अनिल अनूप, संपादक, जनगणदूत
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उस भरोसे से चलता है कि यदि कोई नागरिक अन्याय, भ्रष्टाचार, अवैध कब्जों या संगठित अपराध के विरुद्ध आवाज उठाएगा तो कानून उसके साथ खड़ा मिलेगा। लेकिन जब एक समाजसेवी पत्रकार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता रह जाए, उसकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ती जाए और उसके समर्थकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचकर भी अनसुनी रह गई, तब यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता। यह कानून के राज, प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन की विश्वसनीयता पर गंभीर बहस का विषय बन जाता है।
चित्रकूट के पाठा क्षेत्र से जुड़े समाजसेवी पत्रकार संजय सिंह राणा का मामला भी इसी कारण व्यापक महत्व रखता है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि समाजहित के मुद्दों और कथित माफिया गतिविधियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाने के कारण उन पर कातिलाना हमला हुआ। इस मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी शेष हैं, इसलिए दोष तय करना न्यायालय का अधिकार है। किंतु एक प्रश्न चार वर्षों बाद भी जस का तस खड़ा है—यदि कोई व्यक्ति स्वयं को न्याय से वंचित महसूस कर रहा है, तो क्या व्यवस्था उसकी पीड़ा को पर्याप्त गंभीरता से सुन रही है?
पाठा की पहाड़ियों से उठी एक आवाज
संजय सिंह राणा का नाम केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहा। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा चित्रकूट के दुर्गम पाठा क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के बीच बिताया। जहां सड़कें कम थीं, सरकारी सुविधाएं सीमित थीं और विकास की गति धीमी थी, वहां उन्होंने शिक्षा, जागरूकता, अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
ऐसे अनेक परिवार हैं जो आज भी उन्हें उस व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जिसने उन्हें सरकारी दफ्तरों तक पहुंचना, अपने अधिकारों की जानकारी लेना और व्यवस्था से संवाद करना सिखाया। समाजसेवा उनके लिए कोई मंचीय कार्यक्रम नहीं थी; वह उनके जीवन का व्यवहारिक हिस्सा थी।
जब पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, जनसेवा बन जाए
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल घटनाएं बताना नहीं होता। उसका मूल धर्म सत्ता, प्रशासन और समाज से सवाल पूछना भी है। यदि किसी पत्रकार की कलम भूमाफियाओं, जंगलों के अवैध दोहन, प्राकृतिक संसाधनों की लूट अथवा जनहित से जुड़े मुद्दों पर लगातार चलती है, तो स्वाभाविक रूप से अनेक शक्तिशाली हित प्रभावित होते हैं।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि राणा ने कभी समझौते का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया, उनके कारण उन्हें लगातार दबावों और धमकियों का सामना करना पड़ा। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है क्योंकि एक स्वतंत्र पत्रकार का भयमुक्त रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।
चार साल बाद भी क्यों कायम है बेचैनी?
किसी भी आपराधिक मामले में जांच समय ले सकती है। न्यायिक प्रक्रिया भी साक्ष्यों और विधिक मानकों पर आधारित होती है। लेकिन यदि वर्षों बाद भी पीड़ित स्वयं को उपेक्षित महसूस करे, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर प्रश्न खड़े करता है।
बताया जाता है कि संजय सिंह राणा ने जिला प्रशासन से लेकर प्रदेश स्तर तक अपनी गुहार पहुंचाई। यदि ऐसा है, तो यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, जांच किस स्तर तक पहुंची और यदि विलंब हुआ तो उसके कारण क्या रहे। पारदर्शिता ही जनता के विश्वास की सबसे बड़ी आधारशिला होती है।
आज सबसे बड़ा संघर्ष स्वास्थ्य से
कभी दुर्गम पहाड़ियों पर घंटों पैदल चलने वाला व्यक्ति यदि आज अपने कमरे से बाथरूम तक जाने के लिए दीवार का सहारा लेने को विवश हो, तो यह दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोरने के लिए पर्याप्त है।
स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत विषय नहीं रह जाता जब उसकी वजह एक कथित हिंसक घटना से जुड़ी हो। यदि कोई नागरिक वर्षों तक उपचार, न्याय और सम्मान—तीनों के लिए संघर्ष करता रहे, तो उसकी पीड़ा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है।

क्या कानून का भय कम हुआ है?
कानून का सम्मान तभी तक बना रहता है जब तक अपराध करने वाले को यह विश्वास हो कि देर-सबेर उसे न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ेगा। लेकिन यदि समाज में यह धारणा बनने लगे कि प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेतों में से एक है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि कानून पूरी तरह असफल हो गया है, क्योंकि ऐसे निष्कर्ष तथ्यों और न्यायिक निर्णयों के बाद ही निकाले जा सकते हैं। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि न्याय में अत्यधिक विलंब स्वयं न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
सुशासन का वास्तविक अर्थ
सरकारें अक्सर विकास, निवेश, सड़क, बिजली और योजनाओं की उपलब्धियां गिनाती हैं। ये सब आवश्यक हैं। किंतु सुशासन की सबसे बड़ी पहचान यह है कि सबसे कमजोर व्यक्ति को भी न्याय मिलने का भरोसा हो।
यदि कोई समाजसेवी पत्रकार वर्षों तक यह महसूस करे कि उसकी आवाज अनसुनी है, तो यह केवल उसके लिए नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के लिए भी आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा नहीं है। सुशासन का अर्थ है—
- समयबद्ध और निष्पक्ष जांच,
- पीड़ित की सुरक्षा,
- पारदर्शी कार्रवाई,
- और कानून के समक्ष सभी की समान जवाबदेही।
समाज भी अपनी जिम्मेदारी समझे
अक्सर हम किसी घटना पर कुछ दिनों तक चर्चा करते हैं और फिर उसे भूल जाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति न्याय की लड़ाई लड़ रहा होता है, उसके लिए हर दिन एक नया संघर्ष होता है।
यदि समाज ऐसे लोगों को अकेला छोड़ देगा, तो भविष्य में बहुत कम लोग जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाने का साहस करेंगे। लोकतंत्र केवल अदालतों और सरकारों से नहीं बचता; वह जागरूक समाज से भी बचता है।
क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल सहानुभूति तक सीमित है?
संजय सिंह राणा के मामले का सबसे पीड़ादायक पक्ष केवल न्याय में कथित देरी नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठते सवाल भी हैं। क्षेत्र के अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता इस पूरे प्रकरण से परिचित बताए जाते हैं। पीड़ित पक्ष का कहना है कि उन्होंने समय-समय पर अपनी व्यथा सबसे साझा की, ज्ञापन दिए और न्याय की गुहार लगाई।
इन्हीं नेताओं में दलित समाज के प्रमुख नेता और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ भी शामिल हैं। बताया जाता है कि उन्होंने राणा की स्थिति पर सहानुभूति व्यक्त की। अन्य कई जनप्रतिनिधियों ने भी संवेदना जताई, लेकिन पीड़ित पक्ष की अपेक्षा के अनुरूप न्याय दिलाने की दिशा में ठोस परिणाम दिखाई नहीं दिए।
यहीं से एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न जन्म लेता है। क्या जनप्रतिनिधियों का दायित्व केवल पीड़ित के कंधे पर हाथ रखकर संवेदना व्यक्त करना भर है, या फिर अन्याय के विरुद्ध प्रभावी हस्तक्षेप करना भी उनकी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है?
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को केवल भाषण देने, सोशल मीडिया पर संवेदना व्यक्त करने या औपचारिक मुलाकातें करने के लिए नहीं चुनती। उनसे अपेक्षा होती है कि वे सत्ता और प्रशासन के समक्ष मजबूती से जनता की आवाज बनें। यदि कोई समाजसेवी पत्रकार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा कर रहा हो और उसके बावजूद जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल आश्वासन तक सीमित दिखाई दे, तो जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या जनप्रतिनिधियों का काम सिर्फ भाषण देकर चुप हो जाना है, या फिर न्याय सुनिश्चित कराने के लिए निरंतर संघर्ष करना भी उनकी जिम्मेदारी है?

यह प्रश्न किसी एक दल, एक नेता या एक सरकार तक सीमित नहीं है। यह पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय है। जनप्रतिनिधियों की वास्तविक पहचान चुनावी मंचों पर दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में आम नागरिक के साथ खड़े होने से होती है। यदि समाजसेवा और सच की लड़ाई लड़ने वाला व्यक्ति वर्षों तक न्याय के लिए भटकता रहे, तो यह केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
पत्रकार की सुरक्षा, लोकतंत्र की सुरक्षा
विश्वभर में यह माना जाता है कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यदि पत्रकार भयमुक्त होकर काम नहीं कर पाएंगे, तो भ्रष्टाचार, अपराध और सत्ता के दुरुपयोग पर प्रभावी निगरानी भी कमजोर पड़ जाएगी।
इसीलिए किसी भी पत्रकार पर कथित हमले का मामला केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं माना जाना चाहिए। उसकी निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख से जुड़ी होती है।
प्रशासन के सामने अवसर भी है
हर विवाद सरकार की विफलता का प्रमाण नहीं होता। कई बार वही विवाद सरकार के लिए अपनी निष्पक्षता साबित करने का अवसर भी बन जाते हैं।
यदि इस मामले में जांच लंबित है, तो उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि पीड़ित को चिकित्सीय या कानूनी सहायता की आवश्यकता है, तो संवेदनशीलता के साथ उपलब्ध कराई जानी चाहिए। ऐसे कदम केवल एक व्यक्ति को राहत नहीं देंगे, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत करेंगे।
न्याय केवल होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए
लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि “Justice must not only be done, but must also be seen to be done.” अर्थात न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता को होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
यदि चार वर्षों बाद भी लोगों के मन में प्रश्न शेष हैं, तो उन प्रश्नों का उत्तर पारदर्शी प्रक्रिया से ही दिया जा सकता है। यही लोकतंत्र की मजबूती है।
संजय सिंह राणा प्रकरण केवल एक व्यक्ति की पीड़ा का दस्तावेज नहीं है। यह उस संघर्ष का प्रतीक है जिसमें समाजसेवा, पत्रकारिता, जनहित और न्याय की अपेक्षा एक साथ दिखाई देती है।
अंतिम सत्य का निर्णय न्यायालय करेगा और वही सर्वोपरि होगा। किंतु तब तक यह अपेक्षा पूरी तरह न्यायसंगत है कि प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, प्रत्येक तथ्य का परीक्षण हो और यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो उसके विरुद्ध बिना किसी दबाव या भेदभाव के कार्रवाई हो।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा विश्वास यही है कि सच बोलने वाले को सुरक्षा मिले, न्याय की मांग करने वाले को सुनवाई मिले और कानून किसी व्यक्ति, पद, प्रभाव या संपत्ति के सामने नहीं, केवल संविधान के सामने जवाबदेह रहे।
सवाल आज भी वही है—क्या माफियाओं के सामने बेबस हो गया है कानून, या कानून अभी भी यह साबित करेगा कि लोकतंत्र में अंतिम जीत न्याय की ही होती है?













