चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
भारत में गेहूं का आटा हर घर की रसोई का सबसे महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है। ऐसे में यदि आटे की शुद्धता पर सवाल उठते हैं, तो यह केवल उपभोक्ताओं की जेब ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ समाचार रिपोर्टों में दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश की कुछ आटा मिलों में अधिक मुनाफे के लिए गेहूं के साथ सफेद सोपस्टोन (टैल्क या पत्थर का चूरा) मिलाकर आटा तैयार किया जा रहा है। इस दावे ने लोगों में चिंता बढ़ा दी है।
हालांकि, किसी भी एक रिपोर्ट के आधार पर पूरे उद्योग को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। यह आवश्यक है कि इस विषय को तथ्यों, वैज्ञानिक जानकारी और सरकारी नियमों के आधार पर समझा जाए।
क्या है पूरा मामला?
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि एक खोजी अभियान के दौरान कुछ आटा मिलों में गेहूं के साथ सफेद पत्थर का महीन चूरा मिलाया जा रहा था। रिपोर्ट के अनुसार यह पाउडर दिखने में आटे जैसा होता है, जिससे सामान्य उपभोक्ता इसकी पहचान नहीं कर पाता।
यदि कहीं ऐसा किया जाता है तो यह खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम (FSSAI) के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। हालांकि अब तक यह सिद्ध नहीं हुआ है कि देश में बिकने वाले सभी ब्रांड या अधिकांश आटा निर्माता ऐसा कर रहे हैं। इसलिए किसी विशेष ब्रांड या पूरे उद्योग पर बिना आधिकारिक जांच के आरोप लगाना उचित नहीं है।
सोपस्टोन क्या होता है?
सोपस्टोन (Soapstone) मुख्यतः टैल्क (Talc) नामक खनिज से बना प्राकृतिक पत्थर है। इसका उपयोग कई औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है, जैसे—
- कागज उद्योग
- पेंट निर्माण
- कॉस्मेटिक उत्पाद
- सिरेमिक उद्योग
- रबर उद्योग
खाद्य पदार्थों में सामान्य रूप से इसका उपयोग नहीं किया जाता। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर इसे आटे में मिलाता है, तो यह खाद्य मिलावट की श्रेणी में आएगा।
क्या इससे स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी खाद्य पदार्थ में लंबे समय तक पत्थर का चूरा या अन्य गैर-खाद्य पदार्थ मिलाकर सेवन कराया जाए तो कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
संभावित जोखिमों में शामिल हैं—
- पाचन तंत्र में गड़बड़ी
- पेट दर्द और कब्ज
- आंतों में जलन
- लंबे समय तक सेवन होने पर गुर्दों पर अतिरिक्त दबाव
- पहले से किडनी या पाचन रोग से पीड़ित लोगों में जटिलताएं
हालांकि यह कहना कि केवल ऐसा आटा खाने से निश्चित रूप से किडनी स्टोन, लिवर फेलियर या गंभीर बीमारी हो जाएगी, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है। बीमारी की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि मिलावट किस पदार्थ की है, उसकी मात्रा कितनी है और सेवन कितने समय तक हुआ है।
भारत में खाद्य मिलावट की स्थिति
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) समय-समय पर विभिन्न खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच करता है। जांच के दौरान कई बार मिलावट, गलत लेबलिंग और गुणवत्ता संबंधी अनियमितताएं सामने आती हैं।
मिलावट केवल आटे तक सीमित नहीं है। समय-समय पर दूध, मसाले, घी, तेल, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों में भी गुणवत्ता संबंधी शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए उपभोक्ताओं को हमेशा जागरूक रहना चाहिए।
क्या घर पर आटे की जांच संभव है?
सोशल मीडिया पर अक्सर दावा किया जाता है कि एक गिलास पानी में आटा डालने पर यदि सफेद पाउडर नीचे बैठ जाए तो वह मिलावटी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी तरह विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण नहीं है। गेहूं के आटे के प्राकृतिक भारी कण भी पानी में बैठ सकते हैं। इसलिए केवल इस परीक्षण के आधार पर मिलावट का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
यदि किसी खाद्य पदार्थ पर संदेह हो तो उसकी जांच केवल अधिकृत खाद्य प्रयोगशाला में ही प्रमाणिक रूप से हो सकती है।
उपभोक्ता क्या सावधानी बरतें?
खाद्य विशेषज्ञ निम्नलिखित सुझाव देते हैं—
- हमेशा प्रतिष्ठित और लाइसेंस प्राप्त ब्रांड का आटा खरीदें।
- पैकेट पर FSSAI लाइसेंस नंबर अवश्य देखें।
- निर्माण तिथि और एक्सपायरी डेट जांचें।
- पैकेट फटा या खुला हुआ न हो।
- आटे का रंग, गंध और बनावट सामान्य होनी चाहिए।
- यदि आटे में असामान्य गंध, अत्यधिक सफेदी या कंकड़ जैसे कण दिखाई दें तो उसका उपयोग न करें।
- बिल या खरीद रसीद सुरक्षित रखें।
चक्की का आटा या पैकेट वाला आटा—कौन बेहतर?
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। यदि आपके पास विश्वसनीय स्थानीय चक्की उपलब्ध है और आप स्वयं साफ गेहूं खरीदकर पिसवाते हैं, तो यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है क्योंकि पूरी प्रक्रिया आपकी निगरानी में होती है।
दूसरी ओर, बड़े ब्रांड भी आधुनिक गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली अपनाते हैं। इसलिए केवल पैकेट वाला आटा खराब और खुला आटा अच्छा है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। गुणवत्ता का निर्धारण निर्माता की विश्वसनीयता और नियामक मानकों के पालन पर निर्भर करता है।
मिलावट मिलने पर क्या करें?
यदि किसी उपभोक्ता को किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट का संदेह हो तो वह—
- संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारी को शिकायत कर सकता है।
- FSSAI के उपभोक्ता शिकायत तंत्र का उपयोग कर सकता है।
- उत्पाद का पैकेट और खरीद का बिल सुरक्षित रख सकता है।
- आवश्यक होने पर नमूने की अधिकृत प्रयोगशाला से जांच करवा सकता है।
विशेषज्ञों की राय
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य मिलावट एक गंभीर अपराध है और दोषी पाए जाने पर कानून के तहत जुर्माना तथा कारावास दोनों का प्रावधान है।
साथ ही विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सोशल मीडिया पर वायरल हर दावे को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच रिपोर्ट और वैज्ञानिक प्रमाणों का इंतजार करना आवश्यक है।
आटे में मिलावट का मुद्दा निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन इससे जुड़ी हर जानकारी को तथ्यों के आधार पर परखना भी उतना ही जरूरी है। यदि कहीं गेहूं में सोपस्टोन या किसी अन्य गैर-खाद्य पदार्थ की मिलावट की जाती है तो यह कानूनन अपराध है और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
दूसरी ओर, बिना ठोस प्रमाण के सभी आटा निर्माताओं या सभी ब्रांडों को दोषी ठहराना भी उचित नहीं है। जागरूक उपभोक्ता, नियमित सरकारी निगरानी और कठोर कानूनी कार्रवाई ही खाद्य मिलावट पर प्रभावी नियंत्रण का सबसे अच्छा उपाय है।













