे थे। अभियोजन पक्ष के आरोपों के अनुसार, 3 मार्च की रात मुस्कान और साहिल ने खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर सौरभ को बेहोश किया और फिर धारदार हथियार से उनकी हत्या कर दी। आरोप है कि इसके बाद शव के टुकड़े कर उन्हें नीले ड्रम में रखा गया और सीमेंट भरकर छिपाने की कोशिश की गई। इन आरोपों से संबंधित तथ्यों और साक्ष्यों पर अदालत में सुनवाई हुई।
पुलिस ने मामले में करीब एक हजार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और विभिन्न साक्ष्यों को पेश किया। जांच से जुड़े विवरणों में चाकू, उस्तरा, सीमेंट, बालू और नीले ड्रम की खरीद से संबंधित तथ्य भी शामिल बताए गए। पुलिस तथा फोरेंसिक टीम की गवाही और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से संबंधित साक्ष्यों को भी अदालत के समक्ष रखा गया। किसी भी आपराधिक मुकदमे में इन साक्ष्यों का महत्व अदालत द्वारा उनके परीक्षण और कानूनी मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित होता है।
अदालत ने सुनाई मौत की सजा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का महत्व बरकरार
प्रस्तुत जानकारी के मुताबिक, अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया। इसके बाद 14 अक्टूबर 2026 को सजा के बिंदु पर सुनवाई पूरी होने के पश्चात दोनों को मौत की सजा सुनाई गई। इस फैसले ने मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। हालांकि, मौत की सजा सुनाया जाना और उस सजा का अंतिम रूप से लागू होना अलग-अलग कानूनी चरण हैं। आगे की न्यायिक प्रक्रिया और अपील से संबंधित अधिकारों का महत्व बना रहता है।
इस मामले में पीड़ित सौरभ राजपूत को न्याय दिलाने का प्रश्न अपनी जगह महत्वपूर्ण है। वहीं, उनकी हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए लोगों के बच्चों का भविष्य एक अलग मानवीय और कानूनी प्रश्न है। इन दोनों पहलुओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय स्वतंत्र रूप से समझने की आवश्यकता है। पीड़ित परिवार के दर्द और न्याय की अपेक्षा का सम्मान करते हुए भी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि बच्चों को उनके माता-पिता के अपराध के लिए दंडित न किया जाए।
राधा का भविष्य: भावनाओं से आगे बढ़कर जिम्मेदार फैसला जरूरी
फैजान अंसारी की अर्जी के बाद अब सबकी निगाहें अदालत और संबंधित बाल कल्याण प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि गोद लेने का प्रस्ताव कानूनी रूप से विचार योग्य पाया जाता है, तो बच्ची की सुरक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक जरूरतों और दीर्घकालीन हितों का समुचित आकलन आवश्यक होगा। साथ ही, संभावित अभिभावक की उपयुक्तता और यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि बच्ची को किसी तरह के शोषण, अस्थिरता या अवांछित सार्वजनिक प्रदर्शन का सामना न करना पड़े।
सोशल मीडिया पर चर्चित हस्तियों की ओर से किए गए ऐसे प्रस्ताव लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं, लेकिन बच्चे के जीवन से जुड़ा फैसला लोकप्रियता, भावुक बयानों या आर्थिक दावों के आधार पर नहीं होना चाहिए। राधा को अपनाने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह समझना जरूरी है कि अभिभावकत्व एक लंबे समय की जिम्मेदारी है। इसमें केवल खर्च उठाना ही नहीं, बल्कि बच्ची को सुरक्षित घर, सम्मान, अपनापन और कठिन परिस्थितियों में भरोसेमंद सहारा देना भी शामिल है।
मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड में राधा की कहानी हमें याद दिलाती है कि अपराध की खबरों के पीछे ऐसे जीवन भी होते हैं, जिनकी कोई गलती नहीं होती। दस महीने की इस बच्ची को अभी अपने आसपास की घटनाओं का अर्थ समझने की उम्र भी नहीं मिली है, लेकिन उसके भविष्य को लेकर बड़े फैसलों की चर्चा शुरू हो गई है। उसके लिए सबसे जरूरी है कि कानूनी प्रक्रिया निष्पक्ष हो, देखभाल की व्यवस्था सुरक्षित हो और उसके बचपन को सनसनी या सार्वजनिक विवाद का हिस्सा बनाने से बचाया जाए।
अब सवाल यह नहीं कि कौन सार्वजनिक रूप से सबसे बड़ा दावा करता है, बल्कि यह है कि राधा के लिए सबसे सुरक्षित और स्थायी व्यवस्था कौन-सी होगी। अदालत का निर्णय, बाल संरक्षण से जुड़े नियम और बच्ची के सर्वोत्तम हित इस दिशा में निर्णायक होने चाहिए। न्याय का उद्देश्य अपराध के लिए जवाबदेही तय करना है, जबकि एक मासूम के भविष्य की रक्षा करना समाज और व्यवस्था की मानवीय जिम्मेदारी है। राधा को एक ऐसा बचपन मिलना चाहिए जिसमें उसकी पहचान किसी अपराध से नहीं, बल्कि उसके अपने अधिकारों, संभावनाओं और सुरक्षित भविष्य से तय हो।
जनगणदूत का दृष्टिकोण: मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड में न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह है और मासूम राधा के भविष्य की सुरक्षा अपनी जगह। फैजान अंसारी की अर्जी पर निर्णय कानून के अनुसार होना चाहिए। बच्ची के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि उसे सुरक्षित परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिले।












