कानपुर, उत्तर प्रदेश। कानपुर दशहरा रावण का पुतला बनाने की एक ऐसी परंपरा का गवाह है, जो धर्म की सीमाओं से आगे बढ़कर पारिवारिक विरासत, हुनर और सामाजिक सद्भाव की कहानी कहती है। यहां विजयादशमी का उत्सव केवल रामलीला, आतिशबाजी और रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे उन कारीगरों की वर्षों पुरानी मेहनत भी जुड़ी है, जो हर साल विशाल पुतलों को आकार देने के लिए अपना पसीना बहाते हैं। राजस्थान के हिंडौन शहर से आने वाला मोहम्मद सलीम का मुस्लिम परिवार इसी परंपरा को एक सदी से अधिक समय से आगे बढ़ा रहा है। परिवार की कई पीढ़ियां कानपुर की परेड रामलीला के लिए रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले तैयार करती रही हैं।
इस कहानी की सबसे खास बात यह है कि जिन पुतलों का दहन विजयादशमी पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में किया जाता है, उन्हें तैयार करने वाले कारीगरों के लिए यह काम उनकी पुश्तैनी कला और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मोहम्मद सलीम और उनके परिवार के सदस्य हर साल राजस्थान से कानपुर आते हैं और त्योहार से कई सप्ताह पहले ही निर्माण कार्य में जुट जाते हैं। उनके लिए यह केवल एक ठेका पूरा करने का काम नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली जिम्मेदारी और वर्षों से कायम विश्वास को निभाने का अवसर भी है।
कानपुर दशहरा रावण का पुतला: पीढ़ियों से कायम है परिवार की पहचान
राजस्थान के हिंडौन शहर के रहने वाले 64 वर्षीय मोहम्मद सलीम इस पारंपरिक कारीगरी को लंबे समय से संभाल रहे हैं। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, उनके पूर्वज भी कानपुर आकर विजयादशमी के लिए विशाल पुतलों का निर्माण करते थे। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं और उत्सव मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया, लेकिन परिवार की यह कला अब तक जीवित है। आज सलीम अपने बेटों के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके 35 वर्षीय बेटे जहांगीर और 20 वर्षीय फरमान भी पुतले बनाने के काम में हाथ बंटाते हैं।
इस परिवार की कहानी उन कारीगरों की भी कहानी है, जिनकी पहचान उनके धर्म से पहले उनके हुनर से बनती है। रामलीला आयोजकों और कारीगरों के बीच वर्षों से बने संबंध इस परंपरा को मजबूती देते हैं। एक ओर आयोजक हर साल दर्शकों के लिए भव्य आयोजन की तैयारी करते हैं, तो दूसरी ओर सलीम का परिवार उन तैयारियों को दृश्य रूप देने में जुटा रहता है। यही निरंतरता कानपुर की दशहरा संस्कृति को एक विशिष्ट पहचान देती है।
90 फुट का रावण, 70-70 फुट के मेघनाद और कुंभकर्ण
इस वर्ष तैयार किए गए पुतलों का आकार भी आकर्षण का केंद्र है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मोहम्मद सलीम की टीम ने परेड रामलीला के लिए रावण का 90 फुट ऊंचा पुतला बनाया है। वहीं मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों की ऊंचाई 70-70 फुट रखी गई है। इन विशाल संरचनाओं को तैयार करना सामान्य कारीगरी नहीं है। इनके निर्माण में ऊंचाई का संतुलन, ढांचे की मजबूती, सामग्री का सही इस्तेमाल और सजावट की बारीकियों का ध्यान रखना पड़ता है।
इतने बड़े पुतलों का निर्माण करते समय कारीगरों को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि संरचना खड़ी रहने के दौरान स्थिर बनी रहे और आयोजन स्थल पर सुरक्षा संबंधी सावधानियों का पालन हो। बांस और तार से तैयार ढांचे पर कागज तथा अन्य सामग्री को व्यवस्थित तरीके से लगाया जाता है। इसके बाद पुतलों को आकर्षक रूप देने के लिए सजावट और अंतिम रूप देने का काम किया जाता है। यह प्रक्रिया अनुभव, धैर्य और सामूहिक श्रम की मांग करती है।
कानपुर दशहरा रावण का पुतला तैयार करने वाले इन कारीगरों का हुनर इसी बात से समझा जा सकता है कि कुछ ही सप्ताह में उन्हें ऐसी विशाल आकृतियां तैयार करनी होती हैं, जो उत्सव के दिन हजारों दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनती हैं। पुतलों की ऊंचाई जितनी अधिक होती है, निर्माण के दौरान योजना और समन्वय की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ जाती है।
120 फुट लंबी लंका भी तैयार, भव्य आयोजन की पूरी तैयारी
इस बार मोहम्मद सलीम की टीम ने केवल तीन पुतले ही नहीं बनाए, बल्कि रामलीला के दृश्य को भव्यता देने के लिए लंका की संरचना भी तैयार की है। जानकारी के मुताबिक, लंका 30 फुट ऊंची और 120 फुट लंबी बनाई गई है। इतनी बड़ी संरचना तैयार करने में कारीगरों को काफी समय और मेहनत लगती है। इसे पुतलों के साथ आयोजन की समग्र रूपरेखा में शामिल किया जाता है, जिससे दर्शकों को रामायण से जुड़े प्रसंगों की नाटकीय प्रस्तुति का प्रभावशाली दृश्य मिल सके।
रामलीला केवल धार्मिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि लोककला, हस्तकौशल, रंगमंच और सामुदायिक भागीदारी का भी उत्सव है। पुतलों और लंका जैसी संरचनाओं का निर्माण इस आयोजन के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसे अक्सर दर्शक अंतिम कार्यक्रम देखते समय भूल जाते हैं। मंच पर दिखाई देने वाली भव्यता के पीछे कई सप्ताह की तैयारी और अनेक लोगों का श्रम छिपा होता है।
चार लाख रुपये का ठेका, लेकिन लागत और मेहनत बड़ी चुनौती
मोहम्मद सलीम की टीम को इस काम के लिए लगभग चार लाख रुपये का ठेका मिलने की जानकारी दी गई है। पहली नजर में यह रकम बड़ी दिखाई दे सकती है, लेकिन इस राशि में कारीगरों की मजदूरी, उनके रहने-खाने की व्यवस्था और राजस्थान से कानपुर आने-जाने का खर्च भी शामिल है। सलीम के मुताबिक, लगभग 20 कारीगरों की टीम इस काम में जुटी रहती है और निर्माण की अवधि करीब दो महीने तक पहुंचती है।
इसके अतिरिक्त बांस, कागज, तार, कील और अन्य निर्माण सामग्री पर भी खर्च होता है। ऐसे में ठेके की पूरी रकम को शुद्ध कमाई मानना सही नहीं होगा। इसमें से मजदूरी, यात्रा, भोजन, ठहरने और कच्चे माल की लागत निकालने के बाद ही वास्तविक बचत का पता चल सकता है। उपलब्ध जानकारी में इन सभी मदों का अलग-अलग हिसाब नहीं दिया गया है, इसलिए परिवार के वास्तविक मुनाफे का कोई निश्चित आंकड़ा प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यह पहलू उस व्यापक सवाल की ओर भी ध्यान खींचता है कि बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में योगदान देने वाले पारंपरिक कारीगरों को उनकी मेहनत के अनुरूप आर्थिक लाभ मिल पाता है या नहीं। पुतलों की ऊंचाई, आकार और सजावट पर दर्शकों का ध्यान जाता है, लेकिन उन्हें तैयार करने वाले श्रमिकों के लंबे कार्यदिवस, यात्रा और खर्च की चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। यदि ऐसी कलाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है, तो कारीगरों की मेहनत और उनके आर्थिक हितों को भी महत्व देना होगा।
20 कारीगरों की टीम, सामूहिक मेहनत से बनती है विशाल आकृति
मोहम्मद सलीम के साथ काम करने वाले करीब 20 कारीगर इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इतने बड़े पुतलों को बनाने के लिए एक व्यक्ति का कौशल पर्याप्त नहीं होता। किसी को ढांचा तैयार करना होता है, किसी को सामग्री काटकर और जोड़कर आकृति बनानी होती है, जबकि दूसरे कारीगर सजावट और अंतिम रूप देने का काम संभालते हैं। सभी के बीच तालमेल न हो तो समय पर निर्माण पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
राजस्थान से उत्तर प्रदेश आकर काम करना भी इस पेशे की एक खास चुनौती है। परिवार और कारीगरों को अपने घरों से दूर रहना पड़ता है। त्योहार की निश्चित तारीख के कारण निर्माण कार्य समयबद्ध तरीके से पूरा करना जरूरी होता है। मौसम, सामग्री की उपलब्धता और परिवहन जैसी परिस्थितियां भी काम की गति को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद हर साल इस टीम का कानपुर पहुंचना बताता है कि आयोजकों के साथ बना भरोसा इस परंपरा को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाता है।
परेड रामलीला समिति के लिए क्यों खास है यह परिवार?
परेड रामलीला समिति से जुड़े सदस्यों के अनुसार, कानपुर का दशहरा सलीम के परिवार की भागीदारी के बिना अधूरा महसूस होता है। यह कथन उस निरंतर संबंध को दर्शाता है, जो वर्षों से आयोजकों और कारीगरों के बीच विकसित हुआ है। जब किसी परिवार का काम लगातार कई पीढ़ियों तक किसी आयोजन का हिस्सा बना रहता है, तो वह केवल सेवा देने वाला समूह नहीं रह जाता, बल्कि उस आयोजन की परंपरा और पहचान से भी जुड़ जाता है।
सलीम की टीम कानपुर में दशहरा पर्व के अन्य आयोजनों के लिए भी पुतले तैयार करती है। परिवार के फर्रुखाबाद सहित आसपास के क्षेत्रों की रामलीला समितियों से अच्छे संबंध रहने की बात भी सामने आई है। इससे पता चलता है कि पारंपरिक पुतला निर्माण का काम किसी एक आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि विभिन्न शहरों और समितियों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ा हुआ है। हालांकि, हर आयोजन के ठेके और निर्माण की अलग-अलग शर्तें हो सकती हैं।
कानपुर जैसे बड़े शहर में दशहरा उत्सव की तैयारियों में आयोजक, कलाकार, तकनीकी सहयोगी, कारीगर और स्थानीय श्रमिक अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। सलीम का परिवार इसी साझा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके बिना उत्सव रुक जाएगा, ऐसा कहना आयोजन की अन्य भूमिकाओं को कम करके आंकना होगा, लेकिन इस परिवार की लंबे समय से चली आ रही भागीदारी और उसके प्रति आयोजकों का भरोसा निश्चित रूप से इसकी विशिष्टता को उजागर करता है।
धर्म से आगे हुनर और परंपरा: सामाजिक सौहार्द का संदेश
मोहम्मद सलीम का परिवार जिस काम को पीढ़ियों से करता आ रहा है, वह भारतीय समाज की साझा सांस्कृतिक परंपराओं की ओर ध्यान दिलाता है। धार्मिक आयोजन किसी विशेष समुदाय की आस्था से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सफल बनाने में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों का योगदान भी रहता है। पुतले बनाने वाले कारीगर की धार्मिक पहचान से अलग उसका हुनर, मेहनत और पेशेवर जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है।
इस कहानी को केवल हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका एक व्यावहारिक पक्ष भी है। परंपराएं तभी टिकती हैं, जब समाज उन्हें अपनाता है, आयोजक कारीगरों पर भरोसा करते हैं और नई पीढ़ी उस कला को सीखने के अवसर पाती है। सलीम के बेटे जहांगीर और फरमान का इस काम में शामिल होना पारिवारिक कौशल के हस्तांतरण का उदाहरण है। यदि ऐसे हुनर को सम्मान और उचित पारिश्रमिक मिलता रहे, तो इसके भविष्य की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों में मुस्लिम कारीगरों द्वारा रावण के पुतले बनाए जाने की अन्य रिपोर्टें भी सामने आती रही हैं। उत्तर प्रदेश के हापुड़ में मसूम अली के परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और मथुरा के जफर अली की कारीगरी पर भी समाचार प्रकाशित हुए हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि पारंपरिक कला और आजीविका कई बार धार्मिक पहचान से परे अलग-अलग समुदायों को जोड़ती हैं। हापुड़ के कारीगर परिवार पर प्रकाशित रिपोर्ट भी इस व्यापक परंपरा की एक मिसाल है।
रावण दहन से आगे भी है दशहरे का अर्थ
विजयादशमी को आम तौर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। रामलीला में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का निर्माण और दहन इसी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। लेकिन इस उत्सव से मिलने वाले संदेश को सामाजिक जीवन में उतारना भी जरूरी है। सत्य, न्याय, सहिष्णुता, जिम्मेदारी और दूसरे व्यक्ति के श्रम के प्रति सम्मान जैसे मूल्य तभी सार्थक होंगे, जब वे रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई दें।
कानपुर दशहरा रावण का पुतला बनाने वाले मोहम्मद सलीम और उनके परिवार की कहानी इसी दिशा में सोचने का अवसर देती है। यहां एक ओर धार्मिक आस्था के साथ मनाया जाने वाला त्योहार है, तो दूसरी ओर उस त्योहार को भव्य बनाने में जुटा एक परिवार है, जो राजस्थान से आकर अपनी कला का प्रदर्शन करता है। यह संबंध किसी औपचारिक नारे से नहीं, बल्कि वर्षों के काम, भरोसे और पारस्परिक सहयोग से बना है।
इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि ऐसे कारीगरों को समय पर भुगतान मिले, काम के दौरान सुरक्षा का ध्यान रखा जाए और पारंपरिक कला सीखने वाले युवाओं को प्रोत्साहन दिया जाए। साथ ही आयोजकों और दर्शकों को भी यह समझना चाहिए कि पुतला दहन के कुछ क्षणों के पीछे कई सप्ताह की मेहनत होती है। उत्सव की चमक तभी पूरी होगी, जब उसके पीछे काम करने वाले हाथों को भी उचित सम्मान मिलेगा।
कानपुर दशहरा रावण का पुतला और सौहार्द की विरासत
मोहम्मद सलीम का परिवार कानपुर की परेड रामलीला के लिए हर साल पुतले बनाकर केवल एक पुराना पेशा नहीं निभा रहा, बल्कि अपनी पीढ़ियों से मिली कला को भी जीवित रख रहा है। 90 फुट का रावण, 70-70 फुट के मेघनाद और कुंभकर्ण तथा 120 फुट लंबी लंका इस मेहनत का दृश्य रूप हैं। इनके पीछे परिवार की विरासत, कारीगरों का सामूहिक श्रम और आयोजकों के साथ वर्षों से बना संबंध मौजूद है।
कानपुर का दशहरा इस परिवार के बिना अधूरा होने की बात भावनात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक वास्तविक सांस्कृतिक जुड़ाव है। यह कहानी याद दिलाती है कि किसी भी शहर की पहचान केवल उसके स्मारकों या बड़े आयोजनों से नहीं बनती, बल्कि उन लोगों से भी बनती है जो अपनी कला और मेहनत से उसकी परंपराओं को लगातार जीवित रखते हैं। त्योहार का संदेश तभी व्यापक होगा, जब समाज आस्था के साथ-साथ मेहनत, सम्मान और आपसी सहयोग को भी उतनी ही अहमियत देगा।
आपकी राय: क्या मोहम्मद सलीम जैसे कारीगर परिवारों की पीढ़ियों पुरानी परंपराएं सामाजिक सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करती हैं? क्या पारंपरिक कलाकारों को उचित पारिश्रमिक और सम्मान देने के लिए आयोजकों तथा समाज को और प्रयास करने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।












