19 अक्टूबर 2026 1:07 पूर्वाह्न

रेत का साम्राज्य : नदियों की कोख, मुनाफे का कारोबार और कानून की कमजोर पकड़

उत्तर प्रदेश में अवैध रेत खनन, CAG रिपोर्ट में 408.68 करोड़ रुपये की लंबित वसूली, पर्यावरणीय नुकसान और कानून की कमजोर पकड़ पर रिपोर्टर संजय सिंह राणा की विशेष पड़ताल।

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संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की नदियों को अगर प्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। गंगा, यमुना, घाघरा, चंबल, बेतवा, केन, राप्ती, सोन और मंदाकिनी जैसी नदियों ने सदियों से खेतों को पानी दिया, बस्तियों को जीवन दिया और सभ्यताओं को आकार दिया। इन्हीं नदियों के तल में जमा बालू और मोरंग ने आधुनिक भारत के निर्माण को भी गति दी है। सड़कें, पुल, एक्सप्रेसवे, मकान, स्कूल, अस्पताल, औद्योगिक भवन और शहरों का विस्तार—इन सबके पीछे रेत और अन्य लघु खनिजों की भारी मांग है। लेकिन यहीं से कहानी का दूसरा चेहरा सामने आता है।

जहाँ रेत विकास की जरूरत है, वहीं वही रेत जब अनियंत्रित दोहन का माध्यम बनती है तो नदी का भूगोल बदलने लगता है, खेतों तक पहुंचने वाले भारी वाहनों से ग्रामीण जीवन प्रभावित होता है, सरकारी राजस्व की चोरी होती है और कई इलाकों में खनन से जुड़ी दबंगई तथा हिंसा की शिकायतें सामने आती हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों में हजारों अवैध खनन और परिवहन मामलों पर कार्रवाई हुई है। फिर भी अवैध खनन की समस्या खत्म नहीं हुई।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की उत्तर प्रदेश में खनन पर रिपोर्ट ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 से 2022 के बीच 11 जिलों में 45 पट्टाधारकों द्वारा पट्टा क्षेत्र से बाहर लगभग 268.91 हेक्टेयर में खनिज निकाले जाने का पता चला। न्यूनतम एक मीटर गहराई मानते हुए ऑडिट ने लगभग 26.89 लाख घन मीटर खनिज के अवैध उत्खनन का अनुमान लगाया। इससे संबंधित लगभग 408.68 करोड़ रुपये की वसूली लंबित थी। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है—CAG ने 408.68 करोड़ रुपये को सीधे-सीधे “राजस्व की चोरी” या “राज्य का नुकसान” नहीं कहा, बल्कि लंबित वसूली के रूप में दर्ज किया है।

यानी असली कहानी सिर्फ यह नहीं है कि अवैध खनन करने वाले कौन हैं। सवाल यह भी है कि सरकारी निगरानी और वसूली का तंत्र कितना प्रभावी है।

रेत सिर्फ रेत नहीं है

शहरों में रहने वाले व्यक्ति के लिए रेत अक्सर निर्माण सामग्री का एक ढेर भर होती है। लेकिन नदी के लिए रेत उसके पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। नदी तल की रेत पानी के प्रवाह, भूजल पुनर्भरण, जलीय जीवों के आवास और नदी की भौतिक संरचना से जुड़ी होती है।

इसीलिए वैज्ञानिक रेत खनन का अर्थ केवल यह नहीं मानते कि नदी में मौजूद रेत को जितना चाहें उतना निकाल लिया जाए। प्रश्न यह है कि नदी में प्राकृतिक रूप से जितनी रेत वापस जमा हो रही है, उसके मुकाबले निकासी कितनी है।

सतत रेत खनन की केंद्रीय दिशानिर्देशों और पर्यावरणीय व्यवस्थाओं का मूल विचार भी यही है कि खनन वैज्ञानिक अध्ययन और पुनर्भरण क्षमता के आधार पर होना चाहिए। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2020 में रेत खनन के लिए अलग Enforcement and Monitoring Guidelines भी जारी की थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी अलग-अलग मामलों में वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय स्वीकृति के महत्व को रेखांकित किया है। चंबल और उससे जुड़े क्षेत्रों में अवैध खनन के मामलों पर न्यायालय की सख्ती और राजस्थान में वैज्ञानिक replenishment study पूरी होने तक रेत-बजरी खनन पर रोक का आदेश इस बात का उदाहरण है कि न्यायपालिका रेत को केवल व्यापारिक वस्तु मानकर नहीं चलती।

उत्तर प्रदेश में खनन का भूगोल

उत्तर प्रदेश में नदीय बालू और मोरंग का भौगोलिक वितरण व्यापक है। बुंदेलखंड में बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, जालौन, झांसी और ललितपुर जैसे जिले विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। यमुना, केन, बेतवा और मंदाकिनी क्षेत्र में खनन की आर्थिक गतिविधियां लंबे समय से मौजूद हैं।

पूर्वांचल में घाघरा, राप्ती और गंगा से जुड़े जिलों में बालू की मांग और आपूर्ति का बड़ा तंत्र है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना और गंगा के तटीय इलाके भी खनन गतिविधियों से जुड़े हैं। यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है—हर खनन अवैध नहीं होता।

सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत पट्टा दिया गया हो, पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त हो, निर्धारित क्षेत्र और गहराई में खनिज निकाला जाए, रॉयल्टी तथा अन्य शुल्क जमा हों और परिवहन के लिए वैध दस्तावेज हों तो खनन कानूनी व्यवस्था के भीतर आता है।

समस्या तब शुरू होती है जब पट्टा क्षेत्र से बाहर खुदाई हो, स्वीकृत मात्रा या गहराई से अधिक खनन किया जाए, बिना अनुमति खनिज निकाला जाए, सरकारी या निजी भूमि से अवैध उत्खनन हो, रॉयल्टी की चोरी हो अथवा वैध दस्तावेजों के नाम पर अवैध परिवहन किया जाए।

“खनन माफिया” कानूनी शब्द नहीं है। यह आम तौर पर ऐसे संगठित या प्रभावशाली नेटवर्क के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला सामाजिक और पत्रकारिता का शब्द है जिन पर अवैध खनन, परिवहन, भंडारण, दबाव या हिंसा जैसी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगते हैं।

CAG ने खोल दी व्यवस्था की कमजोर नस

उत्तर प्रदेश में खनन विभाग की कार्रवाई के आंकड़े एक तरफ हैं और CAG की टिप्पणियां दूसरी तरफ।

CAG के अनुसार 2017-18 में अवैध उत्खनन और परिवहन के 10,188 मामले विभाग ने दर्ज किए थे। यह संख्या 2021-22 में बढ़कर 25,986 हो गई। इसी अवधि में लगाए गए अर्थदंड की राशि 30.45 करोड़ रुपये से बढ़कर 138.37 करोड़ रुपये हुई और वसूली 28.73 करोड़ से बढ़कर 124.89 करोड़ रुपये हुई।

यहां भी आंकड़े को सही अर्थ में पढ़ना जरूरी है। मामलों की संख्या बढ़ना दो चीजों का संकेत हो सकता है—अवैध गतिविधियों में वृद्धि और निगरानी/प्रवर्तन में बढ़ोतरी। केवल इस आंकड़े से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे राज्य में अवैध खनन उसी अनुपात में बढ़ा। लेकिन CAG की दूसरी टिप्पणियां अधिक गंभीर हैं।

ऑडिट में पाया गया कि खनन गतिविधियों की निगरानी के लिए उपलब्ध तकनीकी प्रणाली का उपयोग स्थल पर अवैध खनन पकड़ने के लिए अपेक्षित स्तर पर नहीं किया गया। मानव संसाधन की कमी के कारण निरीक्षण भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हो पाए। 408.68 करोड़ रुपये की वसूली लंबित रहने को भी CAG ने निगरानी की कमियों से जोड़ा।

रिपोर्ट में लगभग 613 स्टोन क्रशरों के पास अनिवार्य स्टोरेज लाइसेंस न होने की बात भी सामने आई। कुछ स्थानों पर पट्टों की स्थिति, परिवहन दस्तावेजों और निर्धारित मात्रा के पालन को लेकर गंभीर अनियमितताएं मिलीं।

यानी समस्या केवल नदी में चल रही मशीनों तक सीमित नहीं है। खनन का पूरा चक्र—पट्टा, खुदाई, भंडारण, परिवहन, रॉयल्टी, दस्तावेज और वसूली—यदि कमजोर है तो अवैध कारोबार के लिए जगह बनती है।

2026 में क्या बदला?

यह कहना भी गलत होगा कि सरकार कुछ नहीं कर रही। उत्तर प्रदेश में तकनीकी निगरानी, चेकगेट, ई-रवन्ना, वाहन निगरानी और जिला स्तरीय टास्क फोर्स जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। सरकार की ओर से हाल के वर्षों में ड्रोन सर्वेक्षण और तकनीकी निगरानी बढ़ाने का दावा भी किया गया है।

मई 2026 में उत्तर प्रदेश सरकार की सूचना शाखा ने बताया कि अवैध खनन, अवैध परिवहन और ओवरलोडिंग के खिलाफ अभियान में 7,339 वाहनों पर कार्रवाई की गई और 33.71 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया।

विधान परिषद में उपलब्ध सरकारी उत्तरों से भी पता चलता है कि कार्रवाई जारी है। उदाहरण के तौर पर एक सरकारी उत्तर में 2024-25 में मार्च 2025 तक 10,680 वाहनों पर कार्रवाई और 34.75 करोड़ रुपये की शास्ति जमा होने तथा 117 मामलों में FIR दर्ज होने की जानकारी दी गई। उसी उत्तर में 2025-26 में जून 2025 तक 3,292 वाहनों पर कार्रवाई, 11.13 करोड़ रुपये की शास्ति जमा और 51 FIR की जानकारी दी गई।

लेकिन अक्टूबर 2026 की स्थिति में 2026-27 का पूरे राज्य का पूर्ण-वर्षीय अवैध खनन आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस लेख में कोई अनुमानित वार्षिक संख्या प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

2026-27 के बजट से एक और बात स्पष्ट होती है। उत्तर प्रदेश का स्वयं का गैर-कर राजस्व 2025-26 के संशोधित अनुमान 13,664 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 26,754 करोड़ रुपये अनुमानित है। PRS के अनुसार इस वृद्धि के प्रमुख कारणों में खनन से मिलने वाली concession fee, rent और royalty भी शामिल हैं। इससे खनन की आर्थिक अहमियत समझी जा सकती है।

सरकार के लिए खनन केवल पर्यावरण का विषय नहीं है; यह राजस्व और विकास का भी हिस्सा है।

आखिर खनन बंद क्यों नहीं किया जा सकता?

क्योंकि देश को निर्माण करना है। भारत का शहरीकरण बढ़ रहा है। सड़कें बन रही हैं। एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। पुल, रेलवे लाइन, आवासीय परियोजनाएं, औद्योगिक परिसर, अस्पताल और स्कूल बन रहे हैं। इन सबके लिए निर्माण सामग्री चाहिए।

इसलिए रेत खनन पर पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान नहीं है। ऐसा करने से मांग खत्म नहीं होगी; संभव है कि वैध आपूर्ति घटने के साथ अवैध बाजार और मजबूत हो जाए।

असल प्रश्न है—कितना खनन? कहां खनन? किस गहराई तक? किस मौसम में? किस वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर? और निकाले गए प्रत्येक घन मीटर खनिज का हिसाब कौन रखेगा?

यही वे प्रश्न हैं जिन पर खनन नीति का भविष्य निर्भर करता है।

जब डंपर मौत की वजह बन जाए

खनन की बहस में एक पक्ष अक्सर छूट जाता है—परिवहन। नदी से बालू निकालने के बाद उसे बाजार तक पहुंचाने के लिए ट्रक, डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉलियां चलती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हीं वाहनों के आवागमन को लेकर सबसे अधिक शिकायतें सुनाई देती हैं।

तेज गति, ओवरलोडिंग, खराब ग्रामीण सड़कें और रात में भारी वाहनों की आवाजाही दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है।

SANDRP द्वारा अप्रैल 2022 से फरवरी 2023 के बीच उत्तर भारत में नदीय खनन से जुड़े हादसों और हिंसा के संकलन के अनुसार कम से कम 74 लोगों की मौत हुई। इनमें उत्तर प्रदेश में 46 मौतें दर्ज की गईं। संस्था के अनुसार उत्तर प्रदेश में 21 सड़क हादसों में 36 लोगों की मौत और 83 लोग घायल हुए; ये हादसे रेत ढोने वाले वाहनों से जुड़े थे।

यह सरकारी समेकित अपराध आंकड़ा नहीं है, बल्कि मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध घटनाओं के आधार पर SANDRP का संकलन है। इसलिए इसे उसी सीमा के साथ उद्धृत किया जाना चाहिए।

लेकिन इसकी चेतावनी स्पष्ट है—खनन की लागत सिर्फ रॉयल्टी और पर्यावरण में नहीं गिनी जा सकती। सड़क सुरक्षा भी उसका हिस्सा है।

किसान के लिए खनन का अर्थ क्या है?

खनन क्षेत्र से सटे गांवों में तस्वीर विरोधाभासी है। एक किसान के लिए भारी वाहनों से खेत की मेड़ टूटना, रास्ता खराब होना या फसल को नुकसान पहुंचना गंभीर समस्या है। दूसरे ग्रामीण के लिए वही खनन रोजी-रोटी का साधन हो सकता है।

डंपर चालक, मशीन ऑपरेटर, मजदूर, पेट्रोल पंप, वाहन मरम्मत की दुकान, पंचर की दुकान, ढाबे और निर्माण सामग्री का कारोबार—एक पूरा स्थानीय आर्थिक तंत्र खनन से जुड़ जाता है। यही कारण है कि खनन के खिलाफ हर गांव में एक जैसी राय नहीं होती। कहीं ग्रामीण नदी बचाने की मांग करते हैं, तो कहीं लोग रोजगार के लिए खनन का समर्थन करते हैं। इस विरोधाभास को समझे बिना खनन की समस्या का समाधान संभव नहीं।

क्या खनन से पर्यावरणीय नुकसान की कीमत कभी तय हुई?

यह सबसे असुविधाजनक प्रश्न है। खनन से मिलने वाले राजस्व की गणना सरकार के पास होती है। पट्टे की कीमत तय होती है। रॉयल्टी तय होती है। जुर्माने का हिसाब होता है।

लेकिन अगर किसी गांव की सड़क बार-बार टूटती है तो उसका खर्च किस खाते में जाता है? अगर नदी का किनारा तेजी से कटता है तो उसका आर्थिक मूल्य क्या है? अगर किसी क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण प्रभावित होता है तो उसकी कीमत कौन लगाएगा?

अगर किसी दुर्घटना में किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य चला जाता है तो उस सामाजिक नुकसान को किस राजस्व गणना में दर्ज किया जाता है? और यदि नदी की प्राकृतिक संरचना बदलती है तो उसकी भरपाई कौन करेगा?

जब तक खनन के लाभ के साथ उसकी सामाजिक और पर्यावरणीय लागत की भी गणना नहीं होगी, तब तक सरकारी खाता अधूरा रहेगा।

पत्रकारों के लिए खनन क्यों जोखिमपूर्ण बीट है?

अवैध खनन की रिपोर्टिंग का एक और पक्ष है—पत्रकारों की सुरक्षा।

उन्नाव के पत्रकार शुभम मणि त्रिपाठी की हत्या इस संदर्भ में सबसे गंभीर उदाहरणों में गिनी जाती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार त्रिपाठी 19 जून 2020 को मारे गए थे और वे अवैध बालू खनन पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। आयोग के दस्तावेज में यह भी दर्ज है कि उन्होंने अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई थी। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने 16 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी आयोग को दी।

यह मामला सिर्फ एक पत्रकार की हत्या का मामला नहीं था। यह इस सवाल से जुड़ा था कि स्थानीय स्तर पर आर्थिक हितों से टकराने वाली पत्रकारिता कितनी सुरक्षित है।

मध्य प्रदेश के पत्रकार संदीप कोठारी की 2015 में हत्या भी इसी व्यापक संदर्भ में चर्चा में रही। उनके बारे में उपलब्ध रिपोर्टों में अवैध खनन और प्रभावशाली स्थानीय हितों के खिलाफ उनकी पत्रकारिता का उल्लेख मिलता है।

इन मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि खनन से जुड़े हर अपराध में पत्रकारिता कारण होती है। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि अवैध आर्थिक नेटवर्क की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार कई जगह दबाव और जोखिम का सामना करते रहे हैं। इसलिए खनन नीति की चर्चा में पत्रकार सुरक्षा को भी एक संस्थागत प्रश्न माना जाना चाहिए।

अधिकारी भी हमेशा सुरक्षित नहीं

खनन रोकने की कोशिश करने वाले राजस्व, पुलिस, वन और खनन विभाग के अधिकारियों पर दबाव या हमले की घटनाएं भी अलग-अलग राज्यों में सामने आती रही हैं।

SANDRP के उसी संकलन में अप्रैल 2022 से फरवरी 2023 के बीच उत्तर भारत में खनन से जुड़े मामलों में सरकारी अधिकारियों पर हमलों की अनेक घटनाएं दर्ज की गईं। उत्तर प्रदेश में भी अधिकारियों के साथ हिंसा या टकराव की घटनाओं का उल्लेख है।

इससे पता चलता है कि समस्या केवल “माफिया बनाम सरकार” की सरल कहानी नहीं है। वास्तविकता में सामने एक बड़ा आर्थिक तंत्र होता है, जिसमें पट्टाधारक, परिवहनकर्ता, ठेकेदार, स्थानीय कारोबारी और मजदूर तक अलग-अलग स्तर पर जुड़े हो सकते हैं।

फिर हर सरकार के दौर में यह समस्या क्यों बनी रहती है?

यही सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक प्रश्न है। सरकारें बदलती रहीं। नीतियां बदलीं। ऑनलाइन व्यवस्था आई। ई-रवन्ना आया। चेकगेट लगे। ड्रोन सर्वेक्षण की व्यवस्था बढ़ी। टास्क फोर्स बनी। हजारों वाहन पकड़े गए। करोड़ों रुपये की वसूली हुई। फिर भी अवैध खनन की शिकायतें क्यों समाप्त नहीं हुईं? इसका एक उत्तर आर्थिक है।

रेत और मोरंग का कारोबार मांग आधारित है। निर्माण उद्योग जितना बड़ा होगा, निर्माण सामग्री की मांग उतनी ही बड़ी होगी। वैध आपूर्ति में किसी भी प्रकार की कमी अवैध बाजार के लिए अवसर पैदा कर सकती है। दूसरा उत्तर प्रशासनिक है।

यदि पट्टा देने से लेकर वास्तविक खनन, परिवहन और अंतिम बिक्री तक अलग-अलग विभागों के बीच आंकड़ों का समन्वय कमजोर है तो एक जगह की अनियमितता दूसरी जगह पकड़ में नहीं आती। तीसरा उत्तर स्थानीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था का है।

जहां खनन से जुड़े हजारों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं, वहां कार्रवाई का सामाजिक प्रभाव भी होता है। और चौथा उत्तर तकनीकी है। ड्रोन या ऑनलाइन पोर्टल तभी प्रभावी होंगे जब प्राप्त सूचना पर तुरंत कार्रवाई भी हो। तकनीक स्वयं भ्रष्टाचार खत्म नहीं करती। तकनीक केवल सूचना देती है। कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति प्रशासन को दिखानी पड़ती है।

CAG की रिपोर्ट का असली संदेश

CAG की रिपोर्ट का महत्व इसी जगह सामने आता है। ऑडिट ने केवल यह नहीं कहा कि अवैध खनन हुआ। उसने उस व्यवस्था की कमजोरियां भी दर्ज कीं जो इसे रोकने के लिए बनाई गई थी। पट्टा क्षेत्र से बाहर खनन। बिना लाइसेंस स्टोन क्रशर। लंबित वसूली। निरीक्षण में कमी। मानव संसाधन की कमी। तकनीकी निगरानी के सीमित उपयोग। इन सबको एक साथ देखें तो समस्या किसी एक व्यक्ति या एक जिले की नहीं रह जाती। यह governance का प्रश्न बन जाती है।

जब 45 पट्टाधारकों द्वारा 268.91 हेक्टेयर क्षेत्र में पट्टा क्षेत्र से बाहर खनन का ऑडिट में पता चलता है और उससे जुड़ी 408.68 करोड़ रुपये की वसूली लंबित रहती है, तो सवाल यह बनता है कि सरकारी नक्शे और जमीन पर वास्तविक खनन के बीच दूरी कितनी है।

क्या समाधान सिर्फ ड्रोन है? नहीं। ड्रोन निगरानी उपयोगी है, लेकिन अकेली पर्याप्त नहीं। एक प्रभावी व्यवस्था के लिए पांच स्तर जरूरी हैं।

पहला—हर खनन क्षेत्र का वैज्ञानिक और सार्वजनिक डिजिटल नक्शा।
दूसरा—पट्टा क्षेत्र की वास्तविक सीमा का जियो-फेंसिंग।
तीसरा—निकाले गए खनिज की मात्रा का डिजिटल हिसाब।
चौथा—खनिज से लदे प्रत्येक वाहन की वास्तविक समय में निगरानी।
पांचवां—स्थानीय शिकायतों पर समयबद्ध और स्वतंत्र कार्रवाई।

इसके साथ पर्यावरणीय पुनर्वास की शर्तों को कागज से निकालकर जमीन पर लागू करना होगा। CAG ने खनन क्षेत्रों में पौधरोपण और बंद खदानों के पुनर्वास से जुड़े मामलों में भी कमियां दर्ज की थीं। इसका अर्थ साफ है—खनन खत्म होने के बाद जिम्मेदारी खत्म नहीं होनी चाहिए।

स्थानीय लोगों को सिर्फ शिकायतकर्ता नहीं, निगरानीकर्ता बनाना होगा

जिस गांव के पास खनन हो रहा है, वहां के लोग सबसे पहले देखते हैं कि रात में कौन-सी गाड़ी आ रही है, कहां रास्ता बनाया गया, नदी में कहां गहराई बढ़ी और कहां पट्टा क्षेत्र की सीमा पार हुई। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ग्रामीण अक्सर शिकायतकर्ता भर रह जाते हैं। उन्हें निगरानी तंत्र का हिस्सा बनाया जा सकता है। ग्राम पंचायत स्तर पर सार्वजनिक सूचना बोर्ड हों। खनन पट्टे की सीमा और वैध अवधि सार्वजनिक हो। प्रति दिन अनुमत मात्रा सार्वजनिक हो। शिकायत दर्ज करने की डिजिटल और स्थानीय व्यवस्था हो। शिकायत के निस्तारण की समयसीमा तय हो। और सबसे महत्वपूर्ण—शिकायतकर्ता की पहचान और सुरक्षा की व्यवस्था हो।

राजनीति और खनन : आरोपों से आगे की जरूरत

खनन और राजनीति का संबंध उत्तर प्रदेश में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। अलग-अलग सरकारों के समय विपक्ष ने सत्ता पक्ष पर संरक्षण के आरोप लगाए और सरकारों ने कार्रवाई के आंकड़े पेश किए। लेकिन इस बहस को आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखना समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचता।

जरूरत यह देखने की है कि किसी भी सरकार में खनन पट्टों का आवंटन कितना पारदर्शी है, पर्यावरणीय स्वीकृतियों का पालन कितना हुआ, राजस्व कितना मिला, अवैध खनन पर कितना जुर्माना लगा और उस जुर्माने की वास्तविक वसूली कितनी हुई। व्यक्ति बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती।
व्यवस्था तब बदलती है जब नियम व्यक्ति से ऊपर हो।

उत्तर प्रदेश से आगे : यह पूरे भारत का सवाल है

अवैध रेत खनन की समस्या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड और महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों में समय-समय पर रेत और अन्य खनिजों के अवैध उत्खनन को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई, हिंसा, पर्यावरणीय विवाद और न्यायालयी हस्तक्षेप हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों ने भी यह स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय सुरक्षा के बिना नहीं किया जा सकता। चंबल से लेकर राजस्थान के बजरी क्षेत्रों तक न्यायपालिका ने बार-बार वैज्ञानिक पुनर्भरण अध्ययन और पर्यावरणीय मंजूरी को महत्व दिया है। इसलिए उत्तर प्रदेश की कहानी भारत की बड़ी कहानी का हिस्सा है।

असली लड़ाई रेत बनाम विकास की नहीं है

खनन पर बहस अक्सर दो अतियों में चली जाती है। एक पक्ष कहता है—खनन बंद कर दो। दूसरा पक्ष कहता है—खनन विकास के लिए जरूरी है, इसलिए विरोध विकास विरोधी है। दोनों के बीच एक तीसरा रास्ता है।

वैज्ञानिक खनन। सीमित खनन। पारदर्शी खनन। डिजिटल निगरानी वाला खनन। स्थानीय समुदाय की भागीदारी वाला खनन। और सबसे महत्वपूर्ण—नदी की वहन क्षमता के भीतर खनन।

अगर नदी में प्राकृतिक रूप से जितनी रेत वापस आती है, उससे कहीं अधिक निकाल ली जाएगी तो एक समय ऐसा आएगा जब नदी अपने ही भूगोल से लड़ने लगेगी।

उसका असर केवल नदी पर नहीं होगा। किसान पर होगा। भूजल पर होगा। गांवों पर होगा। पुलों पर होगा। जैव विविधता पर होगा। और अंततः शहरों पर भी होगा।

सवाल रेत की कीमत का नहीं, उसकी असली कीमत का है

उत्तर प्रदेश में खनन से सरकार को राजस्व मिलता है। निर्माण उद्योग को कच्चा माल मिलता है। लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। इसलिए खनन को पूरी तरह खारिज करना न तो व्यावहारिक है और न आवश्यक। लेकिन दूसरी ओर यह भी स्वीकार करना होगा कि हर घन मीटर रेत केवल बाजार की वस्तु नहीं है।

उसमें नदी का पारिस्थितिक मूल्य जुड़ा है। किसान की जमीन का मूल्य जुड़ा है। ग्रामीण सड़क की सुरक्षा जुड़ी है। वाहन दुर्घटनाओं में प्रभावित परिवारों की पीड़ा जुड़ी है। पत्रकार की स्वतंत्रता जुड़ी है। अधिकारी की सुरक्षा जुड़ी है। और आने वाली पीढ़ियों का जल भविष्य जुड़ा है।

यही कारण है कि CAG की 408.68 करोड़ रुपये की लंबित वसूली वाली टिप्पणी को केवल राजस्व का आंकड़ा मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस प्रशासनिक श्रृंखला की कमजोरी का संकेत भी है जिसमें नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनका अनुपालन और वसूली हर जगह समान रूप से प्रभावी नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल : नदियों की रेत किसकी है?

कागज पर खनिज राज्य की संपदा है। व्यवहार में वह बाजार की निर्माण सामग्री है। पर्यावरण की दृष्टि से वह नदी तंत्र का हिस्सा है। किसान के लिए वह नदी और जमीन के बीच का प्राकृतिक संबंध है। ग्रामीण के लिए कभी रोजगार है तो कभी खतरा। पत्रकार के लिए वह सत्ता, कारोबार और स्थानीय प्रभाव की जांच का विषय है। और सरकार के लिए वह राजस्व तथा विकास दोनों का साधन है।

इसलिए रेत की कहानी किसी एक विभाग की कहानी नहीं है। यह शासन की कहानी है। यह पर्यावरण की कहानी है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कहानी है। यह कानून-व्यवस्था की कहानी है। और अंततः यह लोकतंत्र की कहानी है।

उत्तर प्रदेश ने तकनीक आधारित निगरानी की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अवैध परिवहन पर कार्रवाई हो रही है। वाहन पकड़े जा रहे हैं। जुर्माने वसूले जा रहे हैं। ड्रोन सर्वेक्षण और डिजिटल प्रणालियों का विस्तार किया जा रहा है। लेकिन CAG की रिपोर्ट बताती है कि व्यवस्था में अभी भी ऐसी दरारें हैं जिनसे राजस्व, पर्यावरण और प्रशासनिक जवाबदेही तीनों प्रभावित हो सकते हैं। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि खनन होगा या नहीं।

सवाल यह होना चाहिए कि खनन की सीमा कौन तय करेगा, उसका हिसाब कौन रखेगा और नियम तोड़ने पर कार्रवाई कितनी निश्चित होगी।

क्योंकि यदि कानून सिर्फ कागज पर हो और नदी के तल पर कोई दूसरा कानून चलता हो, तो समस्या रेत की नहीं रह जाती। वह शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाती है।

नदियों की कोख से निकली रेत से शहर खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन नदियों को खोखला करके टिकाऊ विकास नहीं बनाया जा सकता।

विकास चाहिए—लेकिन नदी की कीमत पर नहीं। खनिज चाहिए—लेकिन कानून से बाहर नहीं। राजस्व चाहिए—लेकिन किसान की सुरक्षा और पर्यावरण की कीमत पर नहीं।

और पत्रकारिता को यह सवाल पूछते रहना होगा कि रेत के हर कण का हिसाब केवल सरकारी रजिस्टर में दर्ज है या उस नदी के भविष्य में भी, जिससे वह निकाला गया है।

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