पूर्वांचल का स्वाद : मालपूआ, लिट्टी-चोखा, दही और गुड़ की जलेबी आखिर क्यों हैं इतने मशहूर?
इरफान अली लारी की रिपोर्ट
पूर्वांचल की मिट्टी केवल राजनीति, लोकगीत और धार्मिक परंपराओं के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहां के स्वाद भी लोगों की यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। उत्तर प्रदेश का देवरिया जिला भी उन्हीं इलाकों में शामिल है, जहां भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि संस्कृति, अपनापन और विरासत का हिस्सा माना जाता है। यहां का मालपूआ, देसी दही, लिट्टी-चोखा और गुड़ की जलेबी वर्षों से लोगों की जुबान पर राज कर रहे हैं।
देवरिया की गलियों में सुबह की शुरुआत जहां मिट्टी के कुल्हड़ में जमे दही से होती है, वहीं शाम ढलते ही गुड़ की गर्मागर्म जलेबी की खुशबू लोगों को दुकानों तक खींच लाती है। गांवों में आज भी चूल्हे पर सिकती लिट्टी और बैंगन-आलू के धुएं वाले चोखे की महक पुराने समय की याद दिलाती है। वहीं त्योहारों और खास मौकों पर मालपूआ ऐसा पकवान है, जिसके बिना मेहमाननवाजी अधूरी मानी जाती है।
देवरिया के मालपूआ की मिठास में छिपी है ग्रामीण संस्कृतिदेवरिया का मालपूआ केवल मिठाई नहीं बल्कि परंपरा का स्वाद है। पुराने समय में गांवों में जब भी कोई मांगलिक कार्यक्रम होता था, तब घर की महिलाएं बड़े देगची में मालपूआ तैयार करती थीं। मैदा, दूध, सौंफ और देसी घी से बनने वाला यह व्यंजन खास तौर पर होली, विवाह और धार्मिक आयोजनों में बनाया जाता था।
देवरिया के पुराने हलवाई बताते हैं कि पहले मालपूआ को चीनी की चाशनी में नहीं बल्कि गुड़ के शीरे में डुबोया जाता था। इसी कारण इसका स्वाद बाकी जिलों से अलग माना जाता था। धीरे-धीरे यह पकवान गांवों से निकलकर शहर की दुकानों तक पहुंच गया।
आज भी देवरिया शहर के कई पुराने मिठाई प्रतिष्ठानों पर सुबह और शाम ताजा मालपूआ तैयार किया जाता है। खास बात यह है कि यहां का मालपूआ मोटा, मुलायम और हल्की कुरकुरी परत वाला होता है। ऊपर से डाली गई रबड़ी और मेवे इसका स्वाद और बढ़ा देते हैं।

लिट्टी-चोखा : बिहार से आया स्वाद, देवरिया ने दिया अपना रंग
देवरिया की भौगोलिक स्थिति बिहार के बेहद करीब है। यही वजह है कि यहां के खानपान में बिहार की झलक साफ दिखाई देती है। लिट्टी-चोखा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
पहले यह व्यंजन मजदूरों और किसानों का भोजन माना जाता था, क्योंकि इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था। आटे की गोल लिट्टी में सत्तू, अजवाइन, धनिया, लहसुन और सरसों के तेल का मसालेदार मिश्रण भरा जाता था। फिर इसे उपले या लकड़ी की आग में धीरे-धीरे सेंका जाता था।
देवरिया में लिट्टी-चोखा को स्थानीय स्वाद के अनुसार थोड़ा अलग अंदाज मिला। यहां चोखे में बैंगन के साथ आलू और टमाटर का प्रयोग अधिक किया जाने लगा। ऊपर से देसी घी डालकर परोसी जाने वाली लिट्टी लोगों की पसंद बन गई।
आज स्थिति यह है कि देवरिया शहर के कई चौराहों और बाजारों में शाम होते ही लिट्टी-चोखा की दुकानें सज जाती हैं। कॉलेज के छात्र, नौकरीपेशा लोग और बाहर से आने वाले यात्री बड़ी संख्या में इसका स्वाद लेने पहुंचते हैं।
देवरिया का दही आखिर इतना खास क्यों?
पूर्वांचल में दही केवल भोजन नहीं बल्कि स्वास्थ्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है। देवरिया का दही विशेष रूप से अपने गाढ़ेपन और प्राकृतिक स्वाद के कारण प्रसिद्ध है।
यहां के ग्रामीण इलाकों में आज भी भैंस और देशी गाय का दूध बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। मिट्टी के बर्तन में जमाया गया दही धीरे-धीरे ऐसा स्वाद विकसित करता है, जो बाजार में मिलने वाले सामान्य दही से बिल्कुल अलग होता है।
देवरिया में पुराने समय से यह परंपरा रही है कि घर आए मेहमान को पहले दही-चीनी खिलाई जाती थी। विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों में भी दही का विशेष महत्व होता है।
शहर के कई पुराने डेयरी प्रतिष्ठान आज भी पारंपरिक तरीके से दही जमाते हैं। सुबह-सुबह कुल्हड़ में भरा गाढ़ा दही और ऊपर जमी मलाई लोगों को खास आकर्षित करती है।
गुड़ की जलेबी : सर्दियों का सबसे बड़ा आकर्षण
देवरिया की गुड़ वाली जलेबी का स्वाद बाकी जगहों की सामान्य जलेबी से अलग माना जाता है। यहां चीनी की जगह गुड़ का प्रयोग होने के कारण इसमें मिट्टी और देसीपन की खुशबू महसूस होती है।
पुराने समय में गांवों में गन्ने की खेती अधिक होती थी। उसी से तैयार गुड़ स्थानीय बाजारों तक पहुंचता था। हलवाई इसी गुड़ से चाशनी तैयार करते और फिर उसमें ताजी जलेबी डुबोई जाती।
गुड़ की जलेबी खास तौर पर सर्दियों में अधिक बनाई जाती है। ठंड के मौसम में गर्म दूध के साथ इसे खाने की परंपरा आज भी कायम है। देवरिया के कई परिवारों में सुबह नाश्ते में गुड़ की जलेबी और दही का संयोजन बेहद पसंद किया जाता है।
देवरिया शहर में आज कहां मिलते हैं ये मशहूर स्वाद?
समय बदलने के साथ देवरिया का बाजार भी आधुनिक हुआ है, लेकिन स्वाद की परंपरा अभी भी जीवित है। शहर के कई प्रमुख इलाकों में ये व्यंजन आज भी बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं।
मालपूआ के लिए प्रसिद्ध इलाके
सिविल लाइंस क्षेत्र की पुरानी मिठाई दुकानें, रेलवे स्टेशन रोड के पारंपरिक हलवाई, हनुमान मंदिर और बाजार क्षेत्र के आसपास की मिठाई दुकानें यहां सुबह और शाम ताजा मालपूआ तैयार किया जाता है।
लिट्टी-चोखा के प्रमुख ठिकाने
देवरिया बस स्टेशन के आसपास, न्यू कॉलोनी और मालवीय रोड क्षेत्र, कॉलेज रोड और बाजार चौराहे के फूड स्टॉल इन इलाकों में लकड़ी की आग पर सिकी लिट्टी आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
दही के लिए प्रसिद्ध स्थान
पुरानी डेयरियां और दूध मंडी क्षेत्र, शहर की पारंपरिक मिठाई दुकानें, ग्रामीण बाजारों में लगने वाली सुबह की डेयरी दुकानें कुल्हड़ में परोसा जाने वाला दही यहां की पहचान बन चुका है।
गुड़ की जलेबी कहां मिलती है?
सर्दियों में स्टेशन रोड और मुख्य बाजार, पुराने हलवाई बाजार, सुबह लगने वाली मिठाई की अस्थायी दुकानें , गर्मागर्म गुड़ की जलेबी की खुशबू दूर से ही लोगों को अपनी ओर खींच लेती है।
क्यों बढ़ रही है इन पारंपरिक स्वादों की लोकप्रियता?
आज फास्ट फूड और आधुनिक खानपान के दौर में भी देवरिया के ये पारंपरिक व्यंजन अपनी पहचान बनाए हुए हैं। इसके पीछे कई कारण हैं।
1. देसी स्वाद और शुद्धता
लोग अब फिर से पारंपरिक और कम केमिकल वाले भोजन की ओर लौट रहे हैं। देवरिया के ये व्यंजन उसी जरूरत को पूरा करते हैं।
2. भावनात्मक जुड़ाव
जो लोग देवरिया छोड़कर बड़े शहरों में बस गए हैं, उनके लिए यह स्वाद बचपन की यादों जैसा है।
3. कम कीमत में बेहतर भोजन
लिट्टी-चोखा और दही जैसे व्यंजन कम कीमत में पेट भरने वाला और स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराते हैं।
4. सोशल मीडिया का असर
अब लोग देसी और पारंपरिक भोजन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। इससे भी इन व्यंजनों की लोकप्रियता बढ़ी है।
त्योहारों और मेलों में बढ़ जाती है मांग
देवरिया में लगने वाले धार्मिक मेले, गांवों के हाट और शादी-ब्याह के मौसम में इन खाद्य पदार्थों की मांग कई गुना बढ़ जाती है।
होली पर मालपूआ, मकर संक्रांति पर दही-जलेबी और सर्दियों की शाम में लिट्टी-चोखा यहां की पहचान बन चुके हैं। यही वजह है कि बाहर से आने वाले लोग भी इन स्वादों को जरूर तलाशते हैं।
देवरिया के स्वाद में छिपी है मिट्टी की खुशबू
देवरिया का खानपान केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। यह यहां की संस्कृति, खेती, मौसम और सामाजिक जीवन की कहानी भी कहता है। मालपूआ में त्योहारों की मिठास है, लिट्टी-चोखा में मेहनतकश जीवन की ऊर्जा, दही में ग्रामीण सादगी और गुड़ की जलेबी में मिट्टी की सुगंध।

जब कोई व्यक्ति देवरिया आता है और इन व्यंजनों का स्वाद लेता है, तो वह केवल भोजन नहीं खाता बल्कि पूर्वांचल की परंपरा का अनुभव करता है। यही कारण है कि समय बदलने के बावजूद देवरिया के ये पारंपरिक स्वाद आज भी लोगों के दिलों और जुबान पर जिंदा हैं।











